तोडफ़ोड़ के दल्ले डेविड नागर से पार्षद बोला फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सत्ता में आने के बाद देश की सबसे अमीर पार्टी बन चुकी भाजपा द्वारा दस साल में अकूत दौलत इक_ा करने का फार्मूला इसकी ट्रिपल इंजन सरकार के प्यादों यानी पार्षदों ने भी सीख लिया है। मंत्री जी की विधानसभा के एक भाजपाई पार्षद ने ओल्ड फरीदाबाद जोन के तोडफ़ोड़ विभाग में तैनात लूट कमाई के घाघ बाबू डेविड नागर से पांच-सात लाख रुपये की व्यवस्था करने को कहा। लूट कमाई कैसे की जाएगी इसका तरीका भी नागर को समझाया, कि तुम इलाके में बड़े लोगों की इमारतों पर अतिक्रमण के नाम पर छोटी मोटी तोडफ़ोड़ करो, इसके बाद सौदेबाजी होगी, करोड़ों की इमारत बचाने के लिए दो-चार लाख रुपये तो बड़ी आसानी से मिल जाएंगे, तुम्हारा भी भला होगा और हमारा भी खर्च निकल आएगा। तोडफ़ोड़ से होने वाली लूट कमाई और उसमें बंटने वाली हिस्सापत्ती का आकलन करने के बाद डेविड नागर ने पार्षद से कहा कि पचास-साठ हजार की बात हो तो मैं खुद व्यवस्था कर दूंगा लेकिन पांच-सात लाख रुपये मुश्किल होगा। पार्षद ने सलाह वाले अंदाज में चेतावनी दी कि देख लो, बड़ी मोटी कमाई है इस विभाग में, तुम व्यवस्था नहीं करोगे तो किसी दूसरे को गद्दी दिलवाई जाएगी, वो करेगा खर्चे-पानी का इंतजाम।
पार्षद की दोस्ताना धमकी से परेशान डेविड नागर इस घटना को ज्यादा समय तक पचा न सका और एक शाम अपने गुर्गों के साथ मयखाने में शराब की चुस्की लेते हुए सारा गम उंडेल डाला। डेविड नागर ने अपना दुखड़ा रोया कि पार्षद आने से नौकरी अब आसान नहीं रहेगी। मैं तो छुट्टी वाले दिन, शनिवार-रविवार को भी गलियों में घूमता हूं कि अभी अच्छा समय चल रहा है तो कुछ माल इक_ा कर लिया जाए। पूरे महीने जूते घिसकर 8-10 लाख का जुगाड़ कर पाता हूं, इसके लिए अधिकारियों से सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, ज्वाइंट कमिश्नर की फटीक अलग से है। साहब तो हर दूसरे दिन कोई न कोई फटीक देते रहते हैं अब ये पार्षद और आ गए, कहां तक पैसा बांटूंगा। साथियों के बीच हुई यह बातचीत नगर निगम के अन्य कर्मचारियों तक पहुंच गई और सब आपस में मजे लेकर घटना की चर्चा कर रहे हैं। मज़दूर मोर्चा निगम कर्मचारियों के बीच चटकारे लेकर की जा रही इस चर्चा की पुष्टि या खंडन नहीं करता लेकिन डेविड नागर द्वारा तोडफ़ोड़ विभाग में बहुत लंबे समय से जमे रहना बताता है कि दाल तो काली है। नागर के दुखड़ा रोने से एक बात तो साफ़ है की ओल्ड फरीदाबाद का तोड़फ़ोड़ दस्ता केवल और केवल डेविड नागर के भरोसे ही चल रहा है तभी पार्षद ने भी जेई, एसडीओ को दरकिनार करते हुए सीधा ही तोडफ़ोड़ के असली दलाल से ही संपर्क साधा और ज्वाइंट कमिश्नर को भी भली भांति पता है की उगाही तो नागर साहब ही करते है।
वैसे तो डेविड नागर ओल्ड फरीदाबाद जोन के तोडफ़ोड़ विभाग में क्लर्क है यानी उसका काम फील्ड का नहीं है बावजूद इसके वह तोडफ़ोड़ की हर कार्रवाई में न केवल मौजूद रहता है बल्कि कैमरे के सामने इस तरह से व्यवहार करता है जिससे अवैध निर्माणकर्ता और देखने वालो को समझ में आ जाए कि तोडफ़ोड़ रुकवानी है तो इस व्यक्ति को खुश कर साधना होगा। पीछे 8-10 साल से एक ही पद पर डटा डेविड लूट कमाई के सारे तरीकों में महारत हासिल कर चुका है। उसे जोन के सारे अतिक्रमण और अवैध कब्जे उंगलियों पर रटे हुए हैं, किस अतिक्रमण से प्रतिमाह कितना धन आता है और अवैध कब्जे वाले से कितनी रकम वसूली जानी है उसे मुंहजुबानी याद हैं। यह सब उसने वर्षों की ‘कड़ी मेहनतÓ के बाद हासिल किया है, अधिकारियों को भी मालूम है कि यदि डेविड को हटाया तो अवैध कब्जा-अतिक्रमण से प्रतिमाह मिलने वाली हिस्सापत्ती गड़बड़ा जाएगी, इसलिए कमाऊपूत पर सबकी कृपा बनी हुई है।
नगर निगम चुनाव लडऩे की लंबे अर्से से तैयारी कर रहे पार्षद को भी अवैध कब्जा और अतिक्रमण से होने वाली अच्छी खासी वसूली की जानकारी थी और वह दलाली पाने के लिए खुद को भाजपा नेता दर्शा कर निगम में हाथ मारने का प्रयास करता रहा था, लेकिन डेविड नागर जैसे घाघ उसे टहला देते। नगर निगम चुनाव में मंत्री-विधायक को सौदेबाजी कर खुश किया और भाजपा से टिकट ले आया। चुनाव जीतने के लिए बड़े नेताओं का ‘आशीर्वाद’ लेने और वोट पक्के करने के लिए रुपया पानी की तरह बहाया। जानकारों की मानें तो अनेक भाजपाई प्रत्याशियों ने चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए पचास लाख से एक करोड़ रुपये तक खर्च किए। समझा जा सकता है कि जो व्यक्ति पार्षद बनने के लिए एक करोड़ खर्च करेगा तो सत्ता मिलते ही लूट कमाई में लग ही जाएगा।
निगम में बाबुओं से लूट कमाई करने वाले पार्षद का मामला पहला नहीं है, वार्ड छह से भाजपा पार्षद गायत्री देवी तो मोटी कमाई के लिए इतनी उतावली थीं कि पद की शपथ ग्रहण करने से पहले ही जेई आरिफ के पास पहुंच गईं और चुनाव में खर्च हुए पचास लाख की भरपाई कराने की तरकीबें पूछने लगी थीं। लूट कमाई तो सभी पार्षद करते हैं लेकिन मंत्री जी की विधानसभा वाला पार्षद उनसे एक कदम आगे निकल गया। अभी तक पार्षद विकास कार्यों में कमीशन ऐंठते थे, लेकिन इन पार्षद साहब ने तोडफ़ोड़ करवाने और रुकवाने के नाम पर कमाई का नया रास्ता पार्षदों को सुझाया है। जानकारों के अनुसार अभी तक पार्षद वोट बैंक के लिए तोडफ़ोड़ की कार्रवाई रुकवाते थे लेकिन इन साहब ने इसे वोट बैंक का आर्थिक दोहन करने का भी सौदा बना दिया।
पार्षदों की इन हरकतों पर आम जनता को आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि उसने ही ऐसे भ्रष्टों को अपना प्रतिनिधि चुना है। मतदान के समय विकास, रोजगार, महंगाई, बढ़ते अपराध, आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को दरकिनार कर संघ का हिंदू-मुस्लिम नफरती एजेंडा चुनने वाली जनता के साथ ऐसे ही होता रहेगा। भाजपाइयों को भी मालूम है कि चाहे जितना भ्रष्टाचार करो, लूटो जनता तो उसे ही वोट देगी तो फिर क्यों न सत्ता का इस्तेमाल जनता की गाढ़ी कमाई लूटने में किया जाए।
संदर्भवश, मज़दूर मोर्चा बीते कई वर्षों से यह लिखता आ रहा है कि तोडफ़ोड़ का महकमा जानबूझ कर केवल और केवल लूट कमाई के लिए ही बनाया गया है। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या चौटालों की या भाजपाइयों की लूट का यह धंधा चलता आया है और चलता ही रहेगा। पहले ये लूट कमाई केवल अफसरों में बंटा करती थी अब पार्षद और पैदा हो गए है। यदि शासन प्रशासन चाहे तो अवैध निर्माण के नाम पर एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती। अवैध निर्माण एक सोची समझी रणनीति के तहत ही करवाया जाता है, यह रहस्य भी किसी से छिपा नहीं है कि नगर निगम किसी को भी आसानी से वैध निर्माण करने ही नहीं देता। यदि कोई वैध निर्माण करना भी चाहे तो उसको इतने चक्कर कटा दिए जाते हैं कि वह हथियार डाल कर इन्हीं अधिकारियों से पूछता है कि प्रभु रास्ता बताओ, फिर ये रास्ता बताते हैं कि तू अवैध निर्माण कर ले बाकी हम बाद में देख लेंगे, यही है अवैध निर्माण बनाने, तोडऩे व लूट कमाई करने की कहानी या सच्चाई। इस धंधे को रोकने का केवल एक तरीका है, कि तोडफ़ोड़ करने के साथ-साथ उन तमाम जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जिन्होंने इसे होने दिया।