फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ईएसआई कॉर्पोरेशन मुख्यालय में तैनात कमिश्नरों की फौज अकेली ही जनविरोधी धूर्त एवं हरामखोर नहीं है बल्कि मज़दूरों के असली दुश्मन तो इनके ऊपर बैठे डीजी, लेबर सेक्रेटरी व मंत्री हैं। इन्हीं की कृपा एवं आदेशों के अनुसार ये कमिश्नर-गण मज़दूर विरोधी एवं धूर्ततापूर्ण नीतियांं लागू करते हैं। बीते समयों में जब भी कोई अच्छे काम हो सके तो वे केवल इसलिए हो पाए कि कभी डीजी तो कभी श्रम सचिव तो कभी खुद मंत्री इन कमिश्नरों को सही दिशा में हांक पाए थे। दुर्भाग्य से अब केन्द्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया तथा डीजी दोनों ही धूर्त एवं मज़दूर विरोधी कॉर्पोरेशन पर काबिज हो गए हैं। गुजरात से आने वाले मंत्री मांडविया का चरित्र अब पूरी तरह से नंगा होकर सामने आ गया है। करीब साल भर पहले लग रहा था कि वे वास्तव में ही मज़दूर हितैषी होने के चलते मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की संख्या के साथ-साथ उनकी कार्य कुशलता भी बढ़ाने में रुचि ले रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने 2025 के सत्र के में दस नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की थी। इनमें से तीन को 100 सीटों वाला तथा सात को 50 सीटों वाला बनाना था। परन्तु साल भर में वे इस दिशा में कुछ भी ठोस न कर सके। इसके परिणाम स्वरूप एनएमसी ने एक भी कॉलेज को स्वीकृति प्रदान करने से इनकार कर दिया।
विदित है एनएमसी का दायित्व है कि वह निरीक्षण करके देखे कि आवेदक मेडिकल कॉलेज में आवश्यक सुविधाएं हैं भी या नहीं। इनके नहीं पाए जाने पर उसने 10 आवेदकों में से एक को भी स्वीकृति देने योग्य नहीं समझा। लेकिन, इसके बावजूद मांडविया ने अपनी बात रखने के लिए राजनीतिक दबाव डालकर एनएमसी से सभी 10 मेडिकल कॉलेजों के लिए 50-50 सीटों के लिए स्वीकृति ले ही ली। ये तमाम मेडिकल कॉलेज कॉर्पोरेशन के उन अस्पतालों में चलने जा रहे हैं जहां कॉलेज के नाम पर कुछ भी तो नहीं है। बीते एक साल में कॉर्पोरेशन इनके लिए किसी प्रकार का न तो कोई भवन निर्माण कर सका और न ही किराये पर ले सका।
नए मेडिकल कॉलेज तो क्या बनाने थे फरीदाबाद का चला-चलाया बेहतरीन मेडिकल कॉलेज अस्पताल भी विनाश की ओर धकेला जा रहा है। इसको बनाने व चलाने वाले न केवल डीन बल्कि तमाम बेहतरीन डॉक्टरों व अन्य स्टा$फ को भगाया एवं प्रताडि़त किया जा रहा है। 1 अगस्त से यहां लगातार विजिलेंस की छापेमारी इस तरह से चल रही है मानो यहां कोई बहुत बड़ा रैकेट चल रहा हो। यहां के मौजूदा तथा तबादले पर जा चुके डॉक्टरों व अन्य स्टाफ के कुल 25 लोगों को निलम्बित कर रखा है। सैंकड़ों की संख्या में डॉक्टरों को असली काम से हटा कर स्टोर व दफ्तरी रेकॉर्ड को खंगालने में लगा रखा है। लक्ष्य केवल एक ही है कि जिन अधिकारियों ने मंत्री को भारी कमीशनखोरी का मौका देने से इनकार कर दिया उनके खिलाफ कोई तो सबूत मिले।
तमाम प्रयास असफल होने के बाद बीते सप्ताह संस्थान के एक डिप्टी डायरेक्टर से यह घोषणा कराई गई कि स्टाफ का जो भी अधिकारी/कर्मचारी किसी भी घोटाले के बारे में कोई जानकारी रखता हो तो वह गुप्त रूप से उन्हें दे सकता है। यह घोषणा ठीक वैसी ही है जैसे हताश पुलिस किसी अपराधी को पकड़ पाने में असमर्थ होने पर जनता से सार्वजनिक अनुरोध करके सहायता मांगती है। इसके लिए पुलिस इनाम की भी घोषणा करती है। फिलहाल मुख्यालय ने अभी किसी इनाम की घोषणा नहीं करवाई है।
गौरतलब है कि तीन महीने की लगातार सिर तोड़ कोशिशें करने के बावजूद डीजी के नेतृत्व में मंत्री की छापामार टीमें किसी के विरुद्ध भी कोई चार्जशीट नहीं बना पाई है। उसी को बनाने के लिए बेताब मंत्री की टीम इस तरह की वाहियात घोषणाएं कर रही है। कॉर्पोरेशन के नियमानुसार प्रत्येक निलम्बित कर्मचारी को तीन माह तक आधा वेतन और उसके बाद 90 प्रतिशत वेतन बतौर निलम्बन भत्ता देना होता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी तक किसी भी कर्मचारी को ऐसा कोई भत्ता नहीं दिया गया है। इसके अलावा किसी भी कर्मचारी को कोई सजा देने के लिए पूरी इन्क्वायरी करके उसे दोषी साबित करना अनिवार्य होता है।