वायु गतिमान होने से प्रदूषण में कुछ राहत

वायु गतिमान होने से प्रदूषण में कुछ राहत
November 10 18:35 2025

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शासन-प्रशासन द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के तमाम प्रयास असफल होने के बावजूद बीते दो दिन से इसमें कुछ राहत इसलिए महसूस की जा रही है कि वायु का बहाव कुछ गतिमान हो रहा है। यानी कि हवा की गति में जो ठहराव आ गया था वो नहीं रहा। ठहराव के चलते जो धूल व धुआं वायु मंडल में एक बार चढ़ जाता है तो वह वहीं का वहीं स्थिर हो जाता है। तापमान में गिरावट के चलते यह अधिक ऊंचाई पर न जाकर धरती के निकट ही रह कर जनता के लिए मुसीबत बनता है।

सरकार की ओर से प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर किए जाने वाले तमाम तमाशे पूरी तरह से निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं। वाहनों, कारखानों व जनरेटरों से निकलने वाला धुआं तथा सड़कों व निर्माण स्थलों से उडऩे वाली धूल तो प्रशासन ने क्या रोकनी थी, जगह-जगह जलने वाले कूड़े-कचरे के ढेरों पर भी कोई नियंत्रण नहीं किया जा सका। इनके जलने से निकलने वाले धुएं में रबर, प्लास्टिक व रसायनों की दुर्गंध स्पष्ट महसूस की जा सकती है। रात को जलने वाले इन कचरों की दुर्गंध अलस्सुबह पार्कों में सैर करते वक्त विशेष रूप से महसूस की जा सकती है। इसके लिए अकेले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 10-20 कर्मचारियों को दोषी ठहरा कर, प्रशासन अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकता। इसके लिए प्रशासन को चप्पे-चप्पे पर कड़ी निगरानी करनी होगी।

प्रदूषण विभाग तो केवल चंद स्थानों पर प्रदूषण-मापक यंत्र लगा कर इसका स्तर बता सकता है। मजे की बात तो यह है कि आज कल ये यंत्र भी ठीक से काम करते नजर नहीं आ रहे। वैसे भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कभी भी इसके नियंत्रण के कोई उपाय जनता को नहीं सुझाए। इन्होंने तो सदैव प्रदूषण फैलाने के नाम पर बतौर जुर्माना सरकार के लिए तथा रिश्वत अपनी जेबों के लिए वसूली है।
ग्रैप एक, दो, तीन व चार आदि की घोषणा करने मात्र से प्रदूषण पर काबू नहंी पाया जा सकता। इसके लिए जो ठोस काम शासन-प्रशासन को करना चाहिए, वह कोई करता नहीं है। जिन अधिकारियों को यह काम सौंपा जाता है वे नियमों का उल्लंघन करने वालों से वसूली करने में जुट जाते हैं। इसी दुनियां में अनेकों देश ऐसे भी हैं जहां प्रदूषण (एक्यूआई) का स्तर जीरो से लेकर मात्र 50 तक ही है जबकि दिल्ली-$फरीदाबाद-बल्लबगढ़ आदि शहरों में इसका स्तर 300-500 तक भी हो जाता है। पटाखों व प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर काबू पाने में असफल सरकार पूरा दोष उन किसानों पर मढ़ देती है जो 200-300 किलोमीटर दूर धान की खेती करते हैं। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे पराली जला कर धुआं दिल्ली की ओर भेज देते हैं।

शुद्ध वायु में सांस लेना प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और जो सरकार नागरिकों को यह अधिकार नहीं दे सकती वह शासन चलाने के लायक नहीं हो सकती। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि शुद्ध वायु के अभाव में यानी प्रदूषित वातावरण में रहने के चलते भंांति-भांति की बीमारियों से ग्रसित होकर अपने जीवन काल को छोटा करने वाली जनता भी इस तथ्य को समझने में कोई रुचि नहीं रखती। जनता तरह-तरह के पाखंडों, जलसे जलूसों, कीर्तन आदि के लिए तो समय निकाल कर अपने रुचि का प्रदर्शन कर सकती है लेकिन अपने स्वास्थ्य के लिए आवश्यक शुद्ध प्राणवायु प्राप्त करने में उसकी रुचि नहीं है।

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Mazdoor Morcha
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