ट्रम्प की शक्ति प्रदर्शन की आदत दुनिया को तबाही में धकेल न दे

ट्रम्प की शक्ति प्रदर्शन की आदत दुनिया को तबाही में धकेल न दे
March 30 18:38 2026

आलोक बाजपेयी
यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं है; यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। यदि दुनिया चुप रहती है, तो यह मिसाल भविष्य में और भी ख़तरनाक सैन्य हस्तक्षेपों को वैधता दे सकती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका ने दुनिया को एक और टाली जा सकने वाली तबाही की ओर धकेल दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी और इजऱाइली संयुक्त बलों ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के नाम से ईरान के खिलाफ एक व्यापक हवाई अभियान शुरू किया। इस अभियान ने पहले ही हजारों लोगों की जान ले ली है, नागरिक ढांचे को नष्ट कर दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है।

यह युद्ध—अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध, नैतिक दृष्टि से संदिग्ध और मानवीय दृष्टि से विनाशकारी—किसी भी ठोस और वैध कारण से रहित प्रतीत होता है। यह संघर्ष वास्तविक सुरक्षा चिंताओं से अधिक शक्ति-प्रदर्शन, भू-राजनीतिक पुनर्संरचना और राजनीतिक अहंकार का परिणाम लगता है। इसका प्रभाव केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है; इसने दुनिया भर के देशों में भय, अस्थिरता और आर्थिक संकट की आशंका को जन्म दिया है।

संदिग्ध दावों पर आधारित युद्ध
हमले अत्यधिक सैन्य शक्ति के साथ शुरू हुए। अमेरिकी मिसाइलों, ड्रोन और इजऱाइली लड़ाकू विमानों ने तेहरान, इस्फहान, क़ोम और अन्य शहरों में सैन्य तथा रणनीतिक लक्ष्यों पर प्रहार किए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या की खबर भी सामने आई, साथ ही परमाणु प्रतिष्ठानों, मिसाइल ठिकानों और सैन्य कमान केंद्रों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी प्रशासन का घोषित लक्ष्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को नष्ट करना, उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और अंतत: शासन परिवर्तन को मजबूर करना है। राष्ट्रपति ट्रंप ने “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग की है, जिससे स्पष्ट है कि यह केवल सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक दबाव की रणनीति है। लेकिन इस युद्ध के लिए प्रस्तुत किए गए औचित्य लगातार बदलते रहे हैं—कभी “आसन्न खतरे” की बात, कभी परमाणु कार्यक्रम को रोकने की आवश्यकता, और कभी बैलिस्टिक मिसाइलों को समाप्त करने का तर्क। स्वतंत्र विश्लेषकों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार किसी भी तत्काल या प्रत्यक्ष खतरे का स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है। यह स्थिति 2003 के इराक युद्ध की याद दिलाती है, जब संदिग्ध और बाद में झूठे साबित हुए दावों के आधार पर युद्ध छेड़ा गया था, जिसने पूरे क्षेत्र को दशकों तक अस्थिर कर दिया।

मानवीय त्रासदी
इस संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुका रहे हैं। पहले ही सप्ताह में ईरान में नागरिकों की मौतें हजार से अधिक बताई जा रही हैं। दक्षिणी ईरान के मीनाब में एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए हमले में 150 से ज़्यादा बच्चों की मौत की खबरों ने दुनिया को झकझोर दिया है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार युद्ध और उससे उत्पन्न आंतरिक अशांति में मरने वालों की संख्या हजारों से लेकर दसियों हजार तक पहुंच सकती है। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं, अस्पतालों और नागरिक ढांचों को नुकसान पहुंचा है, और क्षेत्रीय तनाव तेजी से बढ़ रहा है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में कई देशों में मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इस तनाव का एक बड़ा परिणाम हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का बंद होना है—दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक। इसके कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा, खाद्य और वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ा है। सबसे अधिक नुकसान गरीब और आयात-निर्भर देशों को झेलना पड़ रहा है।

परमाणु हथियारों पर विवाद
युद्ध का एक प्रमुख तर्क ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम को बताया जा रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAE) ने कई बार कहा है कि वह यह साबित नहीं कर सकी कि ईरान सक्रिय रूप से परमाणु हथियार बना रहा था। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने भी बार-बार कहा था कि परमाणु हथियार इस्लाम में हराम हैं और उन्होंने उनके खिलाफ एक धार्मिक फ़तवा जारी किया था। ईरान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा जैसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। फिर भी कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि परमाणु हथियारों का अभाव ही ईरान की कमजोरी बन गया। उनका कहना है कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं—जैसे उत्तर कोरिया या पाकिस्तान—उन पर सीधे सैन्य हमले का जोखिम बहुत कम होता है, क्योंकि परमाणु प्रतिरोध संभावित आक्रमण को रोकता है।

कानूनी और संवैधानिक सवाल
इस युद्ध की वैधता भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार किसी संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ सैन्य कार्रवाई केवल दो परिस्थितियों में वैध होती है—आत्मरक्षा में, या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से। इस मामले में इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती दिखती। यूरोपीय नेताओं, अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों और कई देशों ने इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। अमेरिका के भीतर भी संवैधानिक प्रश्न उठ रहे हैं। अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध घोषित करने का अधिकार कांग्रेस के पास है, जबकि 1973 का WAr Powers राष्ट्रपति को सीमित समय के भीतर कांग्रेस की अनुमति लेने के लिए बाध्य करता है। आलोचकों का कहना है कि इन प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है।

अमेरिका के भीतर विरोध
इस युद्ध के खिलाफ अमेरिका के भीतर भी महत्वपूर्ण विरोध उभर रहा है। कई सर्वेक्षणों के अनुसार अमेरिकी जनता का बड़ा हिस्सा सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करता। वॉशिंगटन डी.सी., न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स सहित कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कुछ नागरिक संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से संभावित युद्ध अपराधों की जांच की मांग भी की है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के राजनीतिक आधार के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं, जहां कुछ लोग इसे “अमेरिका फस्र्ट” नीति से विचलन मानते हैं।

वैश्विक प्रतिक्रिया
दुनिया के कई देशों ने इस युद्ध पर चिंता जताई है। यूरोप के कई सहयोगी इसमें शामिल होने से पीछे हट गए हैं। रूस ईरान को खुफिया जानकारी देने की बात कर रहा है, जबकि चीन स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में देखा है। भारत सहित कई ऊर्जा-आयातक देशों के लिए यह संघर्ष आर्थिक और रणनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।

दुनिया को अब कार्रवाई करनी होगी
यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं है; यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। संयुक्त राष्ट्र को इस मामले में तत्काल बहस और जांच शुरू करनी चाहिए। अमेरिकी कांग्रेस को भी संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए युद्ध की समीक्षा करनी चाहिए। भारत जैसे देशों के लिए, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं और क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं, कूटनीतिक दबाव बनाना महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि दुनिया चुप रहती है, तो यह मिसाल भविष्य में और भी खतरनाक सैन्य हस्तक्षेपों को वैधता दे सकती है। आखिरकार, सच्ची सुरक्षा शक्ति-प्रदर्शन से नहीं बल्कि न्याय, संयम और संवाद से आती है। बम और मिसाइलें केवल विनाश लाती हैं—और उनके सबसे बड़े शिकार हमेशा आम नागरिक ही होते हैं।
दुनिया को अब स्पष्ट संदेश देना होगा: बिना किसी वैध कारण के युद्ध स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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Mazdoor Morcha
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