भारतीय रेल का संस्थागत कत्ल

भारतीय रेल का संस्थागत कत्ल
July 10 14:42 2026

महेश्वरी मिश्रा

21 सितंबर 2016 को नरेंद्र भाई की सरकार ने 92 साल पुराने ऐतिहासिक रेल बजट को हमेशा के लिए दफन कर दिया, ताकि ?1.21 लाख करोड़ के बजटीय आवंटन का हिसाब जनता की नजरों से छिपाकर उद्योगपतियों के खातों में री-रूट किया जा सके। ‘

यह देश की सबसे बड़ी जीवनरेखा का वह पहला और सबसे क्रूर संस्थागत कत्ल था, जिसे ‘सुधार’ का चमकीला नाम दिया गया।

जब ब्रिटिश हुकूमत ने 1947 में भारत छोड़ा, तब उन्होंने हमें 53,996 रूट किलोमीटर का एक बेहद खस्ताहाल और द्वितीय विश्व युद्ध में निचोड़ा हुआ रेल नेटवर्क सौंपा था, जिसमें 99′ इंजन सिर्फ कोयले के जर्जर कबाड़ थे।

उस भुखमरी और विभाजन की विभीषिका के दौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 26 जनवरी 1950 को ‘चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स’ और 2 अक्टूबर 1955 को ‘इंट्रीग्रल कोच फैक्ट्री’ (ढ्ढष्टस्न) जैसी रीढ़ की हड्डियों की स्थापना की,

जिसने साठ सालों में 51,000 से अधिक पैसेंजर कोच और 24,800 किलोमीटर से अधिक ट्रैक का पूरी तरह स्वदेशी विद्युतीकरण करके 2014 तक सालाना 840 करोड़ यात्रियों को सुरक्षित ढोने वाला विश्व का सबसे बड़ा सुगठित तंत्र कांग्रेस ने भाजपा को सौंप दिया था।

लेकिन 2014 के बाद इस देश ने ‘इवेंट-जीवी और रील्स-प्रबंधन’ का वह दौर देखा, जहां धरातल के काम को कैमरों के वाइड-एंगल और 4्य ड्रोन शॉट्स से रिप्लेस कर दिया गया।

मार्च 2020 में इस संवेदनशील सरकार ने कोविड-19 महामारी की आड़ में देश के लगभग 6.2 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय खिलाडिय़ों को मिलने वाली 40′ से 50′ की रेल किराए की रियायत को हमेशा के लिए छीन लिया, जिससे सालाना 1,500 करोड़ से अधिक की सीधी डकैती बुजुर्गों की जेब पर डाली गई।

व्यंग्य देखिए कि जो सत्ता अपने क्रोनी-कैपिटलिस्ट मित्रों के लाखों करोड़ रुपये के कॉर्पोरेट बैड-लोन को ‘राइट-ऑफ’ करने में एक सेकंड का समय नहीं लेती, वही सत्ता देश के पेंशनभोगियों की रियायत खाकर अपनी तिजोरी चमका रही है।

वर्तमान सत्ता का पूरा ध्यान केवल मु_ी भर ‘वंदे भारत’ जैसी वीआईपी ट्रेनों के पीआर स्टंट पर टिका है, जिनका औसत किराया ?1,200 से 1,600 के बीच है जो इस देश की 80 करोड़ आबादी (जिन्हें सरकार खुद 5 किलो मुफ्त राशन देने का दावा करती है) की मासिक क्रय शक्ति से कोसों दूर है।

इन चंद कॉस्मेटिक ट्रेनों की समयबद्धता और चमक को रील्स पर दिखाने के लिए उन हजारों पैसेंजर, गरीब रथ और एक्सप्रेस ट्रेनों को आउटर सिग्नलों पर 3-3 घंटे तक सडऩे के लिए छोड़ दिया जाता है, जिनमें देश के 90′ आम नागरिक और मजदूर सफर करते हैं।

क्रूरता की पराकाष्ठा यह है कि सामान्य जनभावनाओं को कुचलते हुए एक्सप्रेस ट्रेनों से साधारण (त्रद्गठ्ठद्गह्म्ड्डद्य) और स्लीपर क्लास के डिब्बों की संख्या को औसतन 6 से घटाकर मात्र 2 या 4 कर दिया गया है और जबरन महंगे थर्ड-एसी (्रष्ट) कोच ठूंसे जा रहे हैं, जिसके कारण आज देश के हर स्टेशन पर गरीब मजदूर भेड़-बकरियों की तरह शौचालयों के आगे और फर्श पर पैर रखने की जगह के लिए तड़प रहा है।

रेलवे सुरक्षा की असलियत यह है कि इस समय भारतीय रेलवे में सुरक्षा श्रेणी (स्ड्डद्घद्गह्ल4 ष्टड्डह्लद्गद्दशह्म्4) के तहत लोको पायलट, स्टेशन मास्टर और ट्रैकमैन के लगभग 3.12 लाख से अधिक स्वीकृत पद पूरी तरह खाली पड़े हैं, जिसके कारण मौजूदा लोको पायलटों से जबरन 14 से 16 घंटे तक का ओवरटाइम ड्यूटी कराया जा रहा है।

संसदीय स्थायी समितियों और खुद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (ष्ट्रत्र) की रिपोर्ट संख्या 22 (2022) के अनुसार, राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष (क्रक्रस््य) के तहत मिलने वाले कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षा और पटरियों के नवीनीकरण (ञ्जह्म्ड्डष्द्म क्रद्गठ्ठद्ग2ड्डद्य) पर खर्च न करके गैर-जरूरी प्रशासनिक तामझाम और विज्ञापनों पर उड़ाया गया।

इसी आपराधिक लापरवाही और खाली पदों को न भरने की क्रूर राजनीति का सीधा परिणाम बालासोर (ओडिशा) जैसी रूह कपा देने वाली दुर्घटनाओं के रूप में सामने आता है, जहां तकनीकी खामियों के चलते सैकड़ों मासूम नागरिकों की जान चली जाती है, लेकिन नैतिक जिम्मेदारी के नाम पर रेल मंत्री का इस्तीफा तो दूर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ढंग से नहीं की जाती।

यह सरकार रेलवे का पूरी तरह से कॉरपोरेट टेकओवर (ष्टशह्म्श्चशह्म्ड्डह्लद्ग ञ्जड्डद्मद्गश1द्गह्म्) करने पर आमादा है, जिसके तहत रेलवे स्टेशनों के रख-रखाव को निजी ठेकेदारों को बेच दिया गया और देखते ही देखते ?5 का प्लेटफॉर्म टिकट ?20 तक पहुंचा दिया गया ताकि आम आदमी अपने परिजनों को छोडऩे भी न जा सके।

आईआरसीटीसी (ढ्ढक्रष्टञ्जष्ट) के माध्यम से खान-पान और हॉस्पिटालिटी की कीमतों में 30′ से 40′ तक की भारी बढ़ोतरी की गई है, जबकि गुणवत्ता इतनी बदतर हो चुकी है कि आए दिन यात्रियों के भोजन में कीड़े मिलने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरती रहती हैं।

जिस सार्वजनिक परिवहन को आजादी के बाद एक सामाजिक कल्याण और देश को जोडऩे का जरिया बनाया गया था,

आज की जनविरोधी सत्ता ने केवल एक पब्लिसिटी का खिलौना और मुनाफाखोरी की मशीन बनाकर आम आदमी की पहुंच से पूरी तरह दूर कर दिया है।

 

view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles