भारतीय संविधान ने 76 साल पूरे करके 77वां जन्मदिन मना लिया है लेकिन…

भारतीय संविधान ने 76 साल पूरे करके 77वां जन्मदिन मना लिया है लेकिन…
January 07 17:16 2026

राजीव वत्स
इन 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने अनेकों गर्म ठंडे दिन देखे, आपातकाल देखा, अनुच्छेद 356 का दुरूपयोग करके सरकारें बर्खास्त होती देखी, गठबंधन सरकारें देखी, आतंकवाद देखा, नक्सलवाद देखा, बूथ कैप्चरिंग देखी, 2 प्रधानमंत्रियों को आतंकवाद की भेंट चढ़ते देखा, 3 युद्ध देखे, घोटाले देखे, हवाला कांड देखा, जेपी आंदोलन देखा, न्याय में देरी देखी, अन्ना आंदोलन देखा, किसानों की आत्महत्याएं देखी, सौ से ज्यादा संशोधन देखे लेकिन, जो आज देखना पड़ रहा है वो कभी नहीं देखा। मैने 2019 में भाजपा की जीत के बाद लिखा था कि यहां से क्रस्स् के चीन की तरह एकदलीय व्यवस्था का सपना साकार होने का रास्ता आरंभ होता है।

दरअसल, कांग्रेस एक बहुध्रुवीय विचारधारा का संगठन है। यहां हिंदूवादी भी मिलते हैं, सेक्युलर भी मिलते हैं और तुष्टिकरण वाले भी यहां पूंजीवादी भी मिलते हैं, साम्यवादी भी और समाजवादी भी।
यहां राष्ट्रवादी भी मिलते हैं और सहिष्णुतावादी भी। यहां भ्रष्ट भी मिलते हैं और ईमानदार भी। यही बहुलतावाद कांग्रेस की ताकत थी और भारतीय संविधान के टिके रहने की गारंटी। कांग्रेस या संयुक्त मोर्चा की सरकारों के समय संवैधानिक पदों पर बैठे कांग्रेसी दूध के धुले नहीं थे। वो भी तमाम खामियों से ग्रस्त होते थे लेकिन, वह किसी विचारधारा या एजेंडे के लिए कट्टर नहीं थे। चाहे किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे कांग्रेसी अगर 10 में से 5 फैसले कांग्रेस की सरकारों के हित में देते थे तो 5 मामलों में नियम कानून की बात भी कर लेते थे।

लोगों में वहम बना रहता था कि चुनाव आयोग पारदर्शी चुनाव करवाता है, चुनाव के दौरान पैसा छुपकर बांटना पड़ता था, ष्ट्रत्र पब्लिक मनी का रखवाला है, अफसरशाही जनसेवक है, फौज गैर राजनैतिक है, पुलिस जनता की रक्षक है, यूनिवर्सिटीज के वीसी पढ़े लिखे लोग दिखते थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी, मीडिया में डॉगी मीडिया का प्रतिशत काफी कम था, चुनाव के लिए दंगा फसाद खुलेआम नहीं होता था, लोगों को लगता था कि अगर मंत्री-संतरी नौकरशाह उनकी बात नहीं सुनेंगे तो न्यायपालिका उन्हें न्याय देगी। इस वहम में लोग व्यवस्था में विश्वास रखते हुए अपने जीवन को लस्टम पस्टम गाड़ी खींचते रहते थे।

अधिकतर संवैधानिक संस्थाओं में नॉमिनेटेड लोकसेवकों का कार्यकाल 5 या 6 साल होता है। 2014 से पहले कांग्रेस के समय संवैधानिक संस्थाओं में अलग अलग विचारधाराओं के जितने भी लोग बैठे थे 2019 तक आते आते वो सभी सेवानिवृत्त होते गए और उनकी जगह हर संवैधानिक पद पर संघी काबिज होते गए। पिछले 4 साल से चुनाव आयोग, सूचना आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं, Quasi Judicial bodies,ED, CBI, यूनिवर्सिटीज और बहुत हद तक न्यायपालिका का संघीकरण हो चुका है। संघियों के बारे कहा जाता है कि संघी जहां भी होगा केवल संघ के फायदे की सोचेगा जैसे बाबाओं के चेले केवल बाबा की सुनते हैं। संघी के लिए नियम – कानून, संविधान, वेद – पुराण, ज्ञान – विज्ञान सब संघ की शाखाओं का ज्ञान और संघ का एजेंडा हैं।

जैसे टोपी वाले भाइयों के लिए उनकी पवित्र किताब ही सब कुछ है ठीक वैसे ही तिलक वाले मित्रों के लिए संघ का एजेंडा ही सब कुछ है। यही कारण है कि अशोक यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर को मात्र एक पोस्ट लिखने पर भी अंदर ठोक दिया जाता है और मप्र के एक संघी मंत्री का फौज की एक डेकोरेटेड ऑफिसर को आतंकवादियों की बहन कहे जाने पर भी कुछ नहीं बिगड़ता। कमाल की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों मामले एक ही बेंच के पास गए लेकिन, दोनों मामलों में कोर्ट का रुख अलग था।आज स्थिति ये आ गई है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बैठे ष्टश्वष्ट ज्ञानेश गुप्ता खुलेआम निष्पक्षता और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाते हैं, चुनाव से एक दिन पहले बाकायदा सरकारी खजाने से वोटर्स के खाते में 10 – 10 हजार रुपए डाले जाते हैं और चुनाव आयोग विपक्ष से वोट चोरी पर एफिडेविट मांगता रहता है।

देश का मीडिया सुबह से शाम देश में सांप्रदायिक एजेंडा चलाता है, देश के सार्वजनिक उपक्रम एक एक करके दो औद्योगिक घरानों के नाम हो जाते हैं, मध्यम वर्ग की गाढ़ी कमाई से पाई पाई जोड़कर बैंकों में रखा रुपया पूंजिपतियों को असुरक्षित लोन के रूप में मिल जाता है और फिर पूंजिपतियों का वही लाखों करोड़ का लोन बट्टे खाते में डाल दिया जाता है लेकिन, कुछ हजार का लोन नहीं चुकाने पर किसान की जमीनों की कुर्की के नोटिस आ जाते हैं। फौज का राजनैतिक इस्तेमाल होता है और सैन्य जनरल राजनैतिक बयानबाजी करते हैं।ये सब इसी संविधान के दायरे में होता है।अब हम व्यवस्था के संघीकरण के चरम के निकट हैं। प्रधानमंत्री जी ने हिटलर की तरह खुद को अवतार घोषित कर लिया है और मीडिया गोयबल्स की भूमिका में है।

लोकसभा और राज्यसभा में सामान्य बहुमत है और विपक्षी सांसदों का निलंबन करके इसे आसानी से ? बहुमत में बदला जा सकता है। आधे से अधिक राज्यों में संघ की सरकारें हैं। जो चाहे बिल पास किए जा सकते हैं। पहले वन नेशन वन इलेक्शन का नियम लागू किया जा सकता है और उसकी सफलता के उपरांत वन नेशन, वन लीडर, वन पार्टी, वन एनजीओ का कानून भी बन सकता है।
बहुमत इनके पास है और जुडिशियल रिव्यू में संसद की सर्वोच्चता को सम्मान दे दिया जाएगा। ये सब इसी संविधान के दायरे में होगा।

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Mazdoor Morcha
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