करनाल। कभी इसका नाम शेरशाह सूरी मार्ग था, फिर जी टी रोड हुआ, फिर राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 1 ओर अब राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 44. नाम अनेक बार बदले गए। नहीं बदली गई तो उसकी दशा।
ऐसा लगता है कि इस राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ मज़ाक़ सा हो रहा है। अरबों रुपए टोल के रूप में लेने वाली कम्पनियां ओर राष्ट्रीय राजमार्ग अथॉरिटी भी इसके साथ सौतेले बेटे जैसा व्यवहार कर रहे हैं। पहले सोमा ने जम कर लूटा लेकिन काम के नाम पर कुछ नहीं किया ओर अब नई कम्पनी भी कछुए की चाल से काम कर रही है। हर रोज़ सैंकड़ों वीआईपी इस रास्ते से निकलतें हैं लेकिन उन्हें पायलट मिल जाती है इसलिए आम जनता के दर्द का उन्हें एहसास नहीं होता।
आप देश के अन्य सभी राष्ट्रीय राज मार्ग उठा कर देख लीजिए, सभी का काम रिकोर्ड समय में पूरा हुआ ओर बेहतरीन कार्य किया गया। ख़ास तौर पर दक्षिण भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलकर विदेश की सडक़ों पर चलने के एहसास होता है।
ऐतिहासिक, व्यापारिक व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व भारत के उतरी भाग को दक्षिण से जोडऩे वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 1, ओह! माफ़ करना नम्बर 44 के दिन कब सुधरेंगे? सरकार को इसका उत्तर देना चाहिए।
दक्षिण भारत का तो पता नहीं लेकिन दिल्ली आगरा सडक़, इसे भी कभी जीटी रोड ही कहा जाता था, को चौड़ा करने का काम बीते दस वर्षो से चल रहा है, काम की गति को देखते हुए लगता है कि अभी दस वर्ष और लगेंगे। इसे बनाने वाला ठेकेदार अनिल अंबानी करोड़ों रुपए की टोल वसूली प्रतिदिन कर रहा है। इस तरह राजमार्ग नं 44 का काम कभी पूरा होने में नहीं आ रहा है। एक पूरा होता है तो दूसरा शुरू कर दिया जाता है, काम के चलते रहने से ही तो लूट कमाई चलती रहती है।