मज़दूर मोर्चा ब्यूरो हरियाणा की जिस भाजपा सरकार ने दस वर्षों तक जनता को लूटा, बड़े-बड़े घोटाले किये, झूठे आश्वासन दिये जनता को कभी परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) और कभी आईडी के नाम पर लाइनों लगाकर लूटा, किसानों को बॉर्डरों पर बिठा कर रखा उसी भाजपा को जनता ने पुन: पांच साल के लिये अपनी लूटपाट करने के लिये परमिट दे दिया है। जनता शायद भूल गई कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नाहर सिंह स्टेडियम का सत्यानाश करने पर गुजराती फर्म को 200 करोड़, प्रॉपर्टी आईडी बनाने के नाम पर जयपुर की याशी कम्पनी को 57 करोड़ रुपये देकर जनता को किस तरह रुलाया गया था। जिस हरियाणा के, फौज में दस प्रतिशत जवान भर्ती हुआ करते थे उनकी जगह चंद अग्निवीर भर्ती करने शुरू कर दिये। हरियाणा की जनता अपनी उन पहलवान महिलाओं का अपमान भी भूल गई जो देश के लिये मेडल लाया करती थी।
जनता ने भ्रष्टाचारी धनेश को सिर पर बैठाया फरीदाबाद के बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में तो कमाल ही हो गया। यहां के मतदाताओं ने उस घोषित घपलेबाज़ एवं मोटी रिश्वतखोर धनेश अदलखा को अपना प्रतिनिधि चुन कर तो यह सिद्ध कर दिया कि उन्हें न तो उफनते सीवरों से कोई तकलीफ है और न ही चार बूंद बरसने से टूटी-फूटी सड़कों पर होने वाली कीचड़ से। यूं तो सारे शहर में ही जलभराव व सीवर का संकट स्थायी तौर पर रहता है, परन्तु बडख़ल क्षेत्र में यह समस्या अत्यंत गंभीर रही है। जिस अधलखा को विधायक चुना गया है वे बीती टर्म में नगर निगम की वित्तीय कमेटी के चेयरमैन थे। इस पद का दुरुपयोग करके जितना अधिकतम घपला-घोटाला कोई कर सकता था तो वह अधलखा ने करके दिखाया। इसी के परिणामस्वरूप शहर के तमाम नागरिकों ने इसे भुगता है।
बतौर चेयरमैन फार्मेसी परिषद उन्होंने किसी भी फार्मासिस्ट को बिना मोटी रिश्वत के कोई लाइसेंस जारी नहीं होने दिया। इसी घपले-घोटाले में इन पर बाकायदा आपराधिक मुकदमा तक भी दर्ज हो गया था। लेकिन तत्कालीन सीएम खट्टर ने इन्हें जैसे-तैसे अपनी मातहत पुलिस से बचा लिया और जब-तक भाजपा सरकार रहेगी ये जनाब न केवल इस एफआईआर से बचे रहेंगे बल्कि और भी खुल कर लूट-खसोट का धंधा चलाएंगे।
चुनावी संघर्ष के दौरान जिस भाजपा के मुंह में झाग आऐ हुए थे, किसी को 10-20 सीट मिलने तक की आशा नहीं थी, जिस मोदी की जनसभा में कभी लाखों की भीड़ उमड़ती थी और वे प्रदेश में रैली पर रैली करते चले जाते थे, इस बार उनकी जनसभाओं में जनों को भाड़े पर ढो-ढो कर लाये जाने के बावजूद किसी भी रैली में संख्या 15 हज़ार से ऊपर न हो सकी, थानेसर में तो मात्र 3000 जने ही लाये जा सके थे।
जिस खट्टर ने साढ़े नौ साल तक हरियाणा को लूटा-खसोटा, जनता को एक के बाद दूसरी लाइन में लगाता चला गया। हर जि़ले में मेडिकल कॉलेज खोलने वाला खट्टर एक भी मेडिकल कॉलेज खोल न पाया। एक मेडिकल कॉलेज छांयसा में जो इनके गले पड़ गया उसकी दुर्दशा देखने लायक है। इतना ही नहीं राज्य के चार अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों की हालत भी बद से बदतर होती चली गई है। हां, इनमें पढऩे वाले छात्रों की फीस 80 हजार प्रति वर्ष से बढ़ाकर आठ लाख जरूर कर दी गई है। खट्टर की ऐसी ही काली करतूतों के चलते भाजपा में चुनाव के दौरान इन्हें किसी मंच पर लाना तो दूर इनका चित्र तक भी कहीं नहीं लगने दिया।
दस साल में सिर्फ घोषणाएं ही हुुईं, काम नहीं घोषणावीर की भूमिका निभाते हुए बल्लबगढ़ से पलवल तथा गुडग़ांव तक मेट्रो रेल चलाने की घोषणा यह सरकार बीते छ:साल से करती आ रही है। बीते दस साल में एक मंझावली पुल तो बना नहीं, दूसरे पुल यानी एफएनजी (फरीदाबाद-नोएडा-गाजियाबाद) का ढोल भी बीते तीन साल से पीटा जा रहा है। स्कूलों और अस्पतालों की बात तो छोड़ ही दीजिए। स्वास्थ सेवा के नाम पर आयुष्मान व चिरायु जैसी लुभावनी योजनाओं की हकीकत भी जनता ने खूब अच्छी तरह से भुगत ली है। बिना खर्ची-पर्ची की बात करने वाली खट्टर सरकार के राज में बिना रिश्वत किसी भी दफ्तर में कोई काम सम्भव नहीं हुआ बल्कि रिश्वत के रेट न केवल कई गुणा तक बढ़ गए थे बल्कि रिश्वतखोरी के अवसर भी अत्यधिक बढ़ा दिये गये।
धोखाधड़ी से हासिल की जीत सवाल यह पैदा होता है कि हरियाणा की जनता ने भाजपा सरकार की उक्त तथाकथित उपलब्धियों से खुश होकर भाजपा को पुन: अपने सिर पर दनदनाने के लिए चुना है? जो भाजपा पिछली बार मात्र 40 सीट जीती थी उसे जनता ने इस बार 47 सीट दे दीं और जिस जेजेपी के 10 विधायकों के सहयोग से खट्टर ने लूट का बाजार चलाया था उन्हें एक भी सीट नहीं मिल पाई। सीट मिलना तो दूर उनके किसी उम्मीदवार की जमानत तक नहीं बच पाई। ताज्जुब की बात तो यह है कि जिस भाजपा के नेता जनविरोध के चलते गांवों तक में घुस नहीं पाते थे वे आज सात सीटों की बढ़त लेकर गदगद हो रहे हैं। ऐसा कहीं से प्रतीत नहीं होता कि जनता ने वास्तव में ही इन्हें पुन: सरकार चलाने का जिम्मा सौंपा हो।
भाजपा की यह जीत विशुद्ध धोखाधड़ी एवं विभिन्न चालबाजियों का परिणाम है। मोदी द्वारा चुनावी धोखाधड़ी करने की नीयत उसी दिन स्पष्ट हो गई थी जब उन्होंने सुप्रीमकोर्ट के आदेश को ठुकराते हुए अपनी मन-मर्जी का चुनाव आयोग गठित करने का फैसला सुना दिया था। जाहिर है किसी निष्पक्ष चुनाव आयोग के होते उनकी कोई भी चुनावी धोखाधड़ी एवं चालबाज़ी चल नहीं सकती थी। यही सब चुनाव आयोग आज साबित कर चुका है।
भाजपा ने ही सबसे पहले किया था ईवीएम का विरोध जिस ईवीएम के विरुद्ध भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की आंखों के आंसू बह-बह कर सूख गए, उसी ईवीएम की ‘गुणवत्ताÓ को मोदी ने पहचान लिया और उसका जमकर लाभ उठा रहे हैं। संदर्भवश भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हाराव द्वारा ईवीएम पर लिखी किताब ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट ऑर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन?Ó की भूमिका स्वयं आडवाणी ने लिखी थी।
हरियाणा चुनाव में भाजपा को ईवीएम का लाभ उस समय स्पष्ट नज़र आने लगा जब पोस्टल बैलट की गिनती में कांग्रेस 74 व भाजपा 10 सीटों पर आगे चल रही थी और ईवीएम खुलने के बाद बाजी पलटने लगी। समझा जा सकता है कि डाक द्वारा मतदान करने वाला कहीं दूर-दराज बैठा मतदाता अवश्य ही अपने परिवार एवं मित्रों आदि से पर्याप्त जानकारी हासिल करने के बाद ही मतदान करता है। इस तरह के मत हांडी में पक रहे चावलों में से उठाये गये एक दाने के समान होते हैंं, जिन्हें देख कर समझा जा सकता है कि बाकी चावल कैसे होंगे।
इसके बाद चुनाव आयोग हेराफेरी करके पहले उन बूथों की गिनती शुरू करवाता है जहां भाजपा की स्थिति अच्छी होती है। इससे भाजपा की बढ़त का एक रुझान कायम कर दिया जाता है। उसके बाद मतगणना को या तो रोक दिया जाता है या धीमा कर दिया जाता है। तमाम गोदी मीडिया को कोई भी खबर प्रकाशित करने से यह कह कर रोक दिया जाता है कि केवल चुनाव आयोग की वेबसाइट से ही उठा कर खबरें प्रकाशित की जाऐं। यह एक प्रकार से ब्लैकआउट करके विपक्ष पर मानसिक दबाव बनाने का प्रयास होता है। इसी दबाव में आकर विपक्षी उम्मीदवार तथा उनके एजेंट का हौसला टूटने लगता है और रात होते तक विपक्ष के पंजे उखड़ जाते हैं।
आयोग का एक और हथकंडा यह होता है कि आदमपुर से 1428 वोटों से हारने वाले भव्य विश्नोई को हारा बता कर कांग्रेसी उम्मीदवार चन्द्र प्रकाश को प्रमाणपत्र जारी करने के बजाय दोबारा व तिबारा मतगणना शुरू कर दी जाती है। इसी बीच यदि कांग्रेसी नेतृत्व आयोग पर लठ्ठ न तान देता तो चन्द्र प्रकाश को कभी भी प्रमाणपत्र नहीं मिलता। इसी तरह की चालबाजी आयोग हर सम्भव स्थान पर करता आ रहा है। इसके विपरीत यदि कांग्रेस वाला पुन: गणना की मांग करे तो उसे ठुकरा कर तुरन्त भाजपा वाले को जीत का प्रमाणपत्र दे दिया जाता है।
भाजपा ने कांग्रेस के वोट बांटने के लिए छोटे दलों को दी मदद भाजपा ने इस चुनाव में अपने अकूत धन के बल पर लगभग हर सीट पर अनेकों छोटे-मोटे दलों व निर्दलीयों को चुनाव में उतार दिया ताकि भाजपा की कांग्रेस से सीधी टक्कर न हो। इसी रणनीति के तहत बसपा, जजपा, इनेलो, आजाद समाज पार्टी आदि को खड़ा कर दिया। जगजाहिर है कि इन सब दलों को बोरे भर-भर रुपये भाजपा ने दिए। ये लोग न केवल वोट काटते हैं बल्कि मतगणना के समय अपने एजेंट भी मतगणना केन्द्रों में बैठाते हैं। यहां एक बड़ा खेल यह भी होता है कि भाजपा के इशारों पर नाचने वाले इन उम्मीदवारों का लक्ष्य खुद जीतना न होकर भाजपा को जिताना होता है; इसके लिये कांग्रेसी एजेंट की आंख बचाकर इन भाजपा उम्मीदवार के खाते में चुपके से डाल दिया जाता है।
कांग्रेसी उम्मीदवार, ईवीएम से निकलने वाले केवल अपने मतों पर ही ध्यान देता है और थोड़ी बहुत हल्की-फुल्की नज़र भाजपा वाले पर भी रखता है। लेकिन अन्य निर्दलीयों आदि के वोटों में उसकी कोई रुचि नहीं होती। उसे इस बात का पता ही नहीं चलता कि किसी निर्दलीय को मिले 1500 वोट एकदम घट कर कैसे 500 हो गए। जाहिर है ये एक हजार वोट चुपके से भाजपा में शिफ्ट कर दिये जाते हैं। आज तक किसी को यह समझ नहीं आया कि मत तो पड़े 80 और वे अपने आप बढ़कर 85 कैसे हो जाते हैं? जी हां, लोकसभा चुनाव 2024 में तीन-तीन दिन, छ:-छ: दिन, 11-11 दिन बाद आयोग द्वारा घोषित आंकड़े कुछ ऐसी ही उलटबांसी बयान करते हैं। कुल पड़े मतों में करोड़ों की वृद्धि कैसे हो गई, इसका जवाब आज तक चुनाव आयोग नहीं दे पाया है। न्यायपालिका ने भी इस पर चुप्पी साध रखी है। यही खेल अब हरियाणा चुनाव में भी हो चुका है। पानीपत के कांग्रेसी एजेंट ने तो उन ईवीएम मशीनों को पकड़ कर कमाल ही कर दिया जिनकी बैट्री 99 प्रतिशत थी। हैरानी होना स्वाभाविक थी कि प्रात: सात बजे से सायं 6-7 बजे तक मतदान कराने वाली ईवीएम की बैट्री 99 प्रतिशत कैसे बची रह गई? प्रत्येक सामान्य नागरिक जानता है कि प्रत्येक सुबह अपना मोबाइल चार्ज करने के बाद शाम तक उसमें कितनी बैट्री बचती है। ऐसे में 12 घंटे लगातार चल चुकने के बाद ईवीएम में 99 प्रतिशत बैट्री होने का सीधा सा मतलब बड़ी हेराफेरी है। उस कांग्रेसी एजेंट का यह भी कहना है कि 99 प्रतिशत बैट्री वाली मशीनों में 70-80 प्रतिशत मत भाजपा के पाए गए।
कांग्रेस ने कद्दू किया! उपरोक्त बताई गई तमाम बातों में से कोई भी बात ऐसी नहीं है जो सार्वजनिक न होकर गुप्त रखी गई हो। इसके बावजूद इन सबसे निपटने के लिए कांग्रेस ने आज तक क्या किया? जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठुकरा कर मोदी ने मनचाहा चुनाव आयोग गठित करने का निर्णय लिया तो इसे सिर झुकाकर स्वीकार करने के बजाय पूरा विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन विरोध में क्यों नहीं उतरा? विरोध के नाम पर विपक्ष ने नामचारे को एक पत्र चुनाव आयोग को लिख दिया और मिलने के लिये समय मांगा जो आयोग ने इन्हें कभी नहीं दिया। उसके बाद ये लोग झाग की तरह बैठ गए।
ईवीएम के विरोध में कुछ वकीलों के नेतृत्व में जनता भले ही सड़कों पर लड़ती रही लेकिन इंडिया गठबंधन मुंह में दही जमाए बैठा रहा। लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद राहुल ने ईवीएम के मसले को पूरे जोर-शोर से क्यों नहीं उठाया? बेशक अखिलेश यादव ने खुले तौर पर कहा कि यदि यूपी की 80 में से 80 सीटें भी वे जीत जाएं तो भी वे ईवीएम के पक्षधर कभी नहीं हो सकते।
हरियाणा कांग्रेस को जब पता था कि चुनाव आयोग बेईमान है और एक वफादार सेवक की भांति भाजपा के लिए कुछ भी कर गुजरने में कोई कोताही नहीं करेगा तो इससे निपटने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए? कोई कदम उठाने की बजाय अंदरूनी गुटबाजी और सत्ता की अधिकतम मलाई झपटने की जुगत में एक दूसरे से भिड़ते रहे। जी हां, सीएम पद की लड़ाई कोई जनता के भले के लिए नहीं लड़ी जा रही थी बल्कि इस पद पर बैठ कर मोटी लूट कमाई करने का इरादा सभी नेताओं ने पाल रखा था। सत्तारूढ़ भाजपा के विरोध में जनता के भरपूर आक्रोश एवं रैलियों में उमडऩे वाली भारी भीड़ को मतों में परिवर्तित न कर पाना कांग्रेस की सांगठनिक एवं रणनीतिक कमजोरी को प्रदर्शित करता है।
किसी से छिपा नहीं है कि बीते करीब 10 साल से कांग्रेस का संगठन केवल राज्य स्तर पर और वह भी केवल नामचारे को है। जिला एवं उससे निचले स्तर पर कोई संगठन मौजूद नहीं है। इसी के चलते इनके पास न तो कुशल एवं प्रशिक्षित कार्यकर्ता हैं और न ही बूथ प्रबन्धन का कोई इंतजाम। शायद ही किसी कार्यकर्ता एवं एजेंट को पोलिंग व मतगणणा के समय अपने कत्र्तव्यों एवं अधिकारों का ज्ञान हो। अधिकारों का हनन होने पर उसे क्या करना चाहिए शायद ही कोई जानता