फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) करीब सात-आठ साल पहले भी शहर भर की तमाम स्ट्रीट लाइटों को हटा कर उनकी जगह एलईडी लाइटें लगाने की घोषणा की गई थी। अब फिर वैसी ही घोषणा करते हुए शहर की 31 हजार पुरानी लाइटों को हटा कर नई एलईडी लाइटें लगाई जाएंंगी। तर्क दिया जा रहा है कि इन लाइटों से बिजली का बिल कम आता है। संदर्भवश सुधी पाठक जान लें कि जो लोग बिजली बिल के बचत की बात कर रहे हैं उन्हें दिन के समय भी लाइटें बुझाने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती। बाटा आरओबी सहित लगभग आधे शहर की स्ट्रीट लाइटों को दिन भर जलते देखा जा सकता है।
यदि लाइटें बदलनी भी हैं तो यह क्या जरूरी है कि सारी एक ही दिन बदली जाएं? जो-जो पुरानी लाइट खराब होती जाए, उसकी जगह नई एलईडी लाइट लगाते जाएं। परन्तु ऐसा करने से वह मोटी लूट कमाई तो नहीं हो सकती जो थोक के भाव में 31 हजार एलईडी लाइटें खरीदने पर होगी। इतना ही नहीं पुरानी उतरने वाली लाइटें भी तो अधिकारियों को कुछ न कुछ देकर ही जाएंगी। शहर भर में लगी सैकड़ों टै्रफिक लाइटों में से आधे से अधिक कई महीनों से खराब पड़ी हैं। इसके चलते आते-जाते वाहन चौराहों पर फंस कर खड़े हो जाते हैं, कई बार तो दुर्घटना भी हो जाती हैं। जो सरकार वाहनों के चलान करके करोड़ों रुपए की वसूली करती है, उसे इन लाइटों को ठीक कराने में क्या मुसीबत आ रही है?
एलईडी लाइटों की घोषणा के साथ-साथ नगर निगम ने यह भी घोषित किया है कि शीघ्र ही वह पांच एकड़ ज़मीन पर 17 करोड़ फूलों के बीज बोकर पनीरी तैयार करके नगरवासियों को मुफ्त बाटेंगे जिससे शहर की सुंदरता बहुत बढ़ जाएगी। खैर, फूलों से आने वाली इस सुंदरता को उफनते हुए सीवरों की गंदगी से कैसे बचाया जाएगा, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल एक पत्रकार द्वारा पूछे जाने पर निगमायुक्त धीरेंद्र खडग़टा यह नही बता पाए कि पांच एकड़ का यह भूखंड कहां पर होगा? और इसके लिए कितना बजट रखा गया है? वे यह भी समझाने में असफल रहे कि 17 करोड़ बीजों का क्या हिसाब है?
बताए गए रकबे पर यदि इतने बीज बोए जाएं तो एक सेंटीमीटर में 11 बीज बोने पड़ेंगे जो कि असम्भव है। जाहिर है यह सब ख्याली पुलॉव है। जब निगमायुक्त को कुछ नहीं सूझा तो यह सारा धंधा उन्होंने किसी एनजीओ के खाते में डाल दिया। कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि यह निरा ख्याली पुलाव नहीं है, बल्कि किसी नर्सरी वाले को मुफ्त में सरकारी जमीन देने का एक षड्यंत्र है।
सुधी पाठकों को बताते चलें कि शहर को फूलों से सजाने के नाम पर हर साल पचासों लाख दाएं-बाएं करने का निगम का इतिहास रहा है। साल 2022 मेें नगर निगम ने यादव कोऑपरेटिव लेबर एंड कंस्ट्रक्शन सोसायटी लिमिटेड सोहना नाम की कंपनी को एनआईटी विधानसभा क्षेत्र में 25 हजार पौधे लगाने का ठेका 49 लाख रुपये में दिया था। तीन महीने में पौधरोपण किया जाना था जो हुआ नहीं, जुर्माना लगाने के बजाय कंपनी को पांच महीने का अतिरिक्त समय दिया गया। अचानक निगम के हॉर्टीकल्चर विभाग ने कंपनी को सर्टिफिकेट जारी कर दिया कि पौधरोपण हो गया है। खुला खेल फर्रुखाबादी ऐसे पकड़ में आया कि पौधरोपण एनआईटी विधानसभा क्षेत्र में होना था और फोटो लगाई गई थीं बडख़ल व फरीदाबाद विधानसभा क्षेत्र की। कंपनी को 49 लाख में ट्री गार्ड, ग्रिल आदि भी लगाने थे उनका कोई अता पता नहीं। जाहिर है कि बिना काम के सर्टिफिकेट ऐसे ही जारी नहीं किया गया होगा, बहुत संभव है कि कंपनी को केवल पांच दस प्रतिशत चुग्गा डाल कर बाकी सारी रकम की बंदरबांट की गई होगी, संभवत: इसीलिए तत्कालीन एनआईटी विधायक द्वारा शिकायत और विजिलेंस जांच कराने की मांग के बावजूद न तो कोई जांच हुई और न ही कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई।
इतना ही नहीं इसी साल फरीदाबाद विधानसभा में भी पौधे लगाने के नाम पर करीब 50 लाख रुपयों की बंदरबांट हुई थी। तत्कालीन भाजपा विधायक नरेंद्र गुप्ता ने इसे खुला भ्रष्टाचार कहते हुए तगड़ी नाराजगी जताते हुए जांच कराने की मांग की थी। तब निगम अधिकारियेां ने कुतर्क दिया था कि पचास लाख रुपये जिन पौधों पर खर्च किए गए हैं उनकी उम्र ही तीन महीने की थी, तीन महीने गुजरे और पौधे खत्म। विधायक को निगम अधिकारियों का कुतर्क पसंद नहीं आया था और उन्होंने तत्कालीन सीएम खट्टर से कार्रवाई करने की मांग की थी लेकिन खट्टर भी उसी कुएं का पानी पी रहे थे जिसमें भ्रष्टाचार की भांग घुली हुई थी, तो उन्होंने नरेंद्र गुप्ता की शिकायतें रद्दी टोकरी में डाल कर अपने भ्रष्ट निगम अधिकारियों का मनोबल बढ़ाने का काम किया था।
मज़दूर मोर्चा ने 2-8 जनवरी 2024 के अंक में नगर निगम में अब पौधरोपण घोटाला शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर शहरों को फुलवारी से सजाने की हकीकत खोली थी। समझा जा सकता है कि निगम अधिकारियों को अच्छी तरह समझ में आ गया है कि लूट कमाई का सबसे सुरक्षित और शाबाशी पाने वाला फार्मूला फूल पौधे लगाने की मद में खर्च करना है, जमकर लूट मार करो, सवाल उठे तो बता दो कि तीन महीने ही जीवन था सो पौधा खत्म हो गया, जाओ करा लो जांच। करोड़ों रुपये हजम करने वालों के लिए पचास लाख रुपये ऊंट के मुुंह में जीरा लग रहे थे, तो अबकी पच्चीस हजार पौधों की जगह सीधे 17 करोड़ का लक्ष्य रख दिया है। पच्चीस हजार पौधों के लिए पचास लाख रुपये की दर से पाठक खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने करोड़ के खेल की तैयारी है। जानकार तो यह भी कहते हैं कि ये निगमायुक्त जिन एनजीओ का सहयोग लेने की बात कर रहे हैं वो केवल सत्तापक्ष और संघियों की बनाई संस्थाएं होंगी, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए यह सारा खेल रचा जा रहा है।