डीआरटी के निलंंबित पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक ने सुप्रीम कोर्ट से की सीबीआई जांच कराने की मांग

डीआरटी के निलंंबित पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक ने सुप्रीम कोर्ट से की सीबीआई जांच कराने की मांग
February 04 00:35 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
उद्योगपतियों द्वारा बैंकों से लिए गए कर्जों की रिकवरी के लिए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने देश भर में 39 डीआरटी ऋण वसूली न्यायाधिकरण गठित किए हैं। इनमें पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति वित्त मंत्रालय की उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा की जाती है। इनकी कारकर्दगी में खामी पाए जाने पर केवल उच्चतम न्यायालय को ही कार्यवाही करने का अधिकार होता है, इसके साथ साथ इन्हेंं निलंबित किए जाने का भी कोई प्रावधान नहीं है। इन सबके बावजूद चंडीगढ़ डीआरटी-ढ्ढढ्ढ के पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक को लगभग 1 वर्ष से निलंबित कर रखा है। आरोप यह है कि इनकी कार्यशैली ढीली-ढाली है जबकि केसों के निपटारे के मामले में कोई भी डीआरटी इनके मुकाबले नहीं ठहर पाता।

देश भर में 39 ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) होने के बावजूद केवल तीन डीआरटी को सौ करोड़ या उससे अधिक के मामले सौंपे जाना गुडग़ांव के पूर्व जिला एवं सेशन जज व चंडीगढ़ डीआरटी के निलंबित पीठासीन अधिकारी एमएम ढोंचक को संदेहास्पद और बेईमानीपूर्ण लगता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ऋण वसूली न्यायाधिकरणों में पीठासीन अधिकारियों की ताकत घटाए जाने के संबंध में दायर जनहित याचिका पीआईएल में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में शामिल किए जाने का आवेदन किया है।

ढोंचक के अनुसार खर्चा घटाने के लिए स्वाभाविक आर्थिक रणनीति नए डीआरटी बनाने में नहीं है और पीठासीन अधिकारियों की कमी के चलते डीआरटी को केस पर निर्णय लेने की सुविधा दिया जाना एक पैसा बचाने के लिए एक रुपया खर्च करने जैसा है। इसका परिणाम वैसा ही होगा जैसे कि बिना ब्रेक की कार को तीव्र ढलान पर छोड़ देना।

सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आवेदन में उन्होंने केसों को लंबे समय के लिए स्थगित करने के आरोप पर कहा कि मामले को समाप्त करने और निर्णय तक पहुंचाने के लिए स्थगनादेश दिए जाने चाहिए न कि वादी को झूठा दिलासा देने के लिए मामले को झूठमूठ विचाराधीन रखा जाए और बाद में उसकी याचिका का ठुकरा दिया जाए। यह प्रत्येक न्यायालय, न्यायाधिकरण और प्राधिकारी का फर्ज है कि वह अपने संस्थान को तारीख पे तारीख वाला बनने से बचाए। छोटे या झूठे स्थगनादेश किसी कोर्ट या न्यायाधिकरण की कार्य क्षमता के द्योतक नहीं हो सकते।

स्टाफ उपलब्ध नहीं होने के सवाल पर उनका कहना था कि किसी पीठासीन अधिकारी को उसके लिए अस्थायी आधार पर स्टेनोग्राफर लगाने से रोकना उसी तरह है जिस तरह लेबर चौक, जहां नौसिखिए निर्माण मज़दूर मिलते हैं पर रसोइया को तलाशना। उन्होंने यह भी दावा किया कि विज्ञान भवन नई दिल्ली में हुई कॉन्फ्रेंस में सौ करोड़ या उससे अधिक ऋण वाले केसों पर किसी भी डीआरटी की ओर से न तो वाद-संवाद हुआ, न विचार-विमर्श और न ही कोई सुझाव दिया गया। हां, इसका खुलासा हुआ था कि कॉन्फ्रेंस के कार्यवृत्त में हेरफेर किया गया था जिसके परिणाम स्वरूप सौ करोड़ या उससे अधिक वाले केस देश भर के 39 डीआरटी से लेकर केवल तीन डीआरटी को दे दिया गया, जो कि ऊंचे ऋण वाले केसों की वसूली की गाड़ी को बेपटरी करने जैसा था, इसका असर यह हुआ कि ऊंचे ऋण वाले मामलों की रिकवरी की गति धीमी पड़ गई।

बाद की कॉन्फ्रेंस में उन्होंने यह मामला उठाया तो उन पर वसूली की गति धीमी करने का कमजोर आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया गया जबकि तथ्य यह हैं कि आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 31 जनवरी 2024 के अंत तक उन्होंने उतने केस अकेले निपटाए जितने सात से ज्यादा डीआरटी ने मिलकर निपटाए थे। उन्होंने न्यायालय से निवेदन किया कि मामले की जांच सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र संस्था जो इस तरह के मामले की जांच करने योग्य हो, से सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में कराई जाए ताकि वह लोग सामने आ सकें जो बिना पैसा लिए कोई काम नहीं करते थे। ढोंचक ने दावा किया कि एक न्यायाधीश के रूप में फर्ज निभाते हुए उनकी ईमानदारी पर एक छोटा सा भी दाग नहीं लगा। उन्हें उन लोगों द्वारा परेशान, प्रताडि़त और दंडित किया गया जो अपने आपको न्यायापालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन का विजेता करार देते हैं। ढोंचक ने कहा कि उनके साथ जो अन्याय हुआ वह एक ऐसी घिनौनी कहानी बयां करता है जो किसी को भी चकित कर सकती है, न्यायाधिकरण में अपना फर्ज निभाने वाले को जो माहौल दिया जाना चाहिए वह वास्तविकता की जगह मिथक है।

सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया कि यदि कार्रवाई में घोर अन्याय होता है जैसा कि उनके मामले में भी हुआ है तो इस घृणित प्रवृत्ति को समाप्त करने के लिए न्यायापालिका द्वारा अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए और इसका यह कतई अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह अपनी बहाली के लिए आवेदन कर रहे हैं। उनका प्रयास तो ऋणों की वसूली के लिए डीआरटी के पीठासीन अधिकारियों की घटती और अपर्याप्त ताकत के बारे में न्यायपालिका को जमीनी वास्तविकता से रूबरू कराना है जो कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य तत्व है।

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