मज़दूरों के पैसे पर पलने वाला ईएसआई कॉर्पाेरेशन अब उन्हें खिलाएगा घटिया दवाएं

मज़दूरों के पैसे पर पलने वाला ईएसआई कॉर्पाेरेशन अब उन्हें खिलाएगा घटिया दवाएं
September 01 11:38 2024

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ईएसआई कॉर्पाेरेशन के डायरेक्टर प्रोक्योरमेंट डॉ. सीसी खाखा ने बीते सप्ताह एक फरमान जारी किया है कि अब कॉर्पाेरेशन के सभी मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल, डिस्पेंसरी आदि में नॉन आरसी दवाएं स्थानीय दुकानदारों से डिस्काउंट पर ली नहीं जाएं। इसके बदले ये सारी दवाएं प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना के जरिए खरीदी जाएं। इसके पीछे कारण बताया गया है कि जेम पोर्टल या स्थानीय दुकानों से डिस्काउंट पर खरीदी जाने वाली दवाएं ब्रांडेड होने के कारण काफी महंगी होती हैं, और बीते वर्षों में स्थानीय खरीदारी का अनुपात काफी तेजी से बढ़ा है, इस कारण इलाज का खर्च भी काफी बढ़ा है, जो कि चिंता का विषय है।

31 जनवरी 2024 को हुई ईएसआईसी सर्वाेच्च स्तर की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में दवाओं की खरीद पर बढ़ रहे खर्च की समीक्षा हुई और नॉन आरसी दवाएं जन औषधि व्यवस्था से खरीदे जाने की अनुशंसा की गई। इस आधार पर उन्होंने कॉर्पोरेशन के सभी मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, डिस्पेंसरियों के प्रबंधन को आदेश दिया है कि वे दवाओं की आपूर्ति के लिए अपने राज्य में फार्मास्यूटिकल्स एंड मेडिकल डिवाइसेज ब्यूरो ऑफ इंडिया (पीएमबीआई, यह संस्था पूरे भारत में प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजा का संचालन करती है) के साथ समझौता करें। समझौते के बाद संबंधित राज्य में पीएमबीआई के अधिकृत चैनल पार्टनर के जरिए दवाओं की खरीद की जाएगी। यही आदेश राज्यों द्वारा चलाई जा रही ईएसआई संस्थानों पर भी लागू होगा। उच्च स्तरीय बैठक में मौजूद अधिकारियों और मज़दूरों के हक बेचने वाले ग़द्दार मज़दूर नेताओं को बढ़ता खर्च तो समझ आ गया लेकिन ये समझ नहीं आया कि डिस्काउंट पर साधारण दवाएं नहीं बल्कि अधिकतर सुपरेस्पेशलिटी दवाएं ही खरीदी जाती हैं। कैंसर, बोन मैरो ट्रांसप्लांट, किडनी ट्रांसप्लांट, रेटिना ट्रांसप्लांट, हृदयरोग में इस्तेमाल होने वाली दवाएं और चिकित्सा उपकरण न तो साधारण होते हैं और न ही इनका रोजाना इस्तेमाल होता है। मज़दूरों की गाढ़ी कमाई के लगभग 1 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपयों पर कुंडली मारे बैठे ईएसआई कॉर्पोरेशन के अधिकारी खुद तो समय पर दवाएं उपलब्ध करा नहीं पाते, इंडेंट भेजे जाने के बावजूद दवाएं महीनों आती ही नहीं हैं।

डिस्काउंट वाले स्थानीय दुकानदार डिमांड किए जाने पर तुरंत ही दवा या चिकित्सा उपकरण उपलब्ध करा देते हैं। यह व्यवस्था इतनी पारदर्शी होती है कि स्थानीय आपूर्तिकर्ता से पहले ही तय कर लिया जाता है कि वह दवाओं के दाम में कितनी छूट देगा। कैंसर या इसी तरह की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बीमार को तुरंत दवा उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय केमिस्ट को ऑर्डर दिया जाता है और मरीज को जरूरी दवाएं उपलब्ध हो जाती हैं।

पीएमबीआई के जरिए दवा मंगाना होगा तो पहले उसके पोर्टल पर ऑनलाइन ऑर्डर किया जाएगा, वहां से ऑर्डर संबंधित राज्य के पीएमबीआई दफ्तर को फारवर्ड किया जाएगा, उसके बाद वहां से स्थानीय स्तर के चैनल पार्टनर तक पहुंचेगा। इस पूरी प्रक्रिया में जितना समय बर्बाद होगा उससे कहीं कम समय में स्थानीय स्तर पर डिस्काउंट पर दवा मंगा कर मरीज को उपलब्ध भी करा दी जाती है। यही नहीं यदि कोई दवा प्रधानमंत्री जन औषधि में उपलब्ध नहीं है तो उसे स्थानीय स्तर पर खरीदने से पहले पीएमबीआई से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेनी होगी। लगता है कि उच्च स्तरीय कमेटी के पदाधिकारियों जिसमें मज़दूरों के तथाकथित नुमाइंदे जो कि बिक चुके हैं, का मकसद सुपरस्पेशलिटी के मरीजों को इलाज दिलाने के बजाय उन्हें टरकाने और बिना दवाओं के तिल-तिल मरने को मजबूर करना ही है। ये बेशर्म पदाधिकारी मज़दूरों का ही पैसा उनके इलाज पर खर्च करने में भी कंजूसी कर रहे हैं, मज़दूर मरता रहे उनकी बला से, उन्हें तो बस कॉर्पोेशन का खजाना भरते हुए देखना है।

सुधी पाठक ये भी जान लें कि आईएमए जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगा चुकी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने अगस्त 2023 में जब सभी चिकित्सकों को जेनरिक दवाएं ही लिखने की अधिसूचना जारी की थी तो आईएमए ने इसका कड़ा विरोध किया था। आईएमए पदाधिकारियों ने तो यहां तक कह दिया था कि जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं है, और अगर सरकार यही दवाएं लिखवाना चाहती है तो मरीज पर असर न होने पर इसकी जिम्मेदारी भी सरकार ले। आईएमए की बातों में सच्चाई भी सामने आई थी जब फरवरी 2024 में केंद्रीय दवा मानक संगठन ने 1008 दवाओं की जांच की थी, इनमें से 78 दवाएं घटिया पाई गई थीं। इनमें प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना को जेनरिक दवाएं आपूर्ति करने वाली कंपनी हेल्थ बायोटेक, जी लैबोरेट्री और ओरिसन फार्मा की दवाएं भी शामिल थीं।
मज़दूरों के अधिकारों का झंडा उठाने वाले तथाकथित मज़दूर नेताओं को सस्ती के नाम पर मज़दूरों को घटिया दवाएं देने के ईएसआई कॉर्पोेरशन के हरामखोर अधिकारियों के साथ मिलकर मज़दूरों के साथ नमकहरामी तो नहीं करनी चाहिए थी। भारतीय मज़दूर संघ के रवींद्र हिमटे से तो अपेक्षा भी नहीं है, क्योंकि वह भाजपा का ही संगठन है। सीटू के प्रसांत नंदी चौधरी और सेल्फ इंप्लाइड विमेन एसोसिएशन (सेवा) की मनाली शाह के मुंह में क्यों दही जमी थी। इन्हें तो स्टैंडिंग कमेटी में इस मज़दूर विरोधी प्रस्ताव का विरोध करना चाहिए था।

इन्हीं मज़दूरों ने आप लोगों को अपना नुमाइंदा बना कर इस पद पर बैठाया है और आप मज़दूरों के रहबर होने के बजाय सत्ता की चाटुकारिता करने के लिए उनके साथ रहजनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। आपको तो बैठक में जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता से लेकर अस्पतालों में दवा-स्टाफ की कमी, अस्पतालों में लगातार घटती जा रही स्वास्थ्य सेवाओं पर कॉर्पोरेशन के उच्च अधिकारियों की बखिया उधेडऩी चाहिए थी और मज़दूरों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की जंग लडऩी चाहिए थी। इसके विपरीत अधिकारियों के तलवे चाटने में जुटे हैं। आप भी थोड़े से फायदे के लिए बिक गए और करोड़ों मज़दूरों को बेहतर उपचार-दवा के हक से महरूम कर दिया गया।

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Mazdoor Morcha
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