विनोद वर्मा
पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था.
फिर वे ट्रेड यूनियन वालों के लिए आए मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था.
फिर वे यहूदियों के लिए आए मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था.
फिर वे मेरे लिए आए लेकिन तब तक कोई नहीं बचा था जो मेरे लिए बोलता.
यह कविता तानाशाह हिटलर के नाज़ी शासन काल के दौरान जर्मन कवि पादरी मार्टिन निमोलर ने लिखी थी. यह कविता आज के भारत पर भी लिखी जा सकती है. एक बहुत लंबी कविता लिखी जा सकती है. क्योंकि हम दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक के नागरिक हैं जो सब कुछ को ख़ामोशी से देख रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हमें लग रहा है कि जो आग दिख रही है, उसकी आंच हम तक नहीं पहुंचेगी. वे क्रिसमस पर चर्चों के सामने हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हम ईसाई नहीं हैं. वे चर्चों में तोडफ़ोड़ कर रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हम चर्चों में प्रार्थना करने नहीं जाते. वे ईद पर मस्जिदों पर चढ़कर भगवा झंडा फ़हरा रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हम मुसलमान नहीं हैं. वे दलितों को नंगा करके पेड़ से बांधकर पीटते हैं. हम चुप हैं क्योंकि हम दलित भी नहीं हैं. वे आदिवासी के सर पर पेशाब करते हैं. हम चुप रहते हैं क्योंकि हम आदिवासी भी नहीं हैं. वे गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे और कलबुर्गी की हत्या कर देते हैं. हम चुप रहते हैं क्योंकि हमें लगता है कि वे हममें में से एक नहीं थे. वे सामूहिक बलात्कार के अपराधियों को जेल से रिहा कर देते हैं. हम चुप रहते हैं क्योंकि जिसका बलात्कार हुआ वो हमारी बहन या बेटी नहीं थीं. वे बलात्कारी के ज़मानत पर रिहा होने पर उसका माला पहनाकर स्वागत करते हैं. हम चुप रहते हैं क्योंकि बलात्कार पीडि़ता हमारी रिश्तेदार नहीं है. वे बलात्कार और हत्या के आरोप में जेल में बंद बाबाओं को चुनावों के समय पैरोल पर रिहा करते हैं. हम चुप रहते हैं क्योंकि न बलात्कार का शिकार हमारी बहन बेटी हुई और न हत्या हमारी हुई. वे हमारे जंगलों को काट कर उनको बंजर खदानों में बदलने की अनुमति दिलवा रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हम जंगलों में नहीं रहते. वे हमारे पहाड़ों को काटकर समतल करने को सही ठहरा रहे हैं. हम चुप हैं क्योंकि हमारा उन पहाड़ों से कोई लेना देना नहीं है. वे जांच एजेंसियों के ज़रिए हर उस व्यक्ति को डरा धमका रहे हैं जो उनके साथ नहीं खड़ा है. हम चुप हैं क्योंकि हम चुप रहकर भ्रम बनाए रखना चाहते हैं कि हम उनके ही साथ हैं. वे चुनावों को धूर्त शकुनि के पासों के ज़रिए खेले जा रहे चौसर के खेल की तरह खेलते हैं. हम चुप हैं क्योंकि हमें लगता है कि राजनीति से हमारा क्या लेना देना? वे हमें चुप कराते हैं. और हम चुप रहते हैं. वे बताते हैं कि हिंदू ख़तरे में है. और हिंदू अपने आपको ख़तरे में महसूस करते हैं. वे हमें डराते हैं कि भारत के 80 प्रतिशत हिंदुओं को 15 प्रतिशत मुसलमानों और तीन प्रतिशत ईसाइयों से ख़तरा है. वे ऐसे शातिर, कुटिल, धूर्त और षडयंत्रकारी हैं जिन्होंने पिछले सौ सालों से हिंदुओं को समझा रखा है कि वे ख़तरे में हैं. वे हिंदुओं के स्वयंभू रक्षक बन बैठे हैं. हम चुप हैं. हम चुप हैं. हम चुप रहेंगे.
******** सच यह है कि यह देश सचमुच ख़तरे में है. यह देश ख़तरे में है क्योंकि हमारा संविधान ख़तरे में है. हमारी संवैधानिक संस्थाएं ख़तरे में हैं. हमारे जल, जंगल, पहाड़ और ज़मीन ख़तरे में हैं. दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक सब ख़तरे में हैं. हम ख़तरे में हैं क्योंकि हमारी अंतरात्मा धीरे धीरे मर रही है. हमें दूसरों का दुख अब अपना दुख नहीं लगता. दूसरों की तकलीफ़ अब अपनी तकलीफ़ नहीं लगती. हमें दूसरों की बेटियां अपनी बेटियों की तरह नहीं लगतीं. मनुष्य शेष जीवों से इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास मस्तिष्क है. वह सोच सकता है. अपना अच्छा बुरा समझ सकता है. हम ख़तरे में हैं हमने सोचना बंद कर दिया है. हम अपना अच्छा बुरा नहीं समझ पा रहे हैं. वे जिस दिन हमारे लिए आएंगे, उस दिन कोई नहीं बचा होगा. सिर्फ़ वे होंगे. वे कौन हैं? पहचानते हो या नहीं? तब तो आप सचमुच ख़तरे में हैं.