फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) राजकीय मॉडल संस्कृति वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नंबर 3 के बेहतर परीक्षा परिणामों के कारण अभिभावकों में इस स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलाने का रुझान बढ़ा है। प्रधानाचार्य डॉ. परेश गुप्ता के अनुसार हर कक्षा में एक सीट के लिए औसतन दस आवेदन आए हैं। लगभग दो हज़ार छात्रों ने अलग अलग कक्षाओं व संकाय में दाखिले के लिए आवेदन किया है। उनके अनुसार इतने अधिक आवेदन आने के कारण छात्रों को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रवेश देने के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन करना पड़ा।
विद्यालय ने पिछले दो वर्षों में ही आसपास के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना ली है।पिछले वर्ष विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने मेडिकल, इंजीनियरिंग, खेल तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपना लोहा मनवाया है। विद्यालय से पास आउट दो छात्रों ने नीट परीक्षा पास कर एमबीबीएस में प्रवेश लिया है। पांच छात्र जेईई मेंस निकाल कर इंजीनियरिंग कर रहे हैं। खेल में एक छात्र ने राष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया जबकि लड़कियों की फुटबाल टीम ने हरियाणा का प्रतिनिधत्व किया।
विद्यालय की प्रगति यहां के स्टाफ और शिक्षकों की बदौलत है, सरकार ने तो इसका कबाड़ा करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी है। उसने तो सिर्फ इसका नाम मॉडल संस्कृति वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय रखा है लेकिन सुविधाएं कुछ नहीं दी हैं। हालात ये हैं कि यहां शैक्षणिक स्टाफ भी अधूरा है। कॉमर्स वर्ग में केवल एक शिक्षक है जबकि अर्थशास्त्र जैसा महत्वपूर्ण विषय पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक नहीं है। आधुनिक शिक्षा देने का तो दावा किया जाता है लेकिन विद्यालय बिना कंप्यूटर टीचर के चल रहा है। विद्यलय में लेक्चरार के 10 और मास्टर वर्ग के नौ पद खाली हैं। स्वच्छता का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार करीब साढ़े पांच एकड़ में फैले इस विद्यालय के लिए स्वीपर तक तो आज तक दे नहीं सकी। ये सरकार का कौन सा मॉडल स्कूल है जिसमें एक भी क्लर्क नहीं है, शिक्षकों को पढ़ाई कराने के साथ डीईओ कार्यालय से आने वाले पत्रों को जवाब देने, दस्तावेज मेनटेन करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है, और इतना सब करते हुए अगर उन्हें प्यास लगे तो खुद ही उठ कर पानी भी पीने जाना पड़ता है क्योंकि सरकार ने तो एक चपरासी तक नहीं दिया है। इतना बड़ा विद्यालय होने के कारण यहां एक क्लस्टर हेड यानी एबीआरसी का भी पद है लेकिन वह भी अर्से से खाली चला आ रहा है, प्रधानाचार्य के लिए शिक्षा, प्रबंधन, क्लस्टर प्रशासन से लेकर डीईओ की चिट्ठी पत्रियों का जवाब देना सब कुछ है।
सरकार इन अभावों को तो दूर नहीं कर रही, हां, उपलब्धियों का श्रेय लेने की बात आएगी तो मुख्यमंत्री से लेकर शिक्षा मंत्री और स्थानीय सांसद, विधायक सब कूद पड़ते हैं लेकिन स्कूल की समस्याएं जानने के लिए कभी झांकना भी मुऩासिब नहीं समझते।
सवाल ये पैदा होता है दाखिला तो एक को मिलेगा लेकिन बाकी नौ छात्र कहां जाएंगे। जब एक स्कूल में पढ़ाई अच्छी हो सकती है तो बाकियों में भी तो हो सकती होगी। इसके लिए सरकार क्या करने जा रही है। खैर, जो भी है यहां का स्टाफ और प्रधानाचार्य जो कर रहे हैं वो सराहनीय है लेकिन इनके सामने जो स्थितयां हैं वो सम्मानजनक नहीं हैं। कायदे से एक क्लास में 28 छात्र होने चाहिए, लेकिन यह मानक बढ़ा कर 45 कर दिया गया है।
सच्चाई ये है कि किसी भी कक्षा में 60 से कम छात्र नहीं है। ऐसी विषम परिस्थितियों में क्या तो पढ़ाने वाला करेगा और क्या पढऩे वाले करेंगे। इन हालात में भी जब यहां के छात्र इतना बढिय़ा कर रहे हैं तो कल्पना कीजिए कि यदि ये तमाम विषमताएं हटा दी जाएं तो ये छात्र कहां से कहां पहुंचने की क्षमता रखते हैं। इतना ही नहीं स्कूल में मौजूद स्टाफ को जिला प्रशासन के आदेश पर वे तमाम ड्यूटियां भी करनी पड़ती हैं जिनका पढ़ाई से कोई ताल्लुक नहीं होता जैसे जनगणना, चुनाव, पोलियो जागरूकता बूथ, सरकारी कार्यक्रम आदि।