आनन्द स्वरूप वर्मा 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिर गयी और श्रीमती गाँधी दोबारा सत्ता में आ गयीं इस बार वह एक नये तेवर के साथ सत्तासीन हुई थी। जनता पार्टी में पुराने भारतीय जनसंघ के शामिल हो जाने से उन्होंने महसूस किया था कि देश का हिंदू वोट कांग्रेस के खिलाफ चला गया था और यह उनकी चिंता का एक कारण बना। अब उन्होंने भी सांप्रदायिकता को हवा देनी शुरू की और इस सिलसिले में नवंबर 1985 में अजमेर में आर्यसमाज के एक सम्मेलन का उनके द्वारा उद्घाटन किया जाना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्होंने अपने इर्द-गिर्द अवसरवादी, लंपट और अपराधी तत्त्वों को भी अच्छी खासी संख्या में बसा लिया। 1980 के दशक की राजनीति को याद करें तो पाएँगे कि इसी दौर में तस्करों, माफिया सरगनाओं और आपराधिक तत्त्वों ने बड़ी तेजी के साथ कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों में प्रवेश किया। इन सब चीजों का असर पत्रकारिता पर भी पड़ा। अब अखबारों में कुख्यात अपराधियों के जीवनवृत्त छपने लगे और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों पर तस्करों और माफिया गिरोह के सरदारों की तस्वीरों को स्थान मिलने लगा और उनके लंबे-लंबे इंटरव्यू प्रकाशित होने लगे। दिवंगत पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह के संपादन में ‘रविवार’ का पहला अंक 1977 में प्रकाशित हुआ था और इसके आवरण कथा के रूप में प्रसिद्ध लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की तस्वीर छपी थी। लेकिन 1984 आते-आते हालात इतने बदतर हो गये कि तस्कर के रूप में कुख्यात हाजी मस्तान पर इसी पत्रिका में आवरण कथा प्रकाशित हुई और उस तस्कर की फोटो कवर पर छपी। यही वह दौर था जब खासतौर पर हिंदी पत्रकारिता का अध:पतन शुरू हुआ आज तक जारी है। आज स्थिति यह है कि जनपक्षीय पत्रकारिता पूरी तरह हाशिये पर चली गयी है और जनपक्षीय पत्रकार अपने को बेहद असहाय महसूस करने लगे हैं। 1980 के दशक की पत्रकारिता कई अर्थों में इसलिए याद की जाएगी क्योंकि समूचा दशक उल्लेखनीय घटनाओं से भरा था।
पंजाब में ब्लू स्टार ऑपरेशन से लेकर शाह बानो केस और फिर बावरी मस्जिद का ताला खोले जाने, आडवाणी की रथयात्रा और अयोध्या में बार-बार होने वाली कारसेवा ने न केवल समूचे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया बल्कि पत्रकारिता में भी एक नये तरह का ध्रुवीकरण शुरू हो गया। ब्लू स्टार ऑपरेशन के समय पहली बार यह महसूस हुआ कि हिंदी पत्रकारिता ‘हिंदू पत्रकारिताÓ हो गयी है। बिना किसी अपवाद के हिंदी के सभी अखबारों ने पंजाब की घटनाओं पर वही रवैया अख्तियार किया जो राजनीतिक समस्या के सैनिक समाधान में यकीन करती है। उस समय श्रीमती गाँधी की नीतियों का आँख मूँद कर समर्थन करने की जिम्मेदारी लगभग सारे अखबारों ने संभाल ली। अयोध्या में कारसेवा तक यह प्रवृत्ति इतना गंभीर रूप ले चुकी थी कि इसके खिलाफ प्रेस परिषद को भी कदम उठाना पड़ा। 1987 में राजस्थान के दिवराला में रूपकुंवर नामक एक महिला सती हुई थी और उस पर ‘जनसत्ता’ में जो संपादकीय प्रकाशित हुआ था उसके विरोध में ढेर सारे लेखकों पत्रकारों ने जनसत्ता का बहिष्कार किया था।
उन दिनों हिंदी में ‘जनसत्ता’ को बहुत अच्छा अखबार माना जाता था और इसके पाठकों की संख्या भी अच्छी थी। पत्रकारों की बहुत शानदार टीम होने के बावजूद संपादक सहित संपादकीय विभाग के प्रमुख लोगों के कट्टरपंथी विचार अखबार के पन्नों पर तमाम अच्छी रपटों के बीच पड़े रहते थे। खुद संपादक प्रभाष जोशी भाषा के मामले में अद्भुत थे लेकिन वैचारिक गड़बड़ी की वजह से उनकी बातों का जो असर होता था वह उन्हीं बीजों के लिए खाद-पानी का काम करता था जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। अपने विचारों को किसी न किसी रूप में प्रकट करने से वह बाज नहीं आते थे। अगर क्रिकेट पर उन्होंने कोई लेख लिखा तो उसमें भी उनके वे विचार जगह पा ही लेते थे। मिसाल के तौर पर 12 फरवरी, 1987 के उनके लेख का यह अंश देखें जो उन्होंने भारत-पाक क्रिकेट मैच के बाद लिखा था-
“भारतीयों को पाकिस्तान से हारना जितना बुरा लगता उतना किसी देश की टीम से किसी खेल में हारना नहीं। और पाकिस्तान तो मानता है कि मांस, मछली, अंडे आदि खाने वाले जो मुसलमान हमलावर खैबर के दर्रे से आए इसीलिए तो जीते और राज करते रहे कि दाल-चावल खाने वाले हिंदूओं से ज्यादा ताकतवर थे और इसलिए उन पर राज करने के लिए ही बने थे… भारत के विरोध में खड़े होकर पर ताथ देते रहना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जरूरी यह भी है कि वह अपने को दाल-भात और इडली-डोसा खाने वाले हिंदुस्तानियों से ज्यादा ताकतवर माने। आप देखिए इमरान खान तेज गोलंदाजी करते हुए कैसी पठानी दिखते हैं और जहीर अब्बास और जावेद मियांदाद के सामने कोई भी भारतीय गोलंदाज पाकिस्तान में टिक क्यों नहीं पाता था।”
अपने इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा- “इस बार भारत में उसको हराने के पक्के इरादे से इमरान खान घोड़े पर चढ़ कर आए थे। और अपनी गोलंदाजी को बड़ी तोप बता रहे थे। पहले टेस्ट में मद्रास में श्रीकांत ने खुद इमरान खान और उनके सबसे घातक गोलंदाज कादिर की गेंदों में भुस भर दिया। श्रीकांत ने इमरान की ऐसी बेरहमी से धुनाई की है कि पहले किसी बल्लेबाज ने नहीं की थी। इडली-डोसे ने तंदूरी मुर्गे और गोश्त दो प्याजा में मसाले की जगह भूसा भर दिया।” यह तो है खेल प्रेम। अगर लेखक का बस चले तो वह इन खिलाडिय़ों का गला ही दबोच दे।
इस मामले में अँग्रेजी के अखबार भी पीछे नहीं रहे। बांग्लादेश में भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गये मैच पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (19 जनवरी, 1998) के खेल संवाददाता की रिपोर्ट का यह अंश देखें “ढाका के जिस स्टेडियम में भारतीय टीम ने पाकिस्तान के 314 रनों के मुकाबले धुआँधार बल्लेबाजी से जीत हासिल की, वह सुहरावर्दी उद्यान से महज दो किलोमीटर की दूरी पर है जहाँ पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी ने 1971 में जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया था।”