जगदीश भाजपा सरकार की शुरू से ही अरावली को हड़पने की नियत बनी हुई थी। इसके लिए कानून में परिवर्तन करने का प्रयास भी भाजपाई खट्टर सरकार ने किया था। जिस पर हाईकोर्ट ने अच्छी फटकार लगाई थी लेकिन अब 20 नवम्बर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा की राह आसान करते हुए फैसला दिया है कि हजार मीटर की ऊंचाई वाला ही पहाड़ कहलायेगा। बाकी पहाडिय़ों को कोई संरक्षण देने की आवश्यकता नहीं है। विदित है कि दिल्ली से लेकर हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक फैली हुई अरावली श्रृंखला की लम्बाई 675 किलोमीटर है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के चलते मात्र 25 किलोमीटर की पहाडिय़ों को संरक्षण मिल पायेगा, बाकी अरावली को सत्तारूढ़ दल बेच खाने को स्वतंत्र हो गया है। इसी के संदर्भ में निम्र नाटिका प्रस्तुत की गई है। 1 पात्र: जज महोदय। – दरबान । – अरावली पर्वत । – भीड़ (परदे के पीछे) दृश्य: न्यायालय कक्ष। जज: रुको जरा, सब करो। ये बताओ तुम्हारी ऊँचाई क्या है? अरावली: जी, कहीं दस फीट, कहीं सौ फीट, कहीं दो सो फीट तो कहीं इससे भी ज्यादा। जज: ये फीट-वीट में मत बताओ। ये बताओ कि सौ मीटर से कम या ज्यादा? अरावली: जी, पहाड़ क्या मीटर से अस्तित्व में आते हैं? पहाड़ तो पहाड़ है, चाहे जितने भी ऊँचे हों। दरबान: देखा जनाब, बुझने को है पर कितना फडफ़ड़ा रहा है। अब भी चुप नहीं हो रहा। जज: अरे तुम तो चुप करो। 2 (क्रोधित होते हुए) जितना पूछा जाए सिर्फ उतना जवाब दो। तुम कोई मनुष्य थोड़े ही हो जो कम या ज्यादा हाइट के बावजूद मनुष्य ही रहो। अरावली: साहब, मेरी हाइट आपसे तो ज्यादा ही है। रही बात मनुष्य की, तो अब मनुष्य को भी मनुष्य कहाँ समझा जाता है। अधिकार के साथ तो भेड़ बकरियों जैसा बर्ताव है। जज: तुम फिर ज्यादा बोल रहे हो। आज से तुम्हें जान लेना है कि यदि किसी को पहाड़ कहलाना है तो उसे कम से कम सौ मीटर ऊँचा होना ही होगा। सौ मीटर से कम को भला क्या पहाड़ कहें। (दरबान की ओर देखकर) (दरबान सहमति में सिर हिलाता है) अरावली: (रुआँसा होते हुए) सो गीटर। ये क्या पैमाना है पहाड़ों को मापने का? मेरा एक टुकड़ा भी मनुष्य की हजारों पीढिय़ों से ज्यादा जीता है। मैंने करोड़ों वर्ष देखे हैं। कभी दुनिया का सबसे ऊँचा पहाड़ था मैं। अब समय के थपेड़ों ने मुझे कहीं सौ मीटर से कम या कहीं ज्यादा छोड़ दिया है। बाकी में पहाड़ हूँ-मेरे बारे में मुझसे ज्यादा अच्छा कौन बता सकता है। जज: हम बता सकते हैं। देखो भाई, न्याय करना हमारा काम है। हमें लगा सौ मीटर ठीक है तो सौ मीटर ही ठीक है। अब तो यही परिभाषा होगी पहाड़ की। अरावली: साहब, मैं जहाँ सौ मीटर से ज्यादा हूँ, वहाँ भी जेसीबी से मुझे काटा जा रहा है। उनका क्या? वहाँ भी मुझे कहाँ पहाड़ समझा जा रहा है? जज: देखो, पहले क्या हुआ हमें नहीं पता। हम यहाँ न्याय के लिए बैठे हैं। जब कभी ऐसा लगने लगे कि सौ मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर जेसीबी चल रही है, तो आप हमें बताओ। हम फिर न्याय करेंगे। (कुटिलता से) दरबान: साहब वैसे अब 100 मीटर से ऊपर कहाँ बचा। अब तो जेसीबी ही जेसीबी विकास ही विकास। वैसे ही खूब पत्थर मिल जाएगा। (हँगी) अरावली: जी लाई, पहले भी तो माननीय न्यायालय ने 1992 में मुझमें खनन पर रोक लगाई है। जज: देखो रेत के भी टीले होते हैं, उनसे रेत उठाना कोई खनन नहीं। तुम भी अपने आपको ऐसा ही समझो। बाकी जो गलतियाँ न्यायालय से अतीत में हुई हैं, जरूरी तो नहीं कि उनको अभी भी जारी रखा जाए। बाकी ये काम हमें देखना है कि क्या ठीक है। अरावली: लेकिन मेरे लिए क्या ठीक है, ये तो मुझे भी देखना चाहिए। जज: नहीं, हम देख लेंगे। हम फुर्सत बैठे हैं। अरावली: जी लाई, मुझे कितने ही लोग घूमने आते हैं। जज: अरे भाई। पहाड़ घूमना हो तो हिमाचल जाओ, कश्मीर जाओ। हमारी तरह स्विट्जऱलैंड जाओ। ये सेटल क्लास लोग भी पता नहीं अरावली में घूमने। (बड़बड़ाते हुए) अरावली: जी लाई, कितने जीव-जन्तुओं का निवास है मैं। जज: (दरबान से) कोई टाइगर रिजर्व तो सौ मीटर से ऊँचा होगा। दरबान: हाँ साहब, दो हैं-एक अलवर में और एक सवाई माधोपुर में। 3 जज: हाँ हाँ, कोई बात नहीं। उनकी व्यवस्था हम कर देंगे। सभी जीव-जन्तुओं को अलवर ओर सवाई माधोपुर भेज देंगे। ये वही ठीक हैं। दरबान: क्या साहब, वहाँ जीव-जन्तु ही रहते हैं। जज: अरे वहाँ के लोग भी कहाँ विरोध करते हैं। उन्हें भी जीव-जन्तु ही समझो। बाकी उनकी जो परिभाषा हम देंगे वही तो कानून बनेगा। अरावली: (बड़बड़ाते हुए) हाँ साहब, अभी जैसे आपने दिल्ली के सभी कुत्तों की व्यवस्था की थी, वैसे ही इनकी हो जाएगी। जज: देखो, ये दिल्ली वाले रूशस्रद्गह्म्ठ्ठ लोग हैं, पढ़े-लिखे हैं। ये कुत्तों के बारे में ज्यादा चिंतित हैं। बाकी तुम्हारे किसी को कोई लेना देना नहीं। अरावली: जी लाई, आपने बिल्कुल सही कहा। लेकिन दिल्ली में भी तो मैं हूँ। जज: देखो, दिल्ली में जहाँ-जहाँ तुम्हारा अस्तित्व है, वहीं-वहीं तुम लोगों की आँखों में चुभ रहे हो। उन्हें कॉलोनी काटनी है, होटल बनाने हैं, क्रद्गह्यशह्म्ह्ल हैं। ये सब तुम्हारी वजह से नहीं हो पा रहा पर हाँ, अब हो जाएगा। अरावली: जी लाई, मैं हरियाणा में भी तो हूँ। हरियाणा की हरियाली के नाम पर तो लेकर मैं ही हूँ। जज: देखो भाई, हरियाली से हरियाणा का कोई लेना-देना नहीं। वहाँ की सरकार ने तो कोरोना में ही तुम्हें खत्म करने का कानून पास कर दिया था। रही बात हरियाली की, तो पहले ही भारत में सबसे कम हरियाणा राज्य की है। खत्म भी हो जाएगी तो उन्हें कौन सा फर्क पडऩे वाला है। उनकी अरावली की ज़मीन अब तक बिकती नहीं थी। अब करोड़ों रुपया कोयला का मिलेगा। वो तुम्हें सबसे पहले बेचने को तैयार बैठे हैं। अरावली: जी लाई, उनके पास और विशेषकर गुडग़ांव, फरीदाबाद के पास तो मेरे अलावा ऑक्सीजन कहीं और से मिलेगी ही नहीं। जज: तुम भी बहुत नादान हो। उन्हें तुम्हारी फिक्र होती तो बंधवाड़ी का कूड़ा का पहाड़ तुम्हारे सर पर न बनाते। उन्हें ऑक्सीजन नहीं, मेट्रो चाहिए। भाई गुडग़ांव से फरीदाबाद मेट्रो चलेगी तो उसे खाली तो चलाएँगे नहीं। क्चह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य रूशस्रद्गद्य है। इसलिए अरावली क्षेत्र में भी लोग बसेंगे तभी तो गेट्रो का आनंद आएगा। चालीस मिनट में फरीदाबाद से गुडग़ांव। अरावली: मेरे बिना वो चालीस मिनट भी जीवित न रह सकेंगे। जज: उसकी चिंता तुग मत करो। (दरबान से) पहले साहिबी नदी भी यही कहती थी। आज नजफगढ़ नाला बनकर बहती है। पहले यमुना भी यही कहती थी। अब 2041 के मास्टर प्लान को लागू होते ही उसको भी वजीराबाद नाला बनने में कौन सी देर है। (अरावली की ओर देखकर, तेज आवाज में) लोगों के पास पैसा है, वो ऑक्सीजन की व्यवस्था कर लेंगे। वैसे भी तुम्हारी इजरायली बबूल कौन-सी ऑक्सीजन दे रही है। अरावली: हाँ, जैसे उन्होंने बडख़ल को एसटीपी कचरे में बदल दिया है, वैसे ही ऑक्सीजन ले लेंगे। विनाश काले, विपरीत बुद्धि। जज: (दरबान से) ये हरियाणा में अरावली सबसे ऊँची कहाँ है? दरबान: साहब, टांकड़ी, रेवाड़ी में। जज: (दरबान से) वो माउंट आबू में कौन-सी चोटी है? दरबान: जी, गुरु-शिखर। जज: हाँ भाई, टांकड़ी में टंगे हुए रहोगे न तुग। वहीं तुम्हारे दर्शन कर लेंगे लोग। अरावली: (निराश होकर) जी लाई, राजस्थान की तो शान में ही हूँ। वहाँ तो आप मुझे पहाड़ मानेंगे न? जज: हाँ क्यों नहीं, गुरु-शिखर पर। और जहाँ जयपुर में टॉप रखी है, जयगढ़ जैसी कुछ जगह पर तो म्यूजियम की तरह तुम्हें रखेंगे। दरबान: (खिलखिलाते हुए) राजस्थान में म्यूजियम कल्चर जो है। एक म्यूजियम “अरावली म्यूजियम भी हो जाएगा। दुनिया का पहला पर्वत म्यूजियम। अरावली: जी, गुजरात में भी तो में हूँ न? (सिसकते हुए) 4 जज: भाई, दिल्ली और गुजरात में व्यापारी हैं। उन्हें तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं। और उन्हें जो ज़मीन चाहिए वो तुम्हारी अर्थी पर ही सजेगी। एक बार कह दिया “सौ मीटर तो बस सौ मीटर”। अब इस पर कोई बहस नहीं। और अब बहुत हो गई तुम्हारी दलील। अब तुम्हारा केस खत्म। मुझे और भी केस निपटाने हैं। (लाल स्याही में टिप्पणी: “एक बार कह दिया सौ मीटर तो बस सौ मीटर अब इस बात पर कोई बहस नहीं।”) भीड़: बधाई हो! बधाई हो। पहला: अब जाकर रास्ते का काँटा कटा। बहुत सालों से प्रतीक्षा कर रहे थे इस निर्णय की। दूसरा: हाँ! अब तो चाँदी ही चाँदी। तीसरा: लकडिय़ाँ ही लकडिय़ाँ। लकडिय़ों का टेंडर मेरा। वोथा: पत्थर की खान मेरी। पाँचवाँ: प्रॉपर्टी ही प्रॉपर्टी। भीड़: बधाई हो! बधाई हो! जज: ऑर्डर ऑर्डर अब अरावली का केस खत्म। मुझे और भी केस निपटाने हैं। अरावली: (क्रोध में) जी, निपटाने ही तो है। न्याय तो करना नहीं। लोगों को भी कहाँ न्याय चाहिए। करोड़ों वर्षों से मैंने लोगों को पाला-पोसा। आज मुझे इनकी जरूरत है तो कोई मेरे लिए न्याय के लिए आगे नहीं। याद रखना, आज मैं खत्म हो रहा हूँ तो यह तुम्हारे भी खत्म होने का कारण बनेगा। और जब तुम खत्म हो जाओगे तो हग पहाड़ फिर से फलेंगे-फूलेंगे। आज तुम तमाशा देख रहे हो, कल हम तमाशा देखेंगे। (सिसकते हुए) तुम्हें तो सब निपटाना है न, तो आज में निपट रहा हूँ, कल तुम भी निपटोगे, कल तुम भी निपटोगे। (परदा गिरता है) अध्यक्ष प्रेसिडेंट ग्रीन इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट फरीदाबाद, हरियाणा