आनन्द स्वरूप वर्मा, हिंदी पत्रकारिता : संदर्भ प्रभाष जोशी प्रभाष जोशी ने पंजाब समस्या और क्रिकेट पर खूब लिखा है-देश के शायद ही किसी और अखबार ने पंजाब पर और संपादक की कलम से लिखे क्रिकेट पर इतने अधिक लेख प्रकाशित किये हों। ब्लू स्टॉर ऑपरेशन के दौरान राजधानी से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के दोनों संपादकों-प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर में तो मानो होड़ लग गयी थी कि सैनिक कार्रवाई के संदर्भ में इंदिरा गाँधी और सेना की प्रशंसा में कौन कितना बढिय़ा लिख सकता है। प्रभाष जोशी ने श्रीमती गाँधी की प्रशंसा करते हुए लिखा कि-“गनीमत है कि इतनी देर तक पार्टी के पीलिया से पीली पड़ी प्रधानमंत्री की आँखों और डंडा उठाने से पहले काँपते हाथों ने कुछ देखा और किया।” राजेंद्र माथुर ने 6 जून, 1984 के अपने संपादकीय में एक ‘भारतावतार’ का दर्शन किया तो प्रभाष जोशी ने भारतीय सेना द्वारा ‘इस्पात के अक्षरों से भारत की धरती पर लिखे शब्द’ पढ़े। अपने एक संपादकीय में सेना की प्रशंसा करते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा- “एकता के सेनापति लेफ्टिनेंट जनरल रणजीतसिंह दयाल को पूरे देश का सत श्री अकाल। गुरुगोविंद सिंह के इस सच्चे सिख ने आज फिर साबित कर दिया कि खालसा पंथ देश को तोडऩे और निहत्थे बेकसूर लोगों को मारने वालों को बर्दाश्त नहीं करेगा।” (संपादकीय, 8 जून, 1984) लेकिन मजे की बात यह है कि ‘फोड़े को चीरा लगा कर आतंकवाद का पस निकालना जरूरी था’ लिखने वाले प्रभाष जोशी ने 9 जून, 1984 को ही श्रीलंका सरकार की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों की भत्र्सना करते हुए लिखा कि “इन गिने चुने आतंकवादियों के नाम पर ही सरकार ने बहुत सारे निरंकुश अधिकार प्राप्त कर लिये हैं… असली मकसद आतंकवादियों से निबटना नहीं बल्कि राजनीतिक मंसूबों पर अमल करने का है।”
ब्लू स्टॉर ऑपरेशन के बाद से ही हिंदी पत्रकारिता का उग्र हिंदूवाद साफ-साफ उभर कर सतह पर आ गया। इसमें निरंतर विकास ही होता गया। यही वजह है कि क्रिकेट का दीवाना संपादक (“अपन कोई डॉक्टर नहीं जो मरीज को बुरे हाल पर न छोडऩे की कसम लिये हों। अपन खेल के दीवाने हैं”, प्रभाष जोशी, 4 मई, 1987) जब भारत और पाकिस्तान के बीच मैच देखता है तो उसकी सारी खेल भावना गायब हो जाती है और वह एक हिंदू मानसिकता से ग्रस्त दर्शक बन कर रह जाता है। पहले यह देख लें कि जोशी जी ने अपने क्रिकेट प्रेम का बयान किन शब्दों में किया है- “क्रिकेट के लिए इस गरीब कलम घसीट को पागल समझने वाले पाठक माई-बाप अपने को कोई काँटे की जोड़दार कशमकश आज भी वही धड़कन देती है जो 1948 में इंदौर में वेस्टइंडीज के मैच को देखने वाले दस बरस के लड़के को हुई थी।”(‘भले ही मेजबानी को हम रह गये’, प्रभाष जोशी, 4 मार्च, 1987)। इसी लेख की इन पंक्तियों को देखें- “मार्गरेट अल्वा की लोकतांत्रिक सरकार में दम हो तो टी.वी. और रेडियो पर क्रिकेट दिखाना और सुनाना बंद कर दे। फिर देखें क्या मजा आता है।”
दीवानगी का आलम यह है कि देश में बड़ी से बड़ी घटना हो जाए उससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर क्रिकेट का कोई मैच रोमांचक हो जाए तो जोशी जी का एक लेख ‘जनसत्ता’ के पहले पेज पर जरूर दिखायी दे जाएगा। जो व्यक्ति 1956 से ही ‘टोटली गिवेन टु क्रिकेट’ (4 सितंबर, 1986 को ‘परिवर्तन’ में प्रकाशित इंटरव्यू) यानी क्रिकेट के पीछे पूरी तरह दीवाना हो, उसकी खेल भावना को हिंदू सांप्रदायिकता ने किस तरह दबोच लिया इसकी मिसाल ये पंक्तियाँ हैं- “भारतीयों को पाकिस्तान से हारना जितना बुरा लगता है उतना किसी देश की टीम से किसी खेल में हारना नहीं। और पाकिस्तान तो मानता है कि मांस, मछली, अंडे आदि खाने वाले जो मुसलमान हमलावर खैबर के दर्रे से आए इसीलिए तो जीते और राज करते रहे कि दाल-चावल खाने वाले हिंदुओं से ज्यादा ताकतवर थे और इसलिए उन पर राज करने के लिए ही बने थे। लेकिन जब अँग्रेज जाने लगे और जम्हूरियत आने लगी तो लीग के नेताओं को लगा कि हिंदू बहुमत में हैं इसलिए उनका राज हो जाएगा। अब तक अँग्रेजों के रहते वे अल्पसंख्यक होते हुए भी हिंदुओं के बराबर और पुराने बादशाह और नवाब होने के कारण उनसे ऊपर थे। अब नीचे हो जाएँगे। राज करने वालों पर राज किया जाएगा। इसलिए भारतीय प्रजातंत्र के बजाय लीग ने अपनी अलग तानाशाही पाकिस्तान में बनवा ली। तब से भारत के विरोध में खड़े होकर मूँछ पर ताव देते रहना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जरूरी यह भी है कि वह अपने को दाल-भात और इडली डोसा खाने वाले हिंदुस्तानियों से ज्यादा ताकतवर माने। आप देखिए इमरान खान तेज गोलंदाजी करते हुए कैसी पठानी दिखाते हैं और जहीर अब्बास और जावेद मियांदाद के सामने कोई भी भारतीय गोलंदाज पाकिस्तान में टिक क्यों नहीं पाता था” (‘जिया के क्रिकेट में कूटनीति ज्यादा है,’ प्रभाष जोशी, 12 फरवरी, 1987)।
अपने इसी लेख में आगे चल कर प्रभाष जोशी इतने उत्तेजित हो गये कि भाषा पर भी नियंत्रण खो बैठे और पागलों की तरह प्रलाप करने लगे। जरा इन पंक्तियों पर ध्यान दें- “इस बार भारत में भारत को हराने के पक्के इरादे से इमरान खान घोड़े पर चढ़ कर आए थे और अपनी गोलंदाजी को बड़ी तोप बता रहे थे। पहले टेस्ट में मद्रास में श्रीकांत ने खुद इमरान खान और उनके सबसे घातक गोलंदाज कादिर की गेंदों में भुस भर दिया। श्रीकांत ने इमरान की ऐसी बेरहमी से धुनाई की है कि पहले किसी बल्लेबाज ने नहीं की थी। इडली-डोसे ने तंदूरी मुर्गे और गोश्त दो-प्याजा में मसाले की जगह भूसा भर दिया,” धन्य हो जोशी जी और धन्य है आपका खेल प्रेम। अगर आपका बस चले तो आप इन खिलाडिय़ों का गला ही दबोच दें।
पाकिस्तानी खिलाडिय़ों के खिलाफ जोशी के इस बेशर्मी भरे प्रलाप की वजह यह थी कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिया क्रिकेट मैच देखने जयपुर आ रहे थे। नवंबर 1986 में राजीव गाँधी ने श्रीनगर की एक सभा में कहा था कि अगर पाकिस्तान ने इस बार भारत पर हमला करने की कोशिश की तो यह उसका ‘वाटरलू’ साबित होगा। उन्होंने कहा कि वह अपने यहाँ खालिस्तानी आतंकवादियों को शरण और प्रशिक्षण दे रहा है। प्रभाष जोशी काफी समय तक इसे सही नहीं मानते थे-“पाकिस्तान बंगलादेश का बदला जरूर लेना चाहता है लेकिन यह भी जानता है कि सिख अलगाववाद को अगर उसने खुल कर हवा दी तो अफगानिस्तान में नाकेबंदी कर के बैठे रूस के कारण भारत पाकिस्तान को बलूचिस्तान और सिंध में तोड़ सकता है। अपने अस्तित्व की कीमत पर पाकिस्तान खालिस्तानी खेल नहीं नात और खाते है, खेलेगा “(‘हिंदू सिख संकट और दुविधाएँ’, 12 अक्टूबर, 1984)। फिर मार्च 1987 में भी जोशी जी ने लिखा कि ‘पंजाब को तोडऩे के लिए पाकिस्तान का हव्वा कई सालों से छोड़ा जा रहा है’ पर रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद आंदोलन को लेकर जिस तेजी से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण शुरू हुआ और इसकी भत्र्सना करने की बजाय ‘जनसत्ता’ जिस तरह रामजन्मभूमि आंदोलन का समर्थक बनता गया, उससे प्रभाष जोशी बार-बार पाकिस्तान को सबक सिखाने की माँग करने लगे – “जरूरी हो तो भारत के पास इतने सैनिक और इतनी बंदूकें हैं कि वह पंजाब में आतंकवादियों के साथ-साथ पाकिस्तान से भी निपट सकता है। ऐसे निश्चय और ऐसी सख्ती के बिना अब पंजाब पर काबू नहीं पाया जा सकता” (‘अब कोई शॉर्टकट नहीं है’, प्रभाष जोशी 15 मई, 1987)।
मेरठ के दंगों के बाद तो ‘जनसत्ता’ ने यह घोषित ही कर दिया कि अल्पसंख्यकों की आक्रामकता बढ़ रही है और बहुसंख्यकों को इस आक्रामकता का सामना काफी दिनों से करना पड़ रहा है- “इधर कुछ सालों से अल्पसंख्यक आक्रामकता सामान्य मर्यादाएँ लाँध गयी है और बहुसंख्यकों में इसकी व्यापक प्रतिक्रिया दिखायी दे रही है। इसका एक कारण बाबरी मस्जिद आंदोलन भी है। इस आंदोलन का कोई औचित्य किसी हिंदू को समझ में नहीं आ सकता और न ही वह अपनी श्रद्धा को लेकर कोई समझौता करने के लिए तैयार हो सकता है।” (‘एकता ऐसे नहीं होगी,’ संपादकीय 26 जून, 1987)। मेरठ के दंगों के बाद प्रशासन द्वारा सभा जुलूसों पर रोक लगा दी गयी थी, रथयात्रा की इजाजत नहीं दी जा रही थी। इस पर ‘जनसत्ता’ ने टिप्पणी की कि “दुनिया के किसी देश की सरकार अपने लोगों के सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों पर इस तरह की मनमानी पाबंदी नहीं लगा सकती।” लोगों ने इस पाबंदी का उल्लंघन किया और ‘जनसत्ता’ ने लिखा- “मेरठ के लोगों ने दिखा दिया कि आम भारतीयों के धार्मिक कार्यक्रमों से खिलवाड़ के क्या नतीजे निकल सकते हैं” (‘मेरठ में रथयात्रा’, संपादकीय 4 जुलाई, 1987)।
