करनाल। पहली तस्वीर मुगल कैनाल की है, जहां मकान मालिक ने गेट लगा मिट्टी का रैंप बना दिया, इस पर कुछ माह पहले हूडा ने कार्रवाई कर दीवार बनवा दी थी, अब वो दीवार टूट गेट लगा साफ नजर आ रहा है।
किंतु हूडा में तैनात चौकीदार जिनकी ड्यूटी बनती है कि कोई कब्जा तो नहीं हो रहा नहीं देखते और कब्जा होता चला जाता है। दूसरी तस्वीरें सेक्टर 12 पेट्रोल पम्प के पास बूथ की हैं, यहां बूथ के ऊपर अस्थायी निर्माण किया गया और किराए पर दे दिया गया है। यहां भी हूडा मात्र नोटिस नोटिस का खेल खेलने तक ही सीमित है जबकि उसे ये जगह रिज्यूम कर लेनी चाहिए। किंतु वही ढाक के तीन पात चौथा लगे न लगने की आस की कहावत पर हूडा करनाल चल रहा है।
अधिकारी गुणगान तो करवाना चाहते हैं लेकिन काम करना नहीं चाहते। ऐसा ही एक मामला गिरड़े वाले पीर बाबा के साथ बहादुर चंद कालोनी का है। यहां गेट नंबर 2 के रास्ते से अंदर जा कर सैलर में कालोनी कट गई और डीटीपी ने दिखावे मात्र की थोड़ी कार्रवाइ कर वाहवाही लूट ली लेकनि सही जगह पर वह चाह कर भी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। सवाल है कि आखिर किसके दबाव से ये सब हो रहा है? यदि सत्ताधीशों, अमीर और रसूखदारों के लिए ही सब कुछ करना है तो गरीबों की झोपडिय़ों में पीला पंजा चलाने का एक कानून ही बना दो ताकि सब करो और छुट्टी। तीसरी तस्वीर जुँडला गेट करनाल शराब के ठेके के पास की है। यहां नगर निगम की बेशकीमती जमीन पर कब्जा करने के लिए गली को दीवार लगा बंद कर दिया गया और पिलर लगा गेट लगाने की तैयारी थी, वहां भी नगर निगम का दस्ता कार्रवाई खानापूर्ति की कर लौट गया। जबकि दीवार तोड़ गली का रास्ता खुलवाना था और जो लोहे का गेट लगाने के लिए रखा था उसे कब्जे में लेना था। छोटे छोटे पिलर तोडऩे की बजाय बड़े बड़े पिलर ध्वस्त करने की बजाय छोड़ दिए गए। आखिर कार्यवाही खानापूर्ति तक सीमित क्यों है कोई जवाब इसका स्थानीय प्रशासन के पास।