हो? यदि एजेंट जागरूक हों तो वे पोलिंग के तुरंत बाद डाले गए मतों की संख्या मशीन से उठाकर फार्म सी 17 में दर्ज करा कर उसकी प्रति हासिल करे। इसके साथ-साथ यह भी नोट करे कि मशीन में बैट्री कितनी बची है तथा मशीन पर अंकित कोई नम्बर अथवा पहचान आदि हो उसे भी रेकॉर्ड में लाए। एजेंट को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि उसके हस्ताक्षरों के बगैर मतदान केन्द्र अधिकारी मशीन को सील नहीं कर सकता। पार्टी मुख्यालय का कत्र्तव्य है कि वह तमाम मतदान केन्द्रों से फार्म सी 17 एकत्र करके पूरे मतदान का डाटा तुरन्त प्रकाशित कर दे। इतना करने भर से बेईमान चुनाव आयोग के वे हाथ कट जाते हैं जो मतदान को अपनी मर्जी से घटा-बढ़ा देते हैं। ऐसा काम बीते लोकसभा चुनाव में तामिलनाडू वालों ने करके दिखाया था।
कांग्रेस द्वारा टिकट वितरण, कुछ लोगों के मुताबिक टिकट बेचने में हुई अनेकों धांधलियां भी कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव (सांगठनिक) केरल से आने वाले केसी वेणूगोपाल से पूछे कि क्या उन्होंने कभी बल्लबगढ़ देखा है? उन्होंने किस आधार पर शारदा राठौर की बजाय पराग शर्मा को टिकट दिया था? विदित है कि चौथे नम्बर पर रहने वाली पराग शर्मा को मात्र आठ हजार वोट मिले और शारदा राठौर दूसरे नम्बर पर रह कर 18000 वोटों से हारी। दूसरा सवाल राबर्ट वाड्रा पर बनता है कि उन्होंने किस आधार पर ललित नागर का टिकट कटवा कर तिगांव से रोहित नागर को टिकट दिलाया? विदित है कि रोहित नागर 21,656 वोट लेकर तीसरे नम्बर पर रहा और ललित नागर 56,828 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहा। लगभग यही स्थिति अम्बाला कैंट में हुई। वहां शैलजा ने चित्रा का टिकट कटवा कर परविंदर पाल को दिलवाया जो 14,469 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहा। जबकि चित्रा 52,581 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही। चर्चा यह भी है कि शैलजा ने अनिल विज को करारी हार से बचाने के लिए यह खेल खेला था। इस तरह की करीब 10 सीटें कांग्रेस ने गंवाई है।
भाजपा जिस तरह से लोकतंत्र की हत्या कर रही है वह हिटलर द्वारा अपनाए जा चुके तथा पुतिन व नॉर्थ कोरिया के किम जोंग उन द्वारा अपनाए जा रहे तरीकों की ओर इशारा करता है, विदित है कि हिटलर की तरह ही ये दोनों तानाशाह भी चुनावी नाटक के द्वारा जनता के वोट लेकर ही शासन करते आ रहे हैं। यदि समय रहते इसे न निपटा गया तो स्थिति काबू से बाहर होनी निश्चित है।
कुल मिलाकर हरियाणा की जो जनता भाजपा के जुए से मुक्त होकर कुछ मुक्ति प्राप्त करने के सपने संजोए बैठी थी उन्हें ध्वस्त करने में जहां भाजपा ने साम, दाम, दण्ड, भेद का इस्तेमाल पूरी बेशर्मी व चालाकी के साथ किया है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस नें भी, उनकी कुटिलता से निपटने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए था उसे न करके, जनता के साथ एक बड़ा विश्वासघात किया है। कांग्रेसी नेताओं ने जिस तरह से मोदी की इच्छानुसार जाट बनाम अन्य होने दिया वह भी भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण है।