मज़दूर मोर्चा ब्यूरो एक जमाना था जब एमबीबीएस डॉक्टर को ही सब कुछ समझा जाता था। वैसे इससे पहले वह जमाना भी था जब जनता झोला छाप ‘डॉक्टरों’ के भरोसे ही जी रही थी। लेकिन आज के जमाने में एमबीबीएस को अधूरा डॉक्टर को माना जाता है। पूरा डॉक्टर बनने के लिए पीजी (पोस्ट ग्रेजुएशन) करना जरूरी समझा जाता है। इतना ही नहीं अति विशिष्ट चिकित्सा के लिए पीजी से ऊपर की पढ़ाई भी आज की जरूरत समझी जाती है।
दुर्भाग्यवश आज देश में पीजी के लिए सीटें इतनी कम रखी गई हैं कि तमाम एमबीबीएस डॉक्टरों को योग्यता होने के बावजूद पीजी में दाखिला नहीं मिल पा रहा है। जहां देश भर में एमबीबीसीएस की 1 लाख10 हजार सीटे हैं वहीं पीजी की कुल 35 हजार सीटें हैं। ऐसे में करीब छ: लाख एमबीबीएस डॉक्टर किसी अस्पताल में सेवा न देकर केवल पीजी में दाखिला पाने के लिए घर बैठ कर छह छह साल तक तैयारी कर रहे हैं। जाहिर है कि देश की जनता उनकी सेवाओं से वंचित है।
यदि देश के योजनाकार इस स्थिति को समझने के लायक होते तो वे प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में उतनी ही पीजी सीटें रखते जितनी की एमबीबीएस में रखी जाती हैं। गौरतलब है कि पीजी छात्र केवल छात्र नहीं होता, वह पढ़ाई के साथ-साथ मरीज़ों को भी देखता है और उसे वेतन भी उतना ही मिलता है जितना कि किसी एमबीबीएस डॉक्टर को किसी अन्य अस्पताल में मिलता है। किसी भी मेडिकल कॉलेज में पीजी सीटों के अलॉटमेंट के लिए कोई बहुत कड़ी शर्तें भी नहीं रखी गई हैं। केवल प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों व बिस्तरों की संख्या के आधार पर इन सीटों का अलॉटमेंट होता है। इस देश में फैकल्टी की कोई कमी भी नहीं है, कमी है तो केवल देश को चलाने वालों की नीयत की है। एक और मजे की बात यह है कि किसी भी 220 बेड वाले अस्पताल में फैकल्टी की नियुक्ति करके पीजी की पढ़ाई शुरू कराई जा सकती है। परन्तु इन सब बातों की ओर ध्यान देने की फुर्सत किसको है?
संदर्भवश हरियाणा सरकार की नालायकी का नमूने देखने के लिए खानपुर गोहाना और मेवात मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें पिछले दस सालों में पीजी की कोई सीटें नहीं चालू कराई गई हैं। 2017 में चालू हुए कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज तो कोई जिक्र भी नहीं है।