रक्षामंत्री राजनाथ ने गिनवाये लूले-लगड़े मेडिकल कॉलेज मज़दूर मोर्चा ब्यूरो बीते रविवार गाजियाबाद के एक व्यापारिक अस्पताल का उद्घाटन करते समय देश की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता पर भाषणबाजी करते हुए इनके महत्व का बखान किया। इस दौरान उन्होंने ऐसी कोई नई बात नहीं बताई जिसका ज्ञान जनसाधारण को न हो। सभी जानते हैं कि स्वस्थ नागरिकों से ही एक स्वस्थ राष्ट्र बनता है और इसके लिए जरूरी है कि कोई भी नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित न रहे। परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि इसके लिए इनकी सरकार ने अब तक क्या किया है और आगे क्या करने जा रही है? जिस व्यापारिक अस्पताल का उद्घाटन करने वे आर्इं हैं उसमें घुसने मात्र की फीस कितनी होगी? क्या जनसाधारन उसे चुका कर अपना इलाज करा पाएगा? इसकी बजाय यदि उन्होंने किसी ऐसे सरकारी अस्पताल का उद्घाटन किया होता जिसके द्वारा कोई भी जनसाधारण अपना इलाज करा पाता तो अवश्य ही उनकी बातों में दम नजर आता।
इसी अवसर पर मोदी के गीत गाने वाले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने, उनके कार्यकाल में बढ़ी चिकित्सा सेवाओं का विवरण देते हुए बताया कि 2014 से पहले देश में 387 मेडिकल कॉलेज होते थे अब इनकी संख्या बढ़कर 800 हो गई है और मेडिकल कॉलेजों में अब सीटें 1.20 लाख हो गई हैं। झूठ एवं फरेब की बुनियाद पर खड़ी भाजपाई सरकार यह कभी नहीं बताएगी कि मेडिकल कॉलेजों की संख्या और उनमें सीटों की बढ़ोतरी एक छलावा मात्र है। जो मेडिकल कॉलेज 100 सीटों के लिए बनाए गए थे उनमें यकायक मोदी के आदेश पर सीटें बढ़ा कर 150 कर दी गई, जिन कॉलेजों में 150 छात्रों के पढऩे की व्यवस्था थी वहां सीटें बढ़ा कर 200-250 कर दी गई। इस बढ़ोतरी के लिए न तो अतिरिक्त फैकल्टी का प्रबन्ध किया गया और न ही किसी प्रकार की अन्य शैक्षणिक व्यवस्थाओं को बढ़ाया गया। और तो और हॉस्टल, जो ऐसे कॉलेजों के लिए बहुत जरूरी होता है, वे भी नहीं बढ़ाए गए।
मोदी राज में जो नए मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं उन्हें यदि $फर्जी अथवा नकली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब से मेडिकल शिक्षण प्रारम्भ हुआ है तब से ही एक ऐसी नियंत्रक संस्था का गठन किया गया है जो पूरी जांच-पड़ताल करने के बाद किसी संस्था को मेडिकल कॉलेज चलाने की अनुमति देती है। पहले इसे एमसीआई कहते थे जिसके नियम बहुत कड़े होते थे। करीब चार वर्ष पूर्व मोदी सरकार ने एमसीआई के स्थान पर ढ़ीले-ढ़ाले नियमों वाले एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) का गठन कर दिया है।
दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इन ढीले-ढाले नियमों का भी पालन न कर सकने वाले जिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों को एनएमसी ने मेडिकल शिक्षण के लिए काबिल नहीं समझा, उन्हें भी मोदी सरकार ने चलाने की अवैध स्वीकृति प्रदान कर दी। इनमें से 50-50 सीटों वाले दस मेडिकल कॉलेज तो इसी वर्ष ईएसआई कॉर्पोरेशन ने खड़े कर दिए हैं। ऐसे ही 100-100 सीटों वाले तीन मेडिकल कॉलेज हरियाणा सरकार ने भी चालू कर दिए हैं। इनके अतिरिक्त हरियाणा के ही छांयसा में अटल बिहारी वाजपेयी नामक मेडिकल कॉलेज एनएमसी की स्वीकृति के बिना, बीते चार साल से चल रहा है। इसके अलावा देश भर में और कितने सरकारी व प्राइवेट मेडिकल कॉलेज इसी तरह की धांधलेबाज़ी से चलाए जा रहें हंै, यह जांच का विषय है। समझने वाली बात यह है कि इस तरह के अवैध कॉलेजों से डिग्री ले कर निकलने वाले डॉक्टर जनता का कैसा इलाज कर पाएंगे? ये कुपढ़ डॉक्टर मरीजों को जीवन देंगे या मौत?