बतौर एसपी एक प्राचार्य पर कातिलाना हमला कराने वाले विनोद कौशिक को बचाने में जी-जान से जुटी है पुलिस

बतौर एसपी एक प्राचार्य पर कातिलाना हमला कराने वाले विनोद कौशिक को बचाने में जी-जान से जुटी है पुलिस
July 28 07:32 2024

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) दिनांक 04 सितम्बर 2019 को इकबाल सिंह सिंधू ‘तत्कालीन प्राचार्य राजकीय महाविद्याल तिगांव, जब अपनी कार से महाविद्यालय जा रहे थे तो बाईपास रोड पर छ: लडक़ों ने उन पर कातिलाना हमला किया था। जब उनकी गाड़ी सेक्टर नौ के पास से गुज़र रही थी तो दो मोटरसाइकिलों पर सवार, डंडों व लोहे की रॉडों आदि से लैस इन लडक़ों ने प्राचार्य की कार को रुकवा कर उन पर हमला कर दिया। कार को बुरी तरह से तोड़-फोड़ दिया। इकबाल संधू को गाड़ी से बाहर खींच कर उसकी चाबी भी निकाल ली। उन्हें सडक़ पर डाल कर डंडों व रॉडों से बहुत बुरी तरह से मारा। इसके चलते उन्हें पूरे शरीर पर अनेकों फ्रेक्चर हुए।

इसी बीच इत्तेफाक से $फरीदाबाद की ओर से एक पुलिस जिप्सी को आता देख कर हमलावर इतनी तेजी से फरार हुए कि एक मोटर-साइकिल मौके पर ही छोड़ गये। इसी समय प्याला निवासी अमर सिंह भी जो पास के ही एक शोरूम पर मौजूद था, हल्ला-गुल्ला सुन कर मौके पर पहुंच गया। उसने प्राचार्य इकबाल को पहचान लिया और पुलिस वालों की मदद से इन्हें निकट के ही सर्वोदय अस्पताल में दाखिल करवाया।

सूचना पाकर सम्बन्धित थाना बीपीटीपी की पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई। डॉक्टरों के अनुसार पीडि़त प्राचार्य बयान देने की स्थिति में नहीं थे। इसलिये घटना का पूरा विवरण अमर सिंह से लेकर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 307, 148, 149, 325, 427,120 बी आदि के तहत मुकदमा नम्बर 150 दर्ज कर दिया गया। बाद में यह केस क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। उन्होंने एक-एक करके छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान वे सभी केवल इतना ही बता पाए कि उन्हें तो देवेन्द्र उर्फ लाला ने यह काम सौंपा था। इसके पीछे उसका क्या उद्देश्य है ये वे नहीं जानते। सभी को जेल भेज दिया गया जो कोरोना काल का लाभ उठा कर संक्षिप्त सज़ा काट कर रिहा भी हो गए।

चार वर्षों तक हमले का उद्देश्य पता नहीं चल सका क्योंकि लाला उर्फ देवेन्द्र पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ पाया। सन 2023 में पीडि़त प्राचार्य को अपने सूत्रों से जानकारी मिली कि लाला उर्फ देवेन्द्र व उसका एक साथी अपनी सुरक्षा के लिये, पुलिस से सांठ-गांठ करके नीमका जेल में पहुंच गये हैं। पीडि़त ने इस सूचना के आधार पर दिसम्बर 2023 में सम्बन्धित न्यायालय में आवेदन करके लाला को अदालत में हाजिर करवाया। एसएचओ की मौजूदगी में जज तैयब हुसैन ने लाला से हमला करने का कारण पूछा तो उसने स्पष्ट कहा कि एसपी विनोद कौशिक के कहने पर उसने यह वारदात कराई थी। उसने यह भी बताया कि कार की चाबी वह हिसार में अपने दोस्त के यहां रख आया था। इस पर जज साहब ने एसएचओ के न चाहते हुए भी लाला को चार दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया। इस दौरान लाला ने अपने विस्तृत बयान में बताया कि जब वह अपने किसी काम से विनोद कौशिक से मिलने मधुबन गया था तो उसने कहा था कि प्राचार्य इकबाल सिंधू के हाथ-पांव अगर वह अच्छी तरह से तोड़ देगा तो कौशिक उसके एक मुकदमे में राज़ीनामा करा देगा। इस पर लाला ने तो अपना वायदा पूरा कर दिया लेकिन कौशिक ने उसे बाद में पहचानने से ही इनकार कर दिया।

गौरतलब है कि अपनी जमानत अर्जी में आरोपी कौशिक कहता है कि लाला उसके कैंप ऑफिस में उस वक्त आया था जब वह जन सुनवाई कर रहा था। लाला ने उससे कहा था कि वह उसे मैन पॉवर सप्लाई का काम दिलवाये। यहां प्रश्न यह खड़ा होता है कि जिस लाला पर 42 आपराधिक मुकदमे दर्ज हों तो वह किस हक से एक एसपी के पास सिफारिश के लिये पहुंचा था? जाहिर है कि दोनों के बीच सम्बन्ध तो पुराने थे।

फरीदाबाद पुलिस की बदनीयती को समझने के लिये इतना ही पर्याप्त है कि दिसम्बर 2023 में लाला के बयान इकबालिया दर्ज किये जाने के बावजूद साजिश कर्ता विनोद कौशिक को केवल खानापूर्ति के लिये 20 $फरवरी 2024 को थाने में बुलवा कर फारिग कर दिया गया। इस सारी कार्रवाई की भनक तक भी पीडि़त को न लगने दी गई। जब पीडि़त को पुलिस की बदनीयती का एहसास होने लगा तो वे सीपी फरीदाबाद व डीजीपी हरियाणा शत्रुजीत कपूर व अन्य अफसरों से भी मिले। लेकिन सीपी राकेश आर्य के निर्देशन पर चल रही फरीदाबाद पुलिस जी-जान से आरोपी कौशिक को बचाने में जुटी है। किसी अपराधी को बचाने का यह कोई इकलौता मामला नहीं है सीपी की अपनी एस्कॉर्ट गाड़ी का ड्राइवर उनके अपने कार्यालय के गेट के सामने एक महिला को कुचल कर मार देता है तो मामला अज्ञात पर दर्ज होता है।

क्राइम ब्रांच वाले अपनी चौकी मेें किसी की हत्या कर देते हैं तो भी आर्या जी अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराते हैं। इतना ही नहीं ट्रैफिक का थानेदार रतन सिंह सरेआम सडक़ पर नोट छापते हुए पकड़ा जाता है तो आर्या साहब उस केस से जुड़े तमाम अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास करते हैं। इतने कमज़ोर अफसर को ईमानदार तो नहीं ही कहा जा सकता।

पुलिस की इसी बदनीयती को समझते हुए जमानत अर्जी की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त सेशन जज ने अपने ऑर्डर में स्पष्ट लिखा है कि बयान इकबालिया को अहम सबूत मानने वाली पुलिस इस मामले में लाला के इकबालिया बयान को सबूत ही न मान कर आरोपी कौशिक की जमानत का विरोध नहीं कर रही। इन हालात में समझा जा सकता है कि यदि यह केस इसी पुलिस के हाथ में रहा तो कौशिक का कुछ बिगडऩे वाला नहीं।

कौशिक का आपराधिक इतिहास
पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, इस कहावत को चरितार्थ करते हुए विनोद कौशिक ने अपनी आपराधिक गतिविधियां उसी वक्त शुरू कर दी थी जब वह 1995-96 में बतौर एसएचओ धारूहेड़ा में तैनात था। वहां पर एक सहगल पेपर मिल हुआ करती थी। किसी वजह से कम्पनी फेल हो गई थी और मालिक ताला लगा कर चले गये थे।

कारखाने में उस वक्त छोटी-बड़ी लाखों करोड़ों की मशीनें लगी पड़ीं थीं। चोर लगातार वहां चोरी करने में जुटे थे। एसएचओ विनोद कौशिक अव्वल तो मुकदमा ही दर्ज नहीं करता था, जो करने भी पड़े वे अनट्रेस ही जाते रहे। इत्तेफाक से वे चोर सीआईए स्टाफ के हत्थे चढ़ गए। पूछ-ताछ के दौरान उन्होंने सहगल पेपर मिल्स की चोरियों का भी पूरा खुलासा कर दिया। उन चोरों ने मजेदार बात यह बताई कि एसएचओ कौशिक का उन्हें पूरा संरक्षण प्राप्त था जिसके बदले वे हर चोरी में से उसका हिस्सा उसे दे देते थे। मामला तत्कालीन एसपी राव सोहन लाल के सामने लाया गया। उन्होंने कौशिक को तलब किया तो उसने इस आरोप को स्वीकार करते हुए मा$फी मांगी और उनके पैरों में लेट गया।

उस वक्त विनोद कौशिक प्रोबेशनर इन्स्पेक्टर था। राव साहब की इस बाबत भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर कौशिक को तुरन्त बर्खास्त हो जाना था। लेकिन विनोद के पिता ईश्वरदत्त कौशिक सेवानिवृत आईएएस अफसर ने उच्चाधिकारियों व राव सोहन लाल के पैर पकड़ कर उसे जैसे-तैसे बर्खास्तगी से बचा लिया। इस मामले से बच निकलने के बाद तो विनोद के हौसले और भी बुलंद हो गये और चौके पर छक्के लगाता चला गया।

बतौर डीएसपी फरीदाबाद मे तैनाती के दौरान कौशिक ने गौकशी के एक मुकदमे में दो असल दोषियों को निकाल कर, बदले में दो अन्य को डाल दिया था। तब भी मज़दूर मोर्चा ने कौशिक के भ्रष्टाचार को प्रकाशित किया था। मज़दूर मोर्चा की रिपोर्ट पर तत्कालीन सीआईडी प्रमुख पीवी राठी ने इसकी विभागीय जांच उस समय एसपी गुप्तचर महराज सिंह से कराई थी। जांच में सारे तथ्य और सुबूत कौशिक के खिलाफ थे लेकिन महराज सिंह का तबादला एसपी नारनौल हो गया। इसके बाद जांच डीसीपी सेंट्रल कुलदीप सिंह सिवाच के पास आ गई, सेवानिवृत्त होते होते उन्होंने कौशिक पर अनुकंपा की और उसे बरी कर दिया।

इसके बाद इसने अपने रंग दिखाए गुडग़ांव में डीसीपी ट्रेफिक लगने पर। मलाईदार ट्रैफिक प्वाइंटों पर तैनात करने के बदले इसने पुलिसकर्मियों से मोटे पैसे लेने शुरू कर दिए। अत्यधिक शिकायतें मिलने पर तत्कालीन पुलिस आयुक्त नवदीप विर्क ने ज्वाइंट सीपी सौरभ सिंह से जांच करवा कर, दोषी पाये जाने पर कौशिक को निलम्बित करा दिया था। अभी यह मामला पूरी तरह से सुलझा भी नहीं था कि कौशिक के उत्पीडऩ से तंग आकर एक एएसआई महावीर सिंह ने 28 अप्रैल 2016 में आत्महत्या कर ली थी। अपने आत्महत्या नोट में अन्य कुछ पुलिसकर्मियों के साथ-साथ कौशिक को भी दोषी ठहराया था। इस पर एक मुकदमा थाना सदर बल्लबगढ़ में दर्ज किया गया था क्योंकि महावीर ने आत्महत्या अपने गांव सागरपुर (बल्लबगढ़) में की थी।

चारों ओर से घिरे कौशिक ने वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के लिये आवेदन कर दिया। लेकिन सियासी चालबाजियों के चलते वीआरएस मंजूर नहीं हुई। इस दौरान इसे इधर-उधर बिना किसी काम की तैनाती पर बैठा कर सरकार वेतन देती रही। इतना ही नहीं फरवरी 2021 में वास्तविक सेवानिवृत्ति से मात्र दो माह पूर्व इसे पदोन्नत करके डीआईजी भी बना दिया गया था। जानकार बताते हैं कि यह सब पूर्व मंत्री राम बिलास शर्मा की मेहरबानी से हो पाया था।

कौशिक की इकबाल से रंजिश
विनोद कौशिक की पत्नी प्रीता सेक्टर 16 ए स्थित उसी राजकीय महाविद्यालय में प्राचार्य थी जिसमें इकबाल सिंह सिंधू भी बतौर वरिष्ठ प्रोफेसर तैनात थे। कॉलेज स्टा$फ एवं छात्रों पर अपना रौब डालने के लिये प्रीता के साथ हर वक्त विनोद कौशिक द्वारा अनाधिकृत रूप से दिये हुए दो गनमैन व एक ड्राइवर रहते थे। अपना शक्ति प्रदर्शन करने के लिये प्रीता इन पुलिसकर्मियों को साथ लेकर कॉलेज में घूमा करती थी।

उधर इकबाल, प्रोफेसर यूनियन का प्रधान होने के साथ ही विश्वविद्यालय की कई कमेटियों के भी पदाधिकारी होने के नाते प्रीता के इस आतंकी प्रदर्शन का विरोध करते थे। इसके अलावा भी इकबाल सिंह अपनी पदेन जिम्मेवारियों का निर्वहन करते हुए प्रीता के गलत आदेशों का विरोध करने से नहीं चूकते थे। इन सब बातों के चलते इकबाल सिंह प्रीता की आंख में कांटे की तरह खटकते थे। संगठन के पदाधिकारी होने के नाते इ$कबाल सिंंह संघू ने 12 जुलाई 2017 को कॉलेज मेें एक बैठक रखी थी लेकिन प्रीता कौशिक ने नहीं होने दी। यही नहीं परेशान करने की नीयत से 13 जुलाई 2017 को प्रीता कौशिक ने उन्हेें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था।

प्रीता को इकबाल से एक और बड़ा खतरा यह भी था कि वे पदोन्नत होकर उसकी सीट पर काबिज हो सकते हैं। समझा जाता है कि इसी खटक के चलते प्रीता ने अपने आईपीएस पति से कह कर यह कांड करवाया था।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles