ऑडडर से भ्रष्ट निगम अधिकारियों ने नहीं किया पर्यावरण संरक्षण पर पैसा खर्च

ऑडडर से भ्रष्ट निगम अधिकारियों ने नहीं किया पर्यावरण संरक्षण पर पैसा खर्च
August 05 07:24 2024

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) औद्योगिक नगरी में प्रदूषण स्तर 2017 से भी कम करने के उद्देश्य से 2019 में शुरू किए गए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) नगर निगम के भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारियों के कारण $फ्लॉप हो गया। इस कार्यक्रम को परवान चढ़ाने के लिए 2019 में जारी की गई 21.95 करोड़ रुपये की राशि में से केवल 39 प्रतिशत ही खर्च की जा सकी है। वह भी वायु गुणवत्ता सुधार के स्थायी उपाय करने के बजाय ग्रेप लागू होने पर रोकथाम और सफाई पर खर्च किए गए।

वायु गुणवत्ता सुधारने के वैज्ञानिक तरीकों से अनभिज्ञ नगर निगम के इंजीनियरों ने इस तरह के प्रोजेक्ट तैयार किए जिनसे उनकी जेबें तो भरतीं लेकिन पर्यावरण को कोई फायदा होने वाला नहीं था। केंद्र सरकार का कार्यक्रम होने के कारण इस मद में खर्च होने वाली एक एक पाई का हिसाब देने के डर से अपनी गर्दन बचाने के लिए बड़े अधिकारियों ने इन फाइलों को स्वीकृति नहीं दी। नतीजा सबके सामने है फरीदाबाद देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है।

सर्दी नहीं बढ़ी है बल्कि हमारी सहनशक्ति कम हो गई है इसलिए हमें ठंड लगती है जैसे अवैज्ञानिक तर्क देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाहवाही लूटने के लिए वर्ष 2019 में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम का ढिंढोरा पीटा था। उन्होंने जिस तरह स्मार्ट सिटी और 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का जुमला फेका था उसी तरह 2024 तक देश के सवा सौ सबसे प्रदूषित शहरों की वायु गुणवत्ता 2017 से भी 30 प्रतिशत तक बेहतर करने की घोषणा की थी। स्मार्ट सिटी की तरह ही इसके लिए शहरों को बजट भी आवंटित किया गया। राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसकी मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदारी सौंपी गई लेकिन हवा साफ कैसे की जाएगी, पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या खास कदम उठाए जाएंगे इसकी कोई योजनाबद्ध रणनीति नहीं बनाई गई। हां, कोई भी काम या प्रोजेक्ट का दो बार क्रॉस चेक करने और कड़ी ऑडिट की व्यवस्था जरूर की गई।

2019 में एनसीएपी के तहत फरीदाबाद नगर निगम को भी 21 करोड़ 95 लाख रुपये आवंटित किए गए। निगम के होनहार अधिकारियों ने फंड की बंदरबांट करने के लिए आनन-फानन प्रोजेक्ट एस्टीमेट तैयार कर डाले लेकिन ऑडिट में फंसने के डर से कार्यकारी अभियंता से लेकर चीफ इंजीनियर और निगम आयुक्त तक सब आपत्ति लगा देते। नतीजा ये हुआ कि प्रोजेक्ट में कमाई की कोई गुुंजाइश नहीं रही, टेंडर प्रक्रिया शुरू भी की गई तो कोई ठेकेदार काम लेने आगे नहीं आया। इस मद मेें बीते दो साल में एक भी टेंडर नहीं हुआ।

अधिकारियों की अरुचि के कारण शहर के प्रदूषण का स्तर साल दर साल खराब ही होता चला गया। जानकारों के अनुसार वायु प्रदूषण के दो प्रमुख तत्व पर्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) और पीएम 10 हैं। पीएम 2.5 प्रदूषण धुएं के कारण फैलता है जबकि पीएम 10 प्रदूषण धूल के उडऩे से बढ़ता है। शहर में बीते दस साल में दो पहिया चार पहिया वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यही वाहन पीएम 2.5 प्रदूषण का मुख्य कारण हैं, जाम लगने वाली जगहों पर पीएम 2.5 प्रदूषकों की मात्रा काफी ज्यादा मापी जाती है।
नगर निगम ने शहर के प्रमुख चौक चौराहों को जाम मुक्त करने के लिए कोई खास बदलाव तो किया नहीं लेकिन स्मार्ट सिटी बनाने के जुनून में उन जगहों पर भी ट्रैफिक लाइटें लगवा दी गईं जहां कभी ट्रैफिक नहीं रुकता था, ट्रैफिक लाइट लगने से वहां वाहनों को तीस सेकेंड से साठ सेकेंड तक रुकना पड़ता है, बहुत ही कम चालक इस दौरान वाहन का इंजिन बंद करते हैं, जिससे वायु मेें हाइड्रोकार्बन कण प्रदूषण के रूप में बढ़ते हैं।

पीएम दस का प्रमुख कारण सडक़ों से उठने वाली धूल है। निगम के कार्यकारी अभियंता नितिन कादियान के अनुसार एनसीएपी के तहत निगम ने 15 सडक़ों को चिह्नित किया था जिन पर धूल के कारण प्रदूषण बढ़ता है। इन सडक़ों को पक्का किया जाना था लेकिन केवल छह सडक़ों को ही पक्का किया जा सका है। दो सडक़ों को पक्का करने के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा सडक़ों को धूल मुक्त करने के लिए स्वीपिंग का काम रात में शुरू कराया गया है। एनसीएपी के तहत उसके फंड से तीन फॉगिंग मशीनें खरीदी गई हैं। उन्होंने बताया कि प्रोग्राम के तहत आई राशि को पर्यावरण संरक्षण पर अधिक से अधिक खर्च करने के प्रयास किए जा रहे हैं इसके तहत ग्रीन बेल्ट पर पौधरोपण भी किया जाएगा।

दरअसल, नगर निगम रोड स्वीपिंग भी कराता है और ग्रीन बेल्ट में पौधरोपण भी लेकिन ये सब निगम के फंड से किया जाता है क्योंकि कागजों पर काम कराकर धन की बंदरबांट आसानी से हो जाती है। सच्चाई ये है कि स्वीपिंग मशीनें निगम के अधिकारियों और ठेकेदारों की ऊपरी कमाई का बड़ा ज़रिया हैं। ठेकेदार निझावन बंधुओं की ये मशीनें कागजों पर तो रोज़ चलाई जाती हैं, निगम सूत्रों के अनुसार प्रत्येक मशीन को एक दिन में पचास से लेकर सौ लीटर तक डीजल दिया जाता है। कागजों पर आठ मशीनें चलना दिखाया जाता है जबकि सडक़ पर एक दो को ही उतारा जाता है, डीजल की कालाबाजारी कर रुपये ठेकेदार से लेकर ऊपर तक बंटते हैं।

जब निगम फंड से ही ठीक ठाक कमाई हो रही हो तो एनसीएपी के फंड की क्रास चेकिंग और ऑडिट के झंझट में क्यों पडें, शहर की आबो-हवा बद से बदतर होती जाए इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं।

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Mazdoor Morcha
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