फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) किसकी दिवाली हैप्पी हुई और किसकी नहीं, यह तो खोज का विषय है, परन्तु वायु प्रदूषण न केवल शहर का बल्कि पूरे क्षेत्र का हैप्पी हो गया है। सोमवार की शाम से जो पटाखों की बमबारी शुरू हुई वह रात भर इस तरह चलती रही कि मानो किसी युद्ध क्षेत्र में सेनाएं बमबारी कर रही हों। बेशक इस पटाखेबाजी के लिए सुप्रीमकोर्ट द्वारा सायं आठ बजे से दस बजे तक का समय रखा गया था और इस दौरान भी केवल ग्रीन पटाखे चलाने की ही अनुमति दी गई थी। लगता है कि प्रशासन की घड़ी 10 बजे के बाद रुक गई और सुबह होने तक दस से आगे नहीं बढ़ी। बढ़कर करती भी क्या क्योंकि प्रशासन के पल्ले है ही क्या जो किसी प्रकार की रोक-थाम कर सके।
रही बात ग्रीन पटाखों की तो जिस प्रशासन की घड़ी दस बजे के बाद चलनी ही बंद हो गई हो वह भला कैसे पता लगा पाएगा कि पटाखे ग्रीन चल रहे हैं या रेड? पटाखे चाहे ग्रीन चलें या रेड, ऑक्सीजन तो किसी से भी नहीं निकलती, सभी से निकलने वाला बारूदी धुआं वायु को और धमाके घ्वनि प्रदूषित करते हैं। सबूत सामने है, सारी रात धमाकों ने सोने नहीं दिया और सुबह हुई तो वायु मंडल में बारूदी धुएं ने स्वागत किया।
कोढ़ में खाज की तरह जगह-जगह कूड़े व रबर-प्लास्टिक युक्त कबाड़े के ढेरों के जलने से उठने वाला धुआं वायु प्रदूषण को और भी बढ़ा रहा है। शुक्र ये रहा कि इन 24 घंटों में बिजली आपूर्ति बनी रहने के चलते जेनरेटरों का धुआं दिखाई नहीं दिया। ग्रेप अभी भी $फाइलों से बाहर निकला प्रतीत नहीं हुआ। सड़कों पर बने गड्ढों तथा किनारे पड़ी धूल प्रदूषण बढ़ाने में अपना पूरा योगदान कर रही है। पानी छिड़काव करने वाले टैंकर तथा स्मॉग कण शायद अभी $फाइलों में ही अटके हैं, वहीं से बिल बन कर मोटी रकमें ठिकाने लग जाएंगी। रकम डकारने वाले प्रार्थना करेंगे कि प्रदूषण आता रहे और उनका काम चलता रहे।
हर बार की तरह अब सरकार पराली जलाने के नाम पर किसानों को जिम्मेदार नहीं ठहरा पा रही क्योंकि पंजाब व हरियाणा के बड़े हिस्सों में बाढ़ के चलते धान की फसल बर्बाद हो चुकी है। जाहिर है ऐसे में जब धान की कटाई ही नहीं होगी तो पराली कहां से जलेगी? वैसे भी बीते दो वर्षों से 90 प्रतिशत किसानों ने पराली को जलाने की अपेक्षा इससे कमाई का विकल्प खोज लिया है। इसके बावजूद भी सम्भव है कि सरकार के कोई न कोई मूर्ख अधिकारी अपना पिंड छुड़ाने के लिए पराली जलाने का पुराना बहाना इस्तेमाल कर लें।
सर्वविदित है कि वायु प्रदूषण के चलते अस्थमा के मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा छोटे बच्चे सांस व आंखों सम्बन्धी कई रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि बीड़ी-सिगरेट न पीने वाले भी प्रदूषित वायु से अपने फेफड़ों को क्षतिग्रस्त होने से नहीं बचा पाते। सड़कों से उडऩे वाली धूल के अति महीन कण फेेफड़ों में एक बार जाने के बाद सीमेंट की तरह जम जाते हैं, उन्हें बाहर निकालने की कोई विधि अभी तक सामने नहीं आई है। इन्हीं डॉक्टरों का मानना है कि प्रदूषित वायु उस धीमे जहर की तरह है जो मनुष्य के जीवन काल को घटाता है। इसके बावजूद भी वायु प्रदूषण के विरुद्ध अभी तक कोई जन आंदोलन खड़ा होता नजर नहीं आ रहा।