डॉ. रामवीर आजकल कुछ पढऩा या वीडियो आदि देखना शुरू करें तो अधिकतर की शुरुआत डिस्क्लेमर से होती है। डिस्क्लेमर का आजकल वही स्थान है जो पुराने काव्यों में मंगलाचरण का होता था, और यह अकारण नहीं है। बहुत से मामलों में विषयवस्तु पर उठा विवाद न्यायालयों तक गया और न्यायाधीश द्वारा लेखक को डिस्क्लेमर प्रकाशित करने के आदेश के साथ विवाद-समाप्ति की रस्म अदायगी सम्पन्न हुई। इस लेखक को शाप मिला हुआ है कि जो भी लिखता है पाठकों द्वारा गलत समझ लिया जाता है, इसलिए अनोटेटिव नोट देने की विवशता होती है। विवाद-समाप्ति की रस्म अदायगी इस लिए कहा कि आजकल न्याय मन्दिरों में भी मन्दिरों की तरह ही कर्मकाण्ड की प्रमुखता है। न्याय करना अनिवार्य नहीं है, न्यायप्रक्रिया की औपचारिक बारीकियों का पालन जरूरी है। वकीलों की भारी भरकम फीस इसी वाग्व्यभिचार के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार है। न्यायबुद्धि तो अनपढ़ में पढ़े लिखों से ज्यादा हो सकती है, अनपढ़ बस कुतर्कों की गेंद से लम्बे न्यायिक टैस्ट मैच खेलना नहीं जानता। अब तो न्यायमूर्तियों के निर्णय भी उस मन्त्री के निर्णय जैसे हो सकते हैं जिसने नागरिकों के प्रार्थनापत्र पर साइलैंसर लगा कर लाउडस्पीकर चलाने का नोट लिखा था। परीक्षा के दिनों में बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है इसलिए लाउडस्पीकर बन्द करवाने की प्रार्थना पर मन्त्री जी का उक्त आदेश था।
हां जी, तो डिस्क्लेमर यह है कि शीर्षक के चार शब्दों का बहादुर शाह जफर से कोई सम्बन्ध नहीं है। नाहक कोई संघी पड़ोसी नाराज हो जाए कि आजादी के अमृतकाल में मुगल का नाम लेकर अमंगल कर दिया। जफ़ऱ के शेर का मिसरा ‘लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में भिन्न कंटैक्स्ट में है। जीजी जीजा वाले जी का भी जिक्र नहीं है। बात उस जी की है जो हिन्दी भाषा का एक ऐसा एकाक्षरी शब्द है जिसे व्यक्ति के नाम में जोड दें तो वह सम्मानित अनुभव करता है। हरियाणवी लहजे में किसी के आगे जी लगाना ऐसा है जैसे दाल में घी घालना। बिना जी के नाम और बिना घी के दाल बेस्वाद लगती है। पहले से जुड़े आ रहे जी को हटाना तो ऐसा है जैसे रिश्ता करके तोडऩा। आधुनिक भारत के इतिहास में मोहनदास करमचंद गान्धी और जवाहरलाल नेहरू को गान्धी जी नेहरू जी नाम से लिखना बोलना सामान्य और स्वाभाविक रहा है। जब से मूढता से ओतप्रोत कंगना रानोत की 2014 वाली भारत की आजादी आई है संघी/भाजपाई पृष्ठभूमि के लोगों को उक्त महापुरुषों के नाम में जुडा जी भी अखरता है। कुछ पढ़ते हुए इन दो वाक्यों पर अटक गया – ‘पटेल जी संविधान सभा की मीटिंग छोड़कर बाहर चले गए थे, बाद में नेहरू के कहने पर पटेल जी वापस आ गए थे। कुछ स्थानों के नाम बदले जा सकते हैं, पहले भी बदले गए हैं पर भाषा का व्याकरण तक बदलने की खब्त जहनी बीमारी है। बच्चा जब इंग्लिश सीखना शुरू करता है तो सब से ज्यादा परेशान ‘दी से होता है – कहां लगाए कहां न लगाए। भाजपा वालों ने सीधा नियम बना दिया है – लगता नहीं है जी गान्धी नेहरू के आगे। सत्ता लोभ या ई डी के भय से भाजपा में नए भर्ती हुए घाघों को इस नियम का खास ध्यान रखना पडता है। प्रश्न है कि हटाए गए जी का क्या करते हैं ? उत्तर है कि अपने मनपसंद नामों में जोड़ देते हैं, जैसे ऊपर ‘पटेल जी में लिखा दिख रहा है। अब इन भाषायी नासमझों को कौन समझाए कि वल्लभभाई पटेल नाम से सरदार को हटा कर जी जोडना उनकी लौहपुरुष इमेज को घटाना है। सरदार कहते ही जो एक सुदृढ बलिष्ठ दुर्धर्ष व्यक्तित्व की छवि बनती है वह जी से डाइल्यूट ही होती है। गांधीजी नेहरूजी में एक तरह मृदुता, अडैप्टिबिलिटी थी। मोरारजी देसाई को अनुमान रहा होगा कि भविष्य में भाजपाई उन्हें जीवंचित कर सकते हैं इसलिए पहले ही बीच में फिक्स किया है, कर लो क्या करोगे ! और बंगालियों की तो पूछो ही मत – बनर्जी, चटर्जी, मुखर्जी में जी वैल्ड कर रखा है ! लगता नहीं है जी वाला नहीं यह हटता नहीं है जी वाला जी है।