फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ईएसआईसी द्वारा जि़ले के छ: लाख तथा हरियाणा भर के अन्य लाखों बीमाकृत मज़दूरों के लिए यहां बनाए गए मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रति स्थानीय राजनेता पूरी तरह से उदासीन बने हुए हैं। बेशक कॉर्पोरेशन केन्द्रीय श्रममंत्री के अधीन काम करता है, लेकिन स्थानीय विधायकों, सांसदों व मंत्रियों को यह जरूर समझ लेना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाओं से लाभान्वित होने वाले मज़दूर परिवार तो उनके ही क्षेत्र के हैं। इस नाते इन नेताओं का यह दायित्व बन जाता है कि वे कॉर्पोरेशन की नकेल इस प्रकार कस कर रखें कि वह उनके नागरिकों को पर्याप्त सुविधाएं प्रदान करता रहे। लेकिन, जो सत्ता हथियाने के लिए मतदाताओं पर निर्भर न होकर वोट चोरी करने मेें माहिर हों उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की परवाह क्यों होने लगी।
फरीदाबाद-पलवल से हरियाणा सरकार के तीन मंत्री तथा एक केन्द्रीय मंत्री, तथा इतने ही मंत्री गुडग़ांव-रेवाड़ी से भी मौजूद हैं। इस क्षेत्र से करीब 18 लाख बीमाकृत मज़दूर ईएसआईसी से इलाज पाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इन नेताओं का कोई ध्यान एवं रुचि ईएसआई कॉर्पोरेशन की कारकर्दगी में नहीं है। इनकी रुचि है तो केवल इतनी कि इनके नालायक निकम्मे कार्यकर्ताओं एवं रिश्तेदरोंं को इस संस्थान में कोई न कोई नौकरी मिल जाए। इसके अलावा ये लोग अपने किसी चहेते को गलत ढंग से निजी अस्पतालों में रेफर कराने का प्रयास भी करते हैं। इन नेताओं ने कभी भी इस संस्थान के महत्व को समझ कर इसके उत्थान हेतु आवाज उठाने का कोई प्रयास नहीं किया। यहां चालू होने वाला नर्सिंग एवं पैरा मेडिकल कॉलेज तथा ट्रामा सेंटर कौन से खड्डे में जा गिरा, इन्हें कोई चिन्ता नहीं।
इन नेताओं ने न तो कभी उस मल्लिकार्जुन खडग़े से कोई सबक सीखा जिसने अपने गुलबर्गा में कॉर्पोरेशन से मेडिकल कॉलेज अस्पताल नर्सिंग एवं पैरा मेडिकल कॉलेज व डेंटल कॉलेज आदि खुलवाए और न ही सनथनगर से निर्वाचित भाजपाई सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय से कोई सबक सीखा, जिसने अपने यहां के मेडिकल कॉलेज अस्पताल को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाने का काम किया। वर्ष 2015 में स्थानीय ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल तथा इसी का समकक्ष संस्थान हैदराबाद (सनथनगर) में भी चल रहा था। यद्यपि हैदराबाद वाले संस्थान में सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट का प्रावधान वर्ष 2010 में कर दिया गया था लेकिन वहां मेडिकल की पढ़ाई न होने के चलते सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट पूरी तरह से फेल साबित हो रहा था। 9 नवम्बर 2014 को जब हैदराबाद से निर्वाचित सांसद बंडारू दत्तात्रेय केन्द्रीय श्रममंत्री बने थे, उन्होंने अपने क्षेत्र के इस मृतप्राय संस्थान को जीवित करने का बीड़ा उठाया।
इसके लिए उन्होंने एम्स दिल्ली के वरिष्ठ डॉक्टर एम श्रीनिवास को वहां का डीन नियुक्त करने के लिए तमाम औपचारिकताएं पूरी की। श्रममंत्री का पूरा समर्थन होने के चलते डॉक्टर श्रीनिवास को वहां खुल कर काम करने का अवसर मिला। मुख्यालय के हरामखोर कमिश्नरों व डीजी की हिम्मत उन्हें रोकने-टोकने की नहीं होती थी। इसके चलते डॉक्टर श्रीनिवास ने मुख्यालय के उन तमाम पालतू पिल्लों को ठिकाने लगा दिया जो उनके रास्ते में रुकावट बनते थे। इसके परिणामस्वपरूप आज वहां का संस्थान ईएसआई कॉर्पोरेशन के बेहतरीन संस्थानों में से एक है। मजे की बात तो यह है कि अब वहां बतौर डीन न तो डॉक्टर श्रीनिवास हैं और न ही बंडारू दत्तात्रेय मंत्री अथवा संासद। लेकिन उनका, अपने इस संस्थान के प्रति लगाव और कॉर्पोरेशन मुख्यालय पर दबाव इतना जबरदस्त है कि हरामखोर कमिश्नरों व डीजी तक की हिम्मत नहीं कि वहां के संस्थान में किसी प्रकार की छेड़छाड़ एवं कटौतियां कर सकें।
डॉ. एम श्रीनिवास द्वारा की गई धुआंधार बल्लेबाजी के नीचे दबे मुख्यालय का पूरा लाभ उठाते हुए यहां के तत्कालीन डीन डॉ. असीम दास ने भी अपने इस संस्थान को नई ऊंचाईयां दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यालय की अनिच्छा के बावजूद नई ऊंचाईयों को छू रहे ये दोनों संस्थान उनकी आंख की किरकिरी बने रहे। मुख्यालय, डॉक्टर श्रीनिवास का तो कुछ भी बिगाड़ पाने की स्थिति में नहीं था क्योंकि वे प्रतिनियुक्ति पर एम्स से कॉर्पोरेशन में आए थे और पदोन्नत होकर वापस डायरेक्टर बन कर अपने मूल संस्थान में लौट गए। लेकिन डॉक्टर असीम दास से बदला लेने की चाह मुख्यालय के मन में बलवती होती रही। बिल्ली के भागों छीका तब टूटा जब महा घूसखोर एवं निकम्मा मनसुख मांडविया केन्द्रीय श्रममंत्री कॉर्पोरेशन के सिर पर आ बैठा।
इससे पहले बतौर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री मांडविया अच्छी-खासी मलाई खाने के आदी हो चुके थे। करीब सात-आठ माह तक मलाई की तलाश में भटकते मांडविया ने तमाम मेडिकल कॉलेजों में अपने दल्ले भेज कर मलाई का जुगाड़ बनाने का प्रयास किया। ये जुगाड़ कहीं बन पाया या नहीं इसकी तो कोई विशेष जानकारी नहीं है। परन्तु मुख्यालय से सलाह मशवरे पर मंत्री ने डॉक्टर दास पर गाज गिरा दी जो अलवर मेडिकल कॉलेज के डीन हो चुके थे। उनके द्वारा बीते 12 साल में किए गए तमाम कार्यकलापों में से किन्ही घोटालों को खोजने का जबरदस्त प्रयास किया गया, लेकिन बीते चार महीने में भी मंत्री को कोई सफलता नहीं मिल पाई।
मंत्री, डीजी तथा मुख्यालय के कमिशनरों ने अपना रौद्र रूप दिखाते हुए बड़े पैमाने पर डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों को बिना किसी आरोप पत्र के महीनों से निलम्बित कर रखा है। सबूत कोई जुटा नहीं पाए तो जांच कार्रवाई भी शुरू नहीं की जा सकी। इस रौद्र रूप को स्टाफ तो भुगत रहा है सो भुगत ही रहा है, असली भुगतान तो उन गरीब मज़दूरों से लिया जा रहा है जिन से हर माह वसूली करना कॉर्पोरेशन भूलता नहीं। इस काम के लिए कॉर्पोरेशन ने यहां बतौर डीन डॉ.चव्हाण कालिदास दत्ताराय को नियुक्त कर दिया। उन्होंने यहां आते ही लम्बी-लम्बी फेकनी शुरू कर दी थी। अस्पताल में जगह-जगह लगने वाली लम्बी लाइनों को एकदम घटाने जैसे करिश्माई सपने दिखाए, लेकिन सब खोखले निकले। अधिकतर दवाईयां नदारद, लोकल परचेज बंद, वरिष्ठ डॉक्टर भगा दिए गए और डे-केयर मरीजों का खाना बंद कर दिया गया। मकसद केवल एक, खर्च घटाना। इसके लिए मुख्यालय ने डीन कालिदास को जहां बैठने के लिए कहा, वहीं, वे पूरी तरह से लमलेट ही हो गए।
महीने में एक बार होने वाले सुविधा समागम की शुरुआत मुख्यालय के आदेश पर नहीं बल्कि तत्कालीन डीन डॉक्टर असीम दास ने, अपनी कमियां जानने के लिए की थी ताकि उन्हें दूर किया जा सके। इस तरह मरीजों से जानकारी ले कर वे अपनी सेवाओं में सुधार करते थे। परन्तु डॉ. कालीदास द्वारा आए दिन नई-नई समस्याएं खड़ी करने के बाद वे नहीं चाहते थे कि सुविधा-समागम में आकर लोग उनसे बहस करें। इसलिए उन्होंने इस परम्परा को ही बंद कर दिया था, लेकिन मज़दूर पक्ष द्वारा कड़ा पत्र लिखने के बाद, न चाहते हुए भी गत माह यह समागम किया गया। समागम तो जैसे-तैसे हो गया लेकिन धरातल पर उसका कोई विशेष प्रभाव कहीं नजर नहीं आया।
कॉर्डियोलॉजी यानी हृदय रोग विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते अब काम आधे से भी कम हो रहा है। न तो हृदय के वाल्व बदले जा रहे हैं और न ही पेसमेकर लगाने का काम हो रहा है। एंजिओग्राफी व एंजिओप्लास्टी आदि भी नाम मात्र को ही हो रही है। कैंसर विभाग से विशेषज्ञ डॉक्टरों को भगा देने तथा दवाई के लिए मरीजों को डिस्पेंसरियों की ओर खदेडऩे के चलते मरीज बेहद परेशानी से गुजर रहे हैं। बीते करीब चार माह से बीएमटी (बोन मैरो ट्रांसप्लांट) का काम तो पूरी तरह से बंद है जबकि इसके विशेषज्ञ डॉक्टर राहुल भार्गव लगभग मुफ्त अपनी सेवाएं देते हैं, लेकिन दवाओं तथा अन्य खर्चों को बचाने के लिए कॉर्पोरेशन ने यह काम बिल्कुल बंद कर रखा है। एक ओर तो रेफरल बंद कर दिया गया दूसरी ओर दवाइयांं खरीदने पर भी कॉर्पोरेशन खर्च करने से बचता है। कैंसर में रेडियो थेरेपी एवं पैट स्कैन की सख्त जरूरत होने के बावजूद यहां नहीं शुरू किया जा रहा। रेडियो थेरेपी के लिए आवश्यक बंकर को नई बिल्डिंग में बनाने की योजना चल रही थी, लेकिन स्वयं पीएम मोदी द्वारा शिलान्यास के एक साल बाद तक भी इसका निर्माण शुरू नहीं हुआ।
मज़दूर नेता भी दोषी हैं ईएसआई कॉर्पोरेशन एक स्वायत्त संगठन है। यह बाबुओं द्वारा चलाए जाने वाला कोई सरकारी विभाग नहीं है। कॉर्पोरेशन अपने हर प्रकार के फैसले खुद लेने में सक्षम है। इसे वित्तीय स्वीकृति के लिए किसी सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ते। कॉर्पोरेशन अपना धन- संंग्रह तथा खर्च करने के तमाम फैसले खुद करता है। ईएसआई एक्ट के मुताबिक कॉर्पोरेशन में 10 कॉर्पोरेटर मज़दूरों के, इतने ही कॉर्पोरेटर कारखानेदारों के तथा इतने ही सदस्य सरकार की ओर से होते हैं। कॉर्पोरेशन का डीजी इसका पदेन सचिव तथा केन्द्रीय श्रममंत्री इसका चेयरमैन होता है। बेशक रोजमर्रा का काम-काज चलाने के लिए डीजी तथा उसके नीचे मुख्यालय में तैनात कमिश्नरों व अन्य अधिकारियों की फौज होती है। लेकिन कॉर्पोरेशन के नियमानुसार डीजी केवल वही काम कर सकता है जिसे कॉर्पोरेशन ने स्वीकृति प्रदान की हो। संक्षेप में कॉर्पोरेशन की नीति निर्धारण का फैसला कॉर्पोरेटरों द्वारा ही किया जाता है। बीते कई वर्षों से देखने में आ रहा है कि कॉर्पोरेटरों की कोई हैसियत ही नहीं रह गई है। कॉर्पोरेशन एक विभाग बन कर रह गया है जिसे डीजी तथा केन्द्रीय श्रम मंत्रालय चला रहा है। कायदे से कॉर्पोरेशन की कोई फाइल श्रम मंत्रालय तक जानी ही नहीं चाहिए, पहले जाया भी नहीं करती थी, लेकिन अब कुछ वर्षों से तमाम फैसले श्रम मंत्रालय से होकर आते हैं। कॉर्पोरोटरों द्वारा लिए गए फैसलों को प्रशासनिक आदेशों द्वारा बदल दिया जाता है। नि:संदेह, सरकारी अफसरों की प्रवृत्ति अपनी दादागिरी चलाने की रहती है, लेकिन कॉर्पोरेशन में बैठे मज़दूर नेताओं को अपना दायित्व नहीं भूलना चाहिए। माना जा सकता है कि सरकार उनकी नहीं सुनती, न सुने, कोई बात नहीं, लेकिन वे अपना विरोध तो प्रकट करें, मुंह से कुछ तो बोलें। इस पर भी बात न बने तो अपने परम्परिक हथियार ‘प्रदर्शन’ का इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं। दक्षिणपंथी मज़दूर नेताओं से तो कोई गिला नहीं हो सकता, लेकिन वामपंथी सीटू, एटक, हिन्द मज़दूर सभा, यूटीयूसी आदि संगठनों से आने वाले नेताओं से तो कुछ अपेक्षा की ही जा सकती है। दुख की बात है कि किसी भी संगठन को इस ओर ध्यान देने की जरा भी फुर्सत नहीं है। वे अपने काम-काज में इतने व्यस्त रहते हैं कि मानो पूरी दुनिया का भार वे अपने नाजुक कंधों पर ही उठाए फिर रहे हैं।