मज़दूर मोर्चा ब्यूरो सुप्रीम कोर्ट के आधुनिक इतिहास में किसी इक्का-दुक्का को छोड़ कर तमाम पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट को न्याय बेचने की दुकान की तरह चलाते रहे हैं। मज़दूर मोर्चा द्वारा पूर्व में जिन न्यायाधीशों का नोटिस लिया गया है उनमें एक सीजेआई आरएस पाठक होते थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नौकरी पाने के लिए भोपाल गैस कांड को बेचा था। जस्टिस एएम अहमदी के बेटा-बेटी ने तो घर में ही न्याय बेचने की दुकान खोल रखी थी। कांत एंक्लेव से उनके हुए सौदे का विस्तृत विवरण उसी वक्त मज़दूर मोर्चा ने प्रकाशित किया था। हाल ही में अल्तमश कबीर ने अपनी नौकरी के आखिरी दिन मेडिकल कॉलेजों से अच्छा खासा सौदा किया था। जस्टिस सब्बरवाल ने अपने बिल्डर बेटे के व्यापार को बढ़ाने के लिए दिल्ली में भारी भरकम तोडफ़ोड़ कराई थी। केजी बाला कृष्णन ने किसी वकील को जज बनाने के पैसे तो ले लिए थे लेकिन जब उसका नाम नहीं आया तो वह बाकायदा कोर्ट में आ खड़ा हुआ और हंगामा किया था। उसे थाना तिलक मार्ग पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। इस पर बाला कृष्णन ने हस्तक्षेप कर उस वकील को छुड़ा कर समझौता कर लिया था ताकि मामला हाईलाइट न हो पाए। अपने खिलाफ यौन उत्पीडऩ के केस की सुनवाई कर खुद को निर्दाेेष करार देने वाले जस्टिस रंजन गोगोई को भी सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा जाना था सो उन्होंने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था। ये तो चंद एक मुख्य न्यायाधीशों के काले कारनामों की इक्का दुक्का बानगियां है इनका पूरा काला इतिहास प्रकाशित के लिए तो पूरी किताब ही लिखनी पड़ेगी।
ये चंद बानगियां तो उन जजों की हैं जिन्होंने ये धंधे पर्दे में रहकर लुक छिप कर किए थे। परंतु डीवाई चंद्रचूड ने तो पर्दे रखने की भी जरूरत नहीं समझी। वह तो पूरी तरह से बेपर्दा होकर बल्कि नंगा होकर पूरी बेशर्मी के साथ दो साल तक सीजेआई की कुर्सी पर चढ़ कर नाचता रहा।
इसके इतिहास में जाने से पता चलता है कि इसकी नियुक्ति भी बतौर हाईकोर्ट जज नियमों की उल्लंघना करके हुई थी। साधारणतय: 45 साल से पहले किसी को हाईकोर्ट का जज नहीं बनाया जाता है, लेकिन इसे 41 साल की उम्र में बनाया गया था, तत्कालीन राष्ट्रपति ने तो इसका विरोध भी किया था लेकिन उन पर इतना दबाव डाला गया कि उन्हें स्वीकृति देनी पड़ी थी। जिस आदमी की नियुक्ति ही इस तरह से हुई हो, उसके काले कारनामों की फेहरिस्त कितनी लंबी हो सकती है समझा जा सकता है। इन कारनामों को दोहराने की जरूरत मज़दूर मोर्चा नहीं समझता क्योंकि ये सारे कारनामे विभिन्न माध्यमों से प्रकाशित हो चुके हैं। इन काले कारनमों के बदले मोदी चंद्रचूड को कैसे पुरस्कृत करेंगे ये भी जल्दी पता चल जाएगा।