ये बेशर्म रक्षक’ (25 अप्रैल, 87) में राजेंद्र माथुर को इंगित करते हुए लिखा- “यह लेख सत्ता प्रतिष्ठान के उन नये पुराने वकीलों के लिए भी नहीं है जो अपना काला कोट सँभालते और तुतलाते हुए जनता की अदालत में बबुआपन के कतर्क दे रहे हैं… इन बेचारे वकीलों की आत्मा, जबान और कलम पर ईमानदारी का बड़ा बोझ है ये ईमानदार कलमें हैं जिनमें बेईमानी जिम्मेदारी के साथ निकलती है…” जोशी जी से कौन कहे कि हुजूर आप भी तो राजीव गाँधी को लेकर इसलिए गदगद थे क्योंकि “उन्होंने वे तनाव दूर किये जो उनकी माँ ने खडे किये थे। वे समझौते किये जिन्हें इंदिरा गाँधी कभी भी कर सकती थीं लेकिन नहीं करती थीं। उस विपक्ष को सह अस्तित्व का भरोसा दिया जो केंद्र में कोई चुनौती की ताकत नहीं रखता था” (‘उबारा नहीं तो उबाया भी नहीं’, प्रभाष जोशी, 31 अक्टूबर, 85)। आपको क्यों 1987 में यह महसूस हो सका कि “राजीव गाँधी ने इंदिरा गाँधी की हत्या को बेशर्मी से भुना कर तीन चौथाई मत पाया।” यह बात तो 1985 में भी आपको मालूम थी जब आपने लिखा -“प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गाँधी से जो भी मिला है, उसने एक आकर्षण महसूस किया है और उनके बारे में एक मधुरता और लगाव लेकर लौटा है। सत्ता का एक प्रभा मंडल होता है और किसी भी तरह की सत्ता वाले आदमी में से जैसे तरंगें निकलती हैं जो लोगों को लुभाती भी हैं और दूर भी धकेलती हैं। राजीव गाँधी की उपस्थिति में जो असर होता है उसमें भी राजनैतिक सत्ता का हाथ होगा पर पिछले सोमवार को प्रधानमंत्री के दफ्तर में कोई 30 संपादकों से घंटेभर की बातचीत के दौरान एक बार अचानक लगा कि यह मामला सिर्फ सत्ता और सुंदरता का नहीं है” (‘मेकअप से काम नहीं चलता’, प्रभाष जोशी, 12 सितंबर, 1985)।
जोशी जी मुग्ध थे-राजीव की सुंदरता और विनम्रता पर। यह पढ़ते समय मुझे पुष्पा भारती का एक लेख याद आता है जिसमें उन्होंने लिखा था -“आह, मैं अपने देश के प्रधानमंत्री को इतने निकट से देख रही हूँ। उनके पिघले सोने सा रंग, उन्नत ललाट, बेहद सुंदर कटावदार बड़ी अंखियाँ, सुंदर नासिका और कुछ-कुछ भिंचे से, बहुत कोमल गुलाबी जिल्दवाले अधर!” (धर्मयुग, 9 जून, 1985) अपने इसी लेख में प्रभाष जोशी राजीव की खूबियों का वर्णन करते हुए लिखते हैं- “वे भले ही कोमल और सुंदर लगते हों पर बढ़ते हाथ से उनमें लाजवंती जैसा कुम्हलाना नहीं है, न कछुए की तरह अपने सारे अंग वे ढाल की पीठ के नीचे सिकोड़ते हैं… राजीव गाँधी सुनने, सुनाने और आलोचना या रचनात्मक सुझाव को बिना चिढ़े मान लेते हैं। इस बात की ताईद विपक्ष के बजरबट्टू नेताओं से लेकर नेहरू खानदान के नाम से ही बिचकने वाले सनर्की तक करते हैं। राजीव गाँधी अपनी मुस्कान और अपने खुलेपन से तनाव, टकराव और कटुता को दूर कर के जैसे आपको नि:शस्त्र कर देते हैं… राजीव गाँधी में अगर एक जवान आदमी का यह सहज आत्मविश्वास और खुलापन नहीं होता तो वे अपनी सत्ता और स्थिति के प्रति इतने आश्वस्त नहीं होते…”(‘मेकअप से काम नहीं चलता’, प्रभाष जोशी, 12 सितंबर, 1985)। 18 सितंबर, 1987 के बाद से ‘जनसत्ता’ हाथ में लेते समय एक क्षीण सी आशा रहती है कि शायद प्रभाष जोशी ने सती प्रथा के समर्थन में लिखा संपादकीय वापस ले लिया हो। ‘हंस’, नवंबर 1987 क्रमश: