फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) यहां के सरकारी पर्यटन स्थल सूरजकुंड पर चल रही 32वीं उत्तर क्षेत्रीय राज्य परिषद की अध्यक्षता करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री अमितशाह ने घोषित किया कि दिल्ली ब्लास्ट के दोषियों को पाताल की गहराई से ढूंढ-ढूंढ कर निकाला जाएगा और उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। विदित है कि 22 अप्रैल को पहलगाम में 26 निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले हत्यारों को चुन-चुन कर, पाताल से भी खोज कर ऐसी इब्रतनाक सजा देने की घोषणा, इन्हीं अमितशाह व प्रधानमंत्री मोदी ने की थी कि दुनियां याद रखेगी। हुआ क्या?
हुआ यह कि ऑपरेशन सिंदूर नामक ऐसा नाटक खेला गया जो न केवल हास्यास्पद बल्कि शर्मनाक भी सिद्ध हुआ। जिस पाकिस्तान को दही समझकर खाने गए थे वह कपास साबित हुआ। अपने कई लड़ाकू विमान खोने के साथ-साथ अनेकों सैनिकोंं व नागरिकों को भी इस ऑपरेशन की भेंट चढ़ा दिया गया। इसके बावजूद स्वयं अपनी पीठ थपथपाते हुए, अंधभक्तों को बहकाने के लिए कहते रहे कि घर में घुसकर आतंकवादियों को मार गिराया। वास्तव में पूर्व सूचना मिल जाने के चलते सभी आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों पर चले गए थे। मोदी-शाह इस हकीकत को भली-भांति समझते थे। इसलिए लोकसभा अधिवेशन के दौरान जब ये मामला उठाया गया तो अमितशाह ने अपना जवाब देने से एक दिन पूर्व कश्मीर में, सुरक्षा-बलों द्वारा किन्हीं तीन लोगों के मारे जाने को पहलगाम-कांड के दोषी बता कर अपनी पीठ थपथपाने का जो प्रयास किया था, उससे उनकी स्थिति और भी हास्यास्पद हो गई थी। वास्तव में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक दिन पहले दिए अपने बयान में उन्हें पहलगाम दोषी नहीं माना था।
विदित है कि अमितशाह ने पहलगाम कांड की जांच जिस एनआईए को सौंपी थी, उसने जांच के नाम पर पूरे क्षेत्र में दमन एवं उत्पीडऩ का ऐसा नंगा नाच किया कि स्थानीय लोग त्राहि-त्राहि कर उठे। अनेकों स्थानीय लोगों के घर तोड़ दिए गए। बड़े पैमाने पर बेगूनाहों की गिरफ्तारियां की गई। सर्वविदित है कि पहलमाम का वह घटनास्थल स्थानीय निवासियों की रोजी-रोटी का एक बड़ा साधन था। वहां के ऐसे ही एक निवासी ने हत्यारों का विरोध करते हुए अपनी जान दे दी थी। लेकिन भाजपा सरकार को इससे क्या लेना-देना, उसे तो मुसलमानों पर अत्याचार करने का कोई न कोई बहाना चाहिए था जो आतंकवादी दे गए थे। ऐसा मानने वालों की भी कोई कमी नहीं जो इस जघन्य वारदात के लिए सीधे तौर पर अमितशाह को ही दोषी ठहराते हैं क्योंकि कश्मीर की पूरी सुरक्षा व्यवस्था सीधे उनके हाथ में है। लोग सवाल उठाते हैं कि जहां सैंकड़ों-हजारों पर्यटक प्रतिदिन आते हों, वहां सुरक्षा के नाम पर एक सिपाही का भी न होने का मतलब क्या है? वारदात से मात्र सप्ताह पूर्व ही खुद अमितशाह कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने आए थे। इसके बावजूद वारदात से तीन दिन पूर्व होने वाली मोदी की कश्मीर यात्रा को रद्द कर दिया गया था। इन्हीं बातों के चलते लोग इस वारदात को सत्ता-रचित षड्यंत्र मानते हैं तो क्या गलत है?
पहलगाम की उक्त वारदात के अलावा 2018 में पुलवामा कांड के दोषियों का पता आज तक भी मोदी सरकार नहीं बता पाई। जिस ढंग से मोदी ने, 2019 के लोकसभा चुनाव में पुलवामा के 44 शहीदों के नाम पर वोट मांगे थे उससे, यदि लोग यह अनुमान लगाएं कि यह वारदात भी सत्ता द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र ही था तो क्या गतल है? यूं भी मोदी-शाह इस तरह के षड्यंत्रों के पुराने एवं मंझे हुए खिलाड़ी समझे जाते हैं।
उक्त तथ्यों की रोशनी में बखूबी समझा जा सकता है कि दिल्ली ब्लास्ट के बहाने मोदी सरकार केवल और केवल हिन्दू-मुस्लिम राजनीति का खेल खेलना चाहती है बल्कि खेल भी रही है। ब्लास्ट का पहला दोषी डॉक्टर उमर तो खुद ही ब्लास्ट में मारा जा चुका है। उससे जुड़े होने के शक में दर्जनों डॉक्टरों व अन्य लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। अनेकों लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ करने के बाद छोड़ा भी जा चुका है। कश्मीर के पुलवामा में, बदले की भावना से अनेकों स्थानीय लोगों के घरों को सरकार ने ब्लास्ट करा कर उड़ा भी दिया है। अब सवाल यह पैदा होता है कि अमित शाह कौन से पाताल में से किसको ढूंढ कर लाना चाहते हैं? उत्तर बड़ा स्पष्ट है, वे उक्त ब्लास्ट के बहाने अपनी चिर परिचित हिन्दू-मुस्लिम राजनीति को यथा-सम्भव आगे बढ़ाना चाहते हैं। इन लोगों के पास साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के अलावा और कोई एजेंडा तो है नहीं, इसलिए साम्प्रदायिक जहर फैलाने के किसी भी मौके का भरपूर इस्तेमताल करने से ये लोग चूकना नहीं चाहते। अब इनका निशाना पूरी अल्फलाह यूनिवर्सिटी को लूटने तथा बर्बाद करने पर है।