अस्पताल में तो सिर्फ पोस्टमॉर्टम की सुविधा है फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले में झूला टूटने से हुए हादसे ने ट्रिपल इंजन सरकारों की आपदा प्रबंधन की पोल खोल दी है। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल बीके में इस तरह के हादसों से निपटने के कोई ठोस प्रबंध तक नहीं किए गए। यह तो अच्छा हुआ कि झूला औंधे मुंह नहीं गिरा, अन्यथा गंभीर रूप से घायल होने वालों की संख्या कहीं अधिक होती, बीके में तो सिर्फ उन्हें प्राथमिक उपचार देकर रेफर करने की ही सुविधा मिलती, क्योंकि यहां न तो ट्रॉमा सेंटर है न ही इमरजेंसी में आधुनिक सुविधाएं।
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में रोजाना औसतन चालीस-पचास हजार पर्यटक आ रहे हैं, इनमें सरकार के मंत्री, आला अधिकारी, उनके परिवार वाले, वीआईपी आदि में शामिल हैं। इतनी बड़े जन जमावड़े में हादसे की गुंजाइश से इनकार नहीं किया जा सकता। संभावित हादसे में घायल होने वालों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकारी अस्पताल में बाकायदा खास प्रबंध किए जाने चाहिए लेकिन बीके सिविल अस्पताल में इन दिनों चिकित्सा सेवाएं और भी लचर हो जाती हैं। कारण, मेले में आने वाले वीआईपी की सेवा टहल के नाम पर एक एसएमओ या विशेषज्ञ चिकित्सक, फार्मासिस्ट, नर्सिंग स्टाफ आदि चार-पांच लोग वीआईपी प्रोटोकॉल में तैनात रहते हैं। पहले से ही डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे अस्पताल में डॉक्टरों की वीआईपी ड्यूटी का खामियाजा सामान्य मरीजों को इलाज के लिए इंतजार करने में भुगतना पड़ता है। यानी सूरजकुंड मेले के लिए बीके अस्पताल में कोई खास प्रबंध नहीं हैं।
शायद यही कारण है कि झूला टूटने के बाद घायलों को बीके अस्पताल न भेज कर प्रशासन ने सुप्रीम नामक एक निजी अस्पताल में भिजवाया, हल्के फुल्के घायल तीन लोगों को ही बीके पहुंचाया गया, जहां से प्राथमिक उपचार और दर्द निवारक गोलियां देने के बाद सबको घर भेज दिया गया। घायलों के इलाज की सुविधा भले ही न हो लेकिन जिला अस्पताल होने के नाते यहां पोस्टमॉर्टम की सुविधा उपलब्ध है। झूला हादसे के घायलों को बीके नहीं लाया गया लेकिन जान गंवाने वाले इंस्पेक्टर जगदीश का शव पोस्टमॉर्टम के लिए बीके पहुंचा दिया गया।करीब 28 लाख आबादी वाले औद्योगिक शहर में दो हाइवे गुजरते हैं, चार ट्रैक की रेलवे लाइन, साल में दो बार सूरजकुंड मेला, इंडस्ट्रीज मेले आदि बड़े इवेंट होते हैं। यहां हादसे होते रहते हैं और बड़े हादसे से भी इनकार नहीं किया जा सकता, ऐसे में जिले में एक ट्रॉमा सेंटर की महती जरूरत है।
चिकित्सा मामलों के जानकारों के अनुसार किसी भी हादसे में पहला घंटा बहुत महत्वपूर्ण होता है, इस गोल्डन आवर में यदि घायल को इलाज मिल जाता है तो उसकी जान बचाने से लेकर जल्द रिकवरी करने में मदद मिलती है। बीके अस्पताल तो गंभीर रूप से घायलों को रेफर करने के सेंटर से ज्यादा कुछ नहीं है। मान लें कि झूले में गंभीर रूप से घायलों को बीके अस्पताल पहुंचाया जाता। यहां इलाज तो होने से रहा, प्राथमिक उपचार के बाद सभी को सफदरजंग दिल्ली रेफर कर दिया जाता, यानी गोल्डन आवर रेफरल के कागज तैयार करने और एंबुलेंस में ही खत्म हो जाता। इतने जोखिमों के बावजूद ट्रिपल इंजन सरकारें बीते कई वर्ष से ट्रॉमा सेंटर की घोषणाएं ही करती हैं लेकिन आज तक नहीं बना। दरअसल, एक ट्रॉमा सेंटर चलाने के लिए इमरजेंसी मेडिसिन, न्यूरोलॉजी, जनरल मेडिसिन, पीडियाट्रिक इमरजेंसी, पीडियाट्रिक आर्थोपेडिक, आर्थोपेडिक, जनरल सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, सर्जरी, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, रेडियोडायग्नोसिस विभाग, पैथालॉजी विभाग, बायोकेमिस्ट्री, आकस्मिक चिकित्सा कक्ष, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के लिए 24 घंटे स्टाफ की तैनाती जरूरी है। स्वास्थ्य सेवाएं निजी हाथों में सौंपने को आतुर ट्रिपल इंजन सरकारें अपने अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, और पैरा मेडिकल स्टाफ तो दे नहीं पा रही हैं तो ट्रॉमा सेंटर चलाने का इतना बड़ा स्टाफ कहां से देंगी। यही कारण है कभी मुख्यमंत्री, तो कभी कैबिनेट मंत्री, कभी केंद्रीय मंत्री तो कभी विधायक ट्रॉमा सेंटर का ढोल तो पीटते हैं पर धरातल पर किया कुछ नहीं।
यदि राजनेताओं में इच्छाशक्ति होती तो जनहित का मुद्दा समझ कर अब तक ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर के लिए जमीन मुहैया करा देते। पाठकों को याद दिलाते चलें कि कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल ने जनवरी 2025 को ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज को ट्रॉमा सेंटर के लिए जमीन मुहैया कराने की घोषणा की थी। यह घोषणा भी कोई आसानी से नहीं हो गई थी, इस घोषणा तक पहुंचने के लिए कॉरपोरेशन के पूर्व डीन डॉ. असीम दास व डॉ. अनिल पांडे को दो साल तक राजनेताओं से माथापच्ची करनी पड़ी थी। इस ट्रॉमा सेंटर में औद्योगिक श्रमिकों के साथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर हादसे में घायल होने वालों को तुरंत स्पेशलिस्ट चिकित्सा मिल सकती थी। एक साल से अधिक का समय बीत गया है मंत्री जी की घोषणा कागजों पर भी नहीं उतर सकी है।