मजदूर मोर्चा ब्यूरो ‘राम निवास बनाम मारुति सुजुकी इंडिया लि, मुक़दमा न 208 दिनांक 08.09.2016’ पर गुडग़ांव की कुमुद गुगनानी की अदालत ने 7 नवंबर 2025 को अपना फ़ैसला सुना दिया है. अदालती फ़ैसले के आखरी दो पैराग्राफ पढ़ लें, तो पूरे 68 पृष्ठ पढऩे की ज़रूरत नहीं; इस न्यायालय की ओर से इस बात पर यह ध्यान दिए बिना निर्णय देना लापरवाही होगी कि आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा की दुनिया में, राष्ट्र निर्माण, प्रत्येक भारतीय का सबसे पवित्र कर्तव्य है. इतिहास, इस सबसे ज्वलंत तथ्य का गवाह है कि केवल वही अर्थव्यवस्थाएँ बची रहीं और फली-फूली हैं, जहाँ मज़दूर अनुशासन में रहे. यदि भारत को, मौजूदा वक्त की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है, तो उसे अपने श्रमिकों में कठोर अनुशासन लाना होगा. न्याय प्रदान करने वाले विभाग से कम से कम यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह गलत काम करने वाले कर्मचारी के प्रति सहानुभूति और करुणा दिखाने की बार-बार दोहराई जाने वाली भावनाओं के आगे न झुके और मज़दूर हित के कानून की आड़ में और अधिक अनुशासनहीनता को बढ़ावा न दे.
जहाँ तक मज़दूर के रोजग़ार का सवाल है, यह रिकॉर्ड में दर्ज है कि उसने कहीं भी मज़दूरी के लिए आवेदन नहीं किया, फिर भी वह निश्चित रूप से अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कमाई कर रहा है. उसने यह भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि उसकी पत्नी, गाँव में एक किराने की दुकान चलाती है, जिसकी देखभाल भी वह खुद करता है. इसका मतलब हुआ कि बर्खास्तगी के बाद से वह निश्चित रूप से अपना गुजारा कर रहा है. इसलिए, मज़दूर की सेवा से बर्खास्तगी को गलत या अवैध नहीं कहा जा सकता, अर्थात दोनों ही मुद्दों पर, तदनुसार, फ़ैसला मज़दूर के विरुद्ध दिया जाता है. अदालत के इस फैसले से स्वाभाविक रूप निकलने वाले निष्कर्ष इस तरह हैं. मालिक और मज़दूर के बीच होने वाले किसी भी विवाद पर अदालतों के फैसले अब, सबूतों, गवाहों, क़ानूनों, दस्तावेज़ों के आधार पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की क्या दशा है, प्रतिस्पर्धा किस स्तर की है, इससे तय होंगे. मज़दूरों को अनुशासन में रहना होगा और अनुशासन का मतलब है, मालिक जो कहे वही क़ानून है, उसे मानना मज़दूर का कर्तव्य है, मालिक जो दे, उसे, महरबानी समझकर रख लो, अगर मालिक आपको काम से निकाल दे, तो उसे श्रद्धापूर्वक नमन करो और घर निकल जाओ!! अदालतें, अब, मज़दूर अधिकारों, क़ानूनों से ‘गुमराह’ नहीं होगी!! पीडि़त मज़दूर को कोई राहत पहुँचाना, अनुशासनहीनता को बढ़ावा देना, अर्थात, उठती अर्थ व्यवस्था को नीचे खींचना है. सबसे ख़तरनाक निष्कर्ष तो यह निकलता है कि मालिक के विरुद्ध मुक़दमा दायर करने के 9 वर्ष बाद भी, मज़दूर और उसका परिवार अगर जिंदा है, तो इसका मतलब है कि ना उसे नोकरी की ज़रूरत है और ना किसी आर्थिक राहत की!!
अदालतें, हमेशा ही, फैसले के सारांश वाले अंतिम पैरा में यह लिखती हैं कि सबूतों, गवाहों के बयानों, उनके साथ जिऱह और दस्तावेज़ों के आधार पर यह फैसला बनता है. इस मामले में, अदालत अपना फैसला सबूतों, गवाहों के बयानों के आधार पर दे रही है, फैसले के 68 पृष्ठों में, औपचारिकतावश भी कहीं नहीं लिखा गया. इसका मतलब है कि मारुती मज़दूर, राम निवास पर लगे आरोप, सेवा से उनकी बरखास्तगी, न्याय की नैसर्गिक प्रक्रिया से सिद्ध नहीं हुए. राम निवास बेक़सूर हैं, क्योंकि गिरती-उठती अर्थव्यवस्था और प्रतिस्पर्धा गलाकाट है या कमरतोड़, इसके लिए एक मज़दूर को जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. साफ़ ज़ाहिर है, हमारे वर्ग विभाजित समाज में, अदालत ने यह फ़ैसला, शासक सरमाएदार वर्ग के हितों से प्रेरित होकर सुनाया है. यह एक राजनीतिक फ़ैसला है, घोर अन्यायपूर्ण है. क्या इस फैसले के विरुद्ध ऊँची अदालत में अपील करने से न्याय मिलने की उम्मीद की जा सकती है? नहीं, ऐसा भ्रम पालने का कोई आधार नहीं नजऱ आता. क्या इस फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायलय में अपील की जाए? हां, न्याय की उम्मीद ना होने के बावजूद भी, इस अन्यायपूर्ण फ़ैसले को उच्च अदालत में चुनौती दी जाए, जिससे साबित हो कि मज़दूर अभी भी न्यायप्रणाली का अपमान नहीं कर रहे, और अपील ना करने के फैसले को भी मज़दूरों के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल ना किया जा सके. आगे का रास्ता सभी क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों एवं देश के इंसाफ़ पसंद और मज़दूरों-मेहनतक़शों से थोड़ी भी प्रतिबद्धता, सहानुभूति रखने वाले अवाम को अदालत के इस फैसले को बहुत गंभीरता से पढऩा चाहिए. पूरी गंभीरता से नोट किया जाना चाहिए कि इस मामले में इंसाफ; जन आंदोलन, सड़क पर संघर्षों की ऊजऱ्ा से ही मिलेगा. अदालत ने, शासक वर्ग के हित के अनुरूप आचरण किया है, हम, मज़दूरों को अपने शोषित वर्गीय हित में आचरण करना है. हमारे वर्गीय हित का तक़ाज़ा है कि मारुती मज़दूरों की इन्साफ की इस लड़ाई में, पहले, दिल्ली-एनसीआर में सक्रिय क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों की एक ‘संयुक्त संचालन समिति (Joint SteeringCommittee JSC)’ गठित हो, जो यह ऐलान करे कि यह संघर्ष मज़दूरों को इंसाफ़ मिले बगैर नहीं रुकेगा. न्याय के इस संघर्ष को क्रमबद्ध ढंग से आगे बढ़ाया जाए.
दूसरे चरण में, ‘संयुक्त संचालन समिति’ का दायरा बढ़ाते हुए, शांतिपूर्ण, अनुशासित जन-आंदोलन का दायरा बढ़ाया जाए और देश भर के सभी क्रांतिकारी मज़दूर और किसान संगठनों को भी इसमें शामिल किया जाए. सभी ठेका मज़दूरों को भी इसमें शामिल किया जाए. अदालत का यह फ़ैसला, समूचे मेहनतक़श वर्ग के लिए एक चुनौती है, इसे स्वीकार किया जाए.