फरीदाबाद (म.मो.) केरल के मां अमृतमयी ट्रस्ट ने करीब तीन साल पूर्व, ग्रेटर फरीदाबाद के सेक्टर 88 में 2400 बिस्तरों वाला एक ऐसा अस्पताल बनाने की योजना तैयार की थी जिसमें प्राइमरी हेल्थ केयर से लेकर हर प्रकार की सुपर स्पेशलिटी हेल्थ केयर उपलब्ध होगी। फिलहाल कहा तो यह जा रहा है कि साधन-सम्पन्न मरीजों से पूरी फीस ली जायेगी लेकिन गरीब लोगों को विशेष रियायती दरों पर इलाज उपलब्ध कराया जायेगा; वास्तव में होगा क्या वह तो समय ही बतायेगा।
इस परियोजना के लिये ट्रस्ट ने पहले पांच करोड़ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से 100 एकड़ ज़मीन खरीदी, लेकिन विस्तार के लिये ज़मीन कम पड़ती नज़र आई तो करीब 32 एकड़ ज़मीन और खरीद ली। अस्पताल के साथ-साथ इसमें मेडिकल कॉलेज चलाने की भी योजना बताई जा रही है।
फिलहाल ट्रस्ट ने इसके लिये एनएमसी (नेशनल मेडिकल काऊंसिल) को कोई आवेदन अभी तक नहीं दिया है। विदित है कि आवेदन मिलने के बाद ही एनएमसी संस्थान का निरीक्षण करने के पश्चात मेडिकल कॉलेज चलाने की स्वीकृति प्रदान करती है।
अस्पताल की बहुमंजिला भव्य इमारत में 64 ऑपरेशन थियेटर (ओटी) हैं। 500 बेड की आईसीयू बनाने की योजना है। अस्पताल की योजनाओं को देखते हुये समझा जा रहा है कि यहां पर दुनिया भर की आधुनिकतम मशीनें एवं चिकित्सा उपकरण लगाये जायेंगे। जानकार बताते हैं कि विदेशों में, जहां-तहां बैठे, अपने-अपने विषय के विशेषज्ञों का सम्पर्क इस अस्पताल से रहेगा। वे विशेषज्ञ डॉक्टर वक्त जरूरत यहां भी आया करेंगे। उनका काम सीधे तौर पर मरीज़ों का इलाज करने की बजाय अस्पताल में मौजूद वरिष्ठ डॉक्टरों को सलाह मशवरा आदि देने का होगा। ऐसे विजिटिंग डॉक्टर्स पैसे के लोभ की बजाय केवल ट्रस्ट के प्रति श्रद्धा के चलते आया करेंगे।
बताने की जरूरत नहीं कि इतना बड़ा अस्पताल पहले दिन से ही पूरी क्षमता से नहीं चला करता। शुरूआती दौर में केवल 300 बिस्तरों के वार्ड ही चालू किये जायेंगे। इसके लिये, बताया तो यह जा रहा है कि तमाम विधाओं के डॉक्टर्स व अन्य आवश्यक स्टाफ भर्ती कर लिया गया है और तमाम आवश्यक साजो-सामान स्थापित कर दिया गया है, हकीकत क्या है वह तो वहां जाने वाले मरीज़ ही बता पायेंगे।
मोदी की प्राथमिकता अस्पताल नहीं सेंट्रल विस्टा व विशेष विमान हैं तमाम राज्य सरकारों के बजट को छोड़ भी दें तो अकेले केन्द्र सरकार का बजट ही 40 लाख करोड़ से अधिक का है। इसके बावजूद इतने बड़े बजट में से मोदी सरकार बीते आठ वर्षों में एक भी अस्पताल अम्मा वाले जैसा नहीं बना पायी। अम्मा तो किसी से टैक्स भी नहीं वसूलती, उनके पास न तो जीएसटी का महकमा है और न ही इनकम टैक्स व ईडी जैसे उगाही वाले महकमे हैं। उनके पास तो केवल जनता का स्नेह श्रद्धा एवं विश्वास है। जनता यह मान कर उन्हें दान देती है कि उसका उपयोग जन कल्याण में ही होगा। दूसरी ओर लोग टैक्स की चोरी यह मान कर करते हैं कि उनका धन सरकारी ऐय्याशियों व भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगा।
क्या ही अच्छा होता यदि मोदीजी बीते तीन साल से चलने की आस देख रहे, छांयसा स्थित अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करने आये होते। बेशक खट्टर सरकार ने इस वर्ष से मेडिकल कॉलेज चालू करने का एलान कर रखा है लेकिन वहां अस्पताल के नाम पर अभी तक निल बटा सन्नाटा ही है। न तो वहां पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही आवश्यक स्टाफ व उपकरण आदि हैं। जाहिर है ऐसे में वहां कभी कभार दो-चार भूले-भटके मरीज ओपीडी में पहुंच जाते हैं जिन्हें भी बीके अस्पताल का रास्ता, जो वे पहले से ही जानते हैं, बता दिया जाता है।
अमृतमयी अम्मा के इस अस्पताल की लागत करीब दो हजार करोड़ आंकी जा रही है। इसे चलाने का आरम्भिक खर्च 300 करोड़ वार्षिक तक होने का अनुमान है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इतने भारी-भरकम खर्चों को अम्मा जी का ट्रस्ट उठा पायेगा अथवा छात्रों व मरीजों से फीस वसूल कर चलाया जायेगा?
लेकिन जिस पीएम के पास 20 हजार करोड़ सेंट्रल विस्टा के लिये, साढ़े आठ हजार करोड़ अपने विशेष विमान के लिये तथा सवा लाख करोड़ बुलेट ट्रेन के लिये हो सकते हैं तो जनता के अस्पतालों के लिये क्यों नहीं हो सकते? इतना ही नहीं बीते आठ साल में मोदी जी अपने विशेष कार्पोरेट मित्रों का 10 लाख करोड़ कर्ज भी माफ कर चुके हैं, परन्तु अस्पताल उनकी किसी प्राथमिकता में नहीं आता।
मोदी का आना जनता की मुसीबत बना सर्वविदित है कि मोदी जी सडक़ मार्ग से न चलकर वायु मार्ग से ही चलते हैं। इसके बावजूद जि़ला प्रशासन ने सडक़ों की साज-सज्जा के नाम पर बीते एक सप्ताह से क्षेत्र की जनता का आवागमन दूभर कर रखा है। बडखल चौक से सेक्टर 28 व 29 होते हुये बाइपास को जोडऩे वाली जिस सडक़ पर बीते चार साल से कछुआ गति से काम चल रहा था, उस पर अब खरगोश की गति से काम चल रहा है। यही सडक़ नहर पार करके ग्रेटर फरीदाबाद में भी जा रही है। मोदी के आगमन को लेकर इस सडक़ पर आवागमन रोक दिया गया है। ऐसे में नहर पार से आने वाले या नहर पार को जाने वाले लोगों को करीब कई किलो मीटर दिल्ली की तरफ चल कर लकड़ी के एक खतरनाक पुल से नहरों को पार करने का जोखिम उठाना पड़ता है।
यही स्थिति खेड़ी पुल वाली सडक़ की भी है वहां से भी आवागमन बंद कर दिया गया है। यहां से गुजरने वालों को भी उसी खतरनाक लकड़ी के पुल का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। पैदल यात्रियों के साथ-साथ दुपहिया वाहनों के इस पर चलने से जोखिम और भी बढ़ गया है। ओल्ड फरीदाबाद चौक से चल कर जो ऑटो खेड़ी पुल तक सवारियों को लाया ले जाया करते थे, उन्हें अब बाइपास पर लगी लाल बत्ती पर ही रोक दिया जाता है। वहां से खेड़ी पुल तक करीब डेढ़ किलो मीटर लोगों को पैदल चलना पड़ता है। हां, विशेष वर्ग के लोगों की कारों अथवा पुलिस की मुठ्ठी गर्म करने वालों को सभी स्थानों से आने-जाने की छूट है।
बडख़ल चौक से बाइपास की ओर जाने वाली 126 करोड़ की लागत से सजायी-संवारी गयी सडक़ के दोनो ओर बने जिन मकानों के पिछवाड़े इस सडक़ पर पड़ते हैं उनके वे छोटे-छोटे दरवाजे बंद करा दिये गये हैं जिनके द्वारा वे हरित पट्टी में आ कर उसकी देख-भाल करते थे। इतना ही नहीं इन घरों की दीवारों को भी प्रशासन ने फूहड़पने के रंग-रोगन से पोत दिया है। यह सब प्रशासनिक दादागिरी नहीं तो और क्या है?
अस्पताल बनाने वाले मज़दूरों की आई शामत तो अम्मा से मिली राहत बीते करीब तीन वर्षों से अस्पताल की इमारत का निर्माण कार्य करने में जुटे करीब सात-आठ हजार मज़दूरों के लिये मोदी का आगमन किसी बड़ी मुसिबत से कम नहीं। बिहार, उड़ीसा, आसाम आदि राज्यों से आये ये मज़दूर लम्बे-चौड़े अस्पताल परिसर के एक कोने में झुग्गियां बना कर सपरिवार रह रहे हैं। इन पर दादागिरी व नियंत्रण रखने के लिये भारतीय मज़दूर संघ व बजरंग दल जैसे गिरोहों के कुछ लोग वहां छोड़े हुए हैं।
संघी सरकार एवं अस्पताल प्रशासन यह नहीं चाहता कि ये मज़दूर किन्हीं बाहरी अथवा स्थानीय लोगों से किसी प्रकार का सम्पर्क बना कर अपनी किसी समस्या पर विचार विमर्श कर लें। डरते-घबराते, कैदी जैसी स्थिति में रह रहे कुछ मज़दूरों ने इस संवाददाता को बताया कि उन्हें संघी गुंडों ने आदेश दिया है कि वे लोग 21 तारीख को यह जगह पूरी तरह से खाली करके कहीं भी चले जायें, यहां नहीं दिखाई देने चाहिये। ऐसा न करने पर पुलिस उन्हें घसीट-घसीट कर कहीं भी फेंक देगी। इतना ही नहीं, मोदी के जाते ही अगले दिन यानी 25 तारीख से उन्हें फिर से काम के लिये हाजिर होना होगा।
मोदी सहित तमाम भाजपाई नेता जिन गरीब मज़दूरों की दुहाई दे-दे कर वोट मांगते हैं, उन्हीं मज़दूरों से इतनी नफरत क्यों? दरअसल यह नफरत ही मोदी जैसे नेताओं का असली चाल-चरित्र व चेहरा है।
भाजपाईयों द्वारा खड़ी की गई इस संकट की घड़ी में मजदूर सीधे अम्मा की शरण में गये। उनकी फरियाद सुनकर अम्मा ने संघियों को बुरी तरह से हडक़ाया और पुलिस को हिदायत दी कि मजदूरों को न छेड़ा जाये।