फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) मज़दूरों से नियमित पैसा वसूलने वाला कॉर्पोरेशन, बीमार होने पर उन्हें इलाज के नाम पर परेशान करने के नए-नए तरीके निकालता रहता है। आठ अगस्त 2025 यानी जब से नए डीन डॉ. कालीदास ने यहां का कार्यभार सम्भाला है, मज़दूरों की परेशानियां लगातार बढ़ाई जा रही हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर तो भगाए सो भगाए, दवाईयों तक का भी अकाल पड़ा हुआ है। फार्मेसी काऊंटर से मिलने वाली अधिकांश दवाओं के बारे में ‘उपलब्ध नहीं है’ लिख दिया जाता है। गुप्त रूप से डॉक्टरों को भी हिदायत दी जाती है कि वे वही दवा लिखें जो स्टोर में उपलब्ध हों। यानी मकसद मरीज को ठीक करना न हो बल्कि उसे कोई भी उपलब्ध दवा देकर टरकाने का तरीका अपनाया जा रहा है।
कैंसर की दवाएं कुछ ज्यादा ही महंगी होने के चलते, इनका वितरण अस्पताल से पूरी तरह बंद करके डिस्पेंसरियों की ओर धकेला जाने लगा है। इसके विरोध में मज़दूर पक्ष ने बार-बार सुविधा समागम में आवाज उठाई है। लेकिन बजट घटाने के चक्कर में पड़े डीन महोदय इसको अनसुना करते रहे जो कि पूरी तरह से गैर कानूनी है। कैंसर एक सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट वाली बीमारी है जिसका पूरा इलाज कॉर्पोरेशन के अस्पतालों द्वारा किया जाना अनिवार्य है। अस्पताल यह इलाज या तो स्वयं करे अथवा अनुबंधित अस्पतालों को भेजकर कराएं। विदित है कि डॉ. कालिदासस के आने से पहले यहां नियमित रूप से बोन मैरो ट्रांसमिशन का काम होता रहा है, जो अब पूर्णतया बंद कर दिया गया है।
दवाओं को लेकर दिनांक 29 अक्टूबर को कॉर्पोरेशन मुख्यालय की ओर से पत्र क्रमांक नम्बर 11012/42/2025 जारी करके कॉर्पोरेशन के तमाम डीन व चिकित्सा अधीक्षकों को आदेश दिया गया है कि कोई भी अस्पताल मरीज को देखने के बाद उसे दवा लेने के लिए डिस्पेंसरी भेजने की बजाय खूद ही सारी दवाएं देगा। केन्द्रीय श्रममंत्री मांडविया की चाटुकारी करते हुए पत्र में कहा गया है कि मंत्री जी ने दिल्ली एनसीआर के कुछ ईएसआई अस्पतालों में पाया था कि मरीजों को डिस्पेंसरियों की ओर भेजा जा रहा है। सभी जानते हैं कि मंत्री को अस्पतालों में जाकर मज़दूरों की स्थिति देखने की कितनी फुर्सत है? वास्तव में मुख्यालय द्वारा यह कदम मज़दूरों के बढ़ते आक्रोश को देख कर