आनन्द स्वरूप वर्मा साल 2014 में मोदी के आने के बाद से गोदी मीडिया ने अपनी लुंगी उतार कर खूंटी पर टांग दी और समाज में जहर फैलाने का नंगा नाच खुल कर एक ही ताल पर शुरू किया जो आज भी ठीक ऐसे ही बढ़ता जा रहा है जैसे हमारे न चाहते हुए भी हर पल हमारी उम्र।बढ़ती उम्र के साथ घटते सामाजिक ताने बाने को देखने के लिए हम और आप भी मजबूर हैं। पर ये श्राप क्या सच में हमें नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही लगा या उससे पहले भी राजनैतिक दल और उससे भी बढ़ कर मीडिया के तथाकथित हीरो लोग समाज में धर्म के जहर को बड़े ही महीन ढंग से और कभी-कभी क्रूर तरीके से फैलाने में लगे थे।
इस कठिन समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रविश कुमार जैसे पत्रकारों ने बेशक एक लौ जगाए रखी है पर देखना होगा कि खुद सभी को गोदी मीडिया का नाम देने वाले रविश कुमार क्या खुद गोदी जैसे नहीं बन गए हैं? क्या वे पत्रकार की ही तरह रिपोर्ट करते हैं या वे और उनके जैसे अन्य भी एक खास तरह के गोदी मीडिया में तब्दील हो चुके हैं? आनंद स्वरूप वर्मा जी की किताब पत्रकारिता का अंधा युग में इन सभी सवालों के जवाब सबूत समेत दिए गए हैं। हम समझते हैं कि किताब पढऩे का चलन यंगस्टर्स में बड़े स्तर पर गायब है तो वहीं whatsapp से ज्ञान लेने और टिकटोक की विडिओ रील देश के भविष्य के ठेकदार नौजवानों में काफी पोंपुलर है। इसलिए हमने भी सोचा कि बात को किताब से निकाल कर धारावाहिक के रूप में अन्य माध्यम से गंभीर लोगों तक पहुंचाया जाए।
इसी क्रम में आज का पहला भाग: एपिसोड-1
मीडिया : आजादी और जवाबदेही मीडिया की आजादी और इसकी जवाबदेही विषय पर आज जब भी कोई गंभीरता से विचार करता है तो एक भयानक तस्वीर सामने आती है। ऐसा लगता है जैसे सारा मीडिया आज एक अंधकार के युग में प्रवेश कर गया है। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों ने देश की जनता को एक खास ढंग की राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी सँभाल ली है और इस प्रक्रिया में उसके लिए हर व्यक्ति या संगठन देश का दुश्मन है जो सांप्रदायिकता, अंधराष्ट्रवाद, असहिष्णुता और राजनेताओं की गुंडागर्दी का प्रतिरोध करता है, और जो भीड़ के न्याय का विरोधी है व जो तर्कशीलता में यकीन करता है।
इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हीं ताकतों को बढ़ावा दे रहा है जिन्होंने लगातार जनतंत्र के दायरे को संकुचित किया है। मीडिया एक शर्मनाक भूमिका निभा रहा है और भारत के इतिहास में एक ऐसा रक्तरंजित पन्ना जोडऩे की तैयारी में लगा है जिससे निजात पाने में आने वाली पीढ़ी को अनेक लंबे और दर्दनाक रास्तों से गुजरना होगा। क्या इस तरीके से उन लोगों की जुबान पर हमेशा के लिए ताला लगाया जा सकेगा जो कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार से थोड़ा भी अलग राय रखते हैं?
क्या मुसलमानों ही नहीं बल्कि देश और देश के तमाम उत्पीडि़त जनों से प्यार करने वाले उन हिंदुओं के अंदर भी यह खौफनाक संदेश पहुँचाने की कोशिश नहीं की जा रही है कि अगर तुमने किसी मुद्दे पर ‘हिंदुत्ववादियों का विरोध किया तो तुम्हें थाने या अदालत के दरवाजे तक पहुँचने से पहले ही लंपटों और गुंडों की भीड़ के हवाले कर दिया जाएगा? क्या सवालों से जूझते दलित और गैर दलित नौजवानों के दिलों में दहशत पैदा की जा सकेगी जिन्हें बखूबी पता है कि भारत में फासीवाद मनुस्मृति को बगल में दबाये ब्राह्मणवाद के रथ पर सवार होकर संविधान को रौंदते हुए आने की तैयारी में लगा है? क्या बंदे मातरम और भारतमाता की जय जैसे नारे आज हत्यारों और बर्बरों के रक्षाकवच नहीं बन गये हैं?
हमारे इस लोकतंत्र को आतताइयों का तंत्र बनाने के लिए जो रचना चल रही है उसमें यह हमारे लिए और उन सभी लोगों के लिए, जो इस देश में संविधान और जनतंत्र को बचाये रखना चाहते हैं और जो विभिन्न धर्मों और समुदायों की एकजुटता में विश्वास रखते हैं, चिंता की बात है। आज मीडिया विभिन्न समुदायों को आपस में लड़ाने, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को जटिल बनाने, कॉरपोरेट घरानों की लूट को आसान बनाने और पूरे देश में एक सांप्रदायिक माहौल तैयार करने में जबर्दस्त भूमिका निभा रहा है। आज की तारीख में जनतांत्रिक दायरा कितना सिकुड़ गया है इसे समझने के लिए ‘इंडिया टुडे कॉनक्लेवÓ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ पत्रकार राहुल कंवल के उस संवाद की ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूँगा जिसमें जेएनयू से संबंधित एक सवाल के जवाब में अमित शाह ने कहा, “अफजल गुरु की फाँसी के दिन इक_ा होना इटसेल्फ देशद्रोह है। इसमें नारे का सवाल ही नहीं कि किसने लगाये किसने नहीं लगाये…।”
अब जरा इस बात पर भी गौर करें; 2004 ही सहआरोपी एसएआर गिलानी के बचाव के लिए जो आल इंडिया अफजल के कमेटी बनी थी उसके अध्यक्ष प्रसिद्ध समाज विज्ञानी रजनी कोठारी थे और अन्य सदस्य थे सुरेंद्र मोहन, अरुणा राय, संदीप पांडेय, अरुंधति राय, प्रभाष जोशी, संजय काक, नंदिता हक्सर, सईदा हमीद आदि। क्या ये सभी देशद्रोही माने जाएँगे? राहुल कंवल के अंदर यह पूछने का साहस नहीं था। मीडिया आज क्यों इस स्थिति में पहुँच गया है, इस पर • गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है। इस संदर्भ में पिछले चार-पाँच दशकों के दौरान मीडिया के विकास और इसके अध:पतन का संक्षेप में जिक्र करना मौजूं रहेगा।
जून 19।5 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने जब पूरे देश में आपात स्थिति की घोषणा की और अखबारों पर सेंसरशिप लगायी तो यह आजादी के बाद की पहली घटना थी। 1977 में इमरजेंसी के समाप्त होते ही और सेंसरशिप हटते ही अखबारी दुनिया में ऐसी हलचल मची जैसे किसी स्प्रिंग को जबर्दस्ती नीचे तक दबा कर अचानक छोड़ दिया गया हो। इसके बाद अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और पाठकों की संख्या में न केवल अभूतपूर्व वृद्धि हुई बल्कि राजनीतिक विषयों में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। अनेक ऐसी पत्रिकाएँ, जो रहस्य-रोमांच और अपराध कथाओं से भरी होती थीं. उन्होंने भी अपना तेवर और कलेवर बदल दिया और राजनीतिक खबरें छापने लगीं। इसी के साथ पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता या इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म की शुरुआत हुई। इस खोजी पत्रकारिता ने लोगों का ध्यान तेजी से आकृष्ट किया और कुछ अच्छी स्टोरी भी पाठकों को पढऩे को मिलीं। लेकिन इसका एक घातक पहलू इस रूप में सामने आया कि अखबारों से गंभीर और विश्लेषणात्मक सामग्री का सफाया होता गया। पाठकों की रुचि बदलती गयी और फिर उसे मसालेदार सामग्री की तलाश होने लगी। धीरे- धीरे खोजी पत्रकारिता ने राजनीतिक विषयों पर सनसनीखेज सामग्री देनी शुरू की और इसी को उपलब्धि मान लिया गया।
इस दौरान एक और महत्त्वपूर्ण बात यह देखने को मिली कि अखबारों की बढ़ती पाठक संख्या और जनमत तैयार करने की इनकी अद्भुत क्षमता ने राजनेताओं का ध्यान पहली बार हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों और पत्रकारों की ओर आकृष्ट किया। नतीजतन इस ‘चौथे स्तंभÓ को ग्लैमर मिल गया। इस ग्लैमर से आकर्षित होकर बड़ी संख्या में ऐसे लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में आए जिनके दिमाग में न तो कोई मिशन था और न कोई उद्देश्य। इस स्थिति ने उन पत्रकारों के अंदर बड़ी निराशा पैदा की जो सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में अपनी भूमिका ढूँढ थे और जो अपनी कलम के जरिये सामाजिक न्याय की लड़ाई में योगदान करना चाहते थे। वैसे देखा जाए तो 1977 से 1980 का दौर पत्रकारिता के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। क्रमश: