अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा द्वारा शानदार मार्च व सभा फिऱकापरस्त- नफरत की राजनीति करने वालों का चुनाव में सबक सिखाओ

अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा द्वारा शानदार मार्च व सभा फिऱकापरस्त- नफरत की राजनीति करने वालों का चुनाव में सबक सिखाओ
May 05 06:11 2024

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चाृृ
1 मई, मज़दूर दिवस, मज़दूरों के गौरवशाली इतिहास का वो शानदार पन्ना है, जिसकी चमक, दुनियाभर का सर्वहारा, कभी फीकी नहीं पडऩे देगा. शिकागो के अमर शहीदों की ख़ामोश आवाजें, जिन्हें एक गहरी साजि़श के तहत, 11 नवंबर 1887 को ख़ामोश कर दिया गया था, इसी तरह दहाड़ती रहेंगी, मज़दूरों की श्रम शक्ति की लूट पर जिंदा, परजीवी सरमाएदारों को हमेशा डराती रहेंगी. बुद्धवार, 1 मई को, फऱीदाबाद के मज़दूर, 1886 की मई के पहले सप्ताह में, अमेरिका के शिकागो शहर में, अमेरिकी पूंजीपति लुटेरों को ललकारने वाले, शूरवीर योद्धाओं के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने, लाल सलाम प्रसुत करने और उनकी अधूरी लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाने के अहद को दोहराने के लिए, शाम 5.30 बजे, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ के बैनर तले, रामशरण चौक, आज़ाद नगर सेक्टर 24, फऱीदाबाद में इक_े हुए, और औद्योगिक क्षेत्र की प्रमुख सडक़ पर मार्च करते हुए, लखानी चौक पहुंचकर सभा में तब्दील हो गए.

ज़ोरदार नारों के साथ कार्यक्रम का आगाज़ हुआ. ‘निशांत नाट्य मंच’ से जुड़े, प्रतिष्ठित कलाकार, साथी लाल बहादुर सिंह के नेतृत्व में, सांस्कृतिक टीम ने जब क्रांतिकारी गीत, ‘सहते-सहते मरने से अच्छी है, लड़ाई.. ओ भाई हाथ उठा.. ओ बहना हाथ उठा..’ गाया, तो उपस्थित लोग भी उसमें शरीक़ हो गए और अद्भुत समा बंध गया. ‘मज़दूर दिवस’ मनाने के इतिहास पर बोलते हुए, वक्ताओं ने बताया कि मज़दूरों का हर अधिकार, उनकी शहादतों से ही हासिल हुआ है, उनके लहू से नम हुई ज़मीन से ही उपजा है. कोई भी अधिकार उन्हें खैरात में नहीं मिला. सडक़ के दोनों ओर खड़े, कारखानों से झांकते मज़दूर, मोर्चे में उठ रहे नारों का प्रतिसाद देकर, अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते गए और कारवां आगे बढ़ता गया. लखानी चौक से पहले, जेबीएम चौक पर, मज़दूरों के हुजूम के बीच एक और संक्षिप्त सभा हुई. वहां से कई मज़दूर, मोर्चे में शरीक़ हो गए जो अंत तक रहे और आगे सभी कार्यक्रमों में शामिल रहने की इच्छा जताते हुए, अपने मोबाइल नंबर भी साझा किए.

लखानी चौक पर 90 मिनट चली सभा में, ना सिफऱ् काम से अपने घर लौटते मज़दूर, बल्कि सडक़ पर आते-जाते लोग, अपने वाहन रोक कर संगठन द्वारा बांटे जा रहे पर्चे लेकर, नारों का जवाब देते हुए, अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे, और कार्यक्रम को उत्साहपूर्ण समर्थन देकर, हौसला बढ़ाते रहे. वहां भी, साथी लालबहादुर सिंह के गीतों ने, सभा की प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ाया. गीतों में शरीक होने से, लोग, खुद को रोक नहीं पा रहे थे. सभा को साथी नरेश, सत्यवीर, विनोद तथा चंदन ने संबोधित किया. मई दिवस के शहीदों के बलिदानों को याद करते हुए, वक्ताओं ने कहा कि किस तरह, आज, मज़दूरों की असीम कुर्बानियों से हांसिल अधिकारों को छीना जा रहा है, जिसे मज़दूर किसी क़ीमत पर नहीं होने देंगे. ऐसा होने देना, शिकागो के अमर शहीदों, अल्बर्ट पार्सस, अडोल्फ़ फिशर, अगस्त स्पाइस, जॉर्ज एंजेल, लुई लिंग, माइकल शौब, समुएल फिल्देन तथा ऑस्कर निम्बे, की कुर्बानियों का अपमान होगा.

वक्ताओं ने अपनी जोशीली तकऱीरों में बताया कि देशभर के मज़दूर इक_े होते जा रहे हैं, गोलबंद होते जा रहे हैं. साथ ही, मज़दूरों- किसानों का साझा मोर्चा ठोस आकार लेता जा रहा है. मध्यम वर्ग को अपना भविष्य घुप्प अंधकारमय नजऱ आ रहा है, इसीलिए ये समूह, सरकारी कीर्तन को छोड़, मज़दूरों-किसानों के नज़दीक आता जा रहा है. देश के मु_ीभर कॉर्पोरेट और उनकी ताबेदार मोदी सरकार, भले, सत्ता के नशे में गाफि़ल हैं, बौराए हुए हैं, लेकिन मेहनतकशों- कमेरों की विशाल, अजेय सेना, हर रोज़ सजती जा रही है. वर्ग-चेतना से लैस होती जा रही है. वह दिन दूर नहीं, जब, मज़दूर-किसान मिलकर, पूंजी के इस फ़ासीवादी, घोर दमनकारी, हिंसक राज़ को, हमेशा के लिए, इतिहास के कूड़ेदान में डालने की अपनी तारीखी जि़म्मेदारी पूरी करने का बिगुल फूंकेंगे. वक्ताओं द्वारा, ये मांगे भी रखी गई, जिनका समर्थन, उपस्थित मज़दूरों ने तालियों और ज़ोरदार नारों से किया.

1) बेतहाशा मंहगाई के मद्देनजऱ, न्यूनतम वेतन, रु 25,000/ प्रति माह, तथा रु 1000/ दिहाड़ी, तत्काल घोषित किए जाएं और उनका अनुपालन सुनिश्चित किया जाए,

2) 44 श्रम अधिकारों को रद्द कर लाई जा रहीं 4 लेबर कोड रद्द करो.

3) मज़दूरों की नई गुलामी, जानलेवा ठेकेदारी प्रथा को रद्द करो.

4) सभी श्रम क़ानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करो. पीएफ, ईएसआईसी कटौती का पैसा डकारने वाले कारखानेदारों को जेल में डालो. अपना रोजग़ार खोने के खौफ़ से मज़दूर, श्रम क़ानूनों के उल्लंघन की शिकायत करने से भी डरते हैं. श्रम क़ानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करना, श्रम विभाग की जि़म्मेदारी है. कारखानों के औचक निरिक्षण की पद्धति को फिर से शुरू किया जाए, ‘व्यवसाय की सुगमता’ को, ‘मज़दूरों का खून निचोडऩे की सुगमता’ बनाने से बाज़ आओ.

5) ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज तथा सभी अस्पतालों-डिस्पेंसरियों में चिकित्सा सुविधाएं बढाओ. सभी रिक्त पड़े पदों को तत्काल भरो. मज़दूरों से इकठ्ठा की गई, 1.75 लाख करोड़ की विशाल रक़म को मज़दूरों की चिकित्सा पर खर्च करो, उसे कॉर्पोरेट गिद्धों से बचाओ.

6) मज़दूरों के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे, इसलिए नशे के शिकार होते जा रहे हैं. मज़दूरों के बच्चों को समूची शिक्षा, हॉस्टल फ़ीस सहित निशुल्क उपलब्ध कराओ.

7) नशाखोरी, अश्लील, फूहड़ विडियो पर सख्ती से रोक लगाओ. महिला उत्पीडक़ नेताओं को संरक्षण देना बंद करो.

8) सबसे अहम, समाज को बांटने वाली, फिऱकापरस्त-नफऱत की राजनीति से बाज़ आओ. हिन्दू-मुस्लिम हमेशा इकट्ठे  रहे हैं और इकट्ठे ही रहेंगे. ज़हरीली राजनीति करने वालों को, वे, सबक़ सिखाने का मन बना चुके हैं. मौजूदा चुनाव में, उन्हें, वे, उनकीसही जगह दिखाकर रहेंगे.

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Mazdoor Morcha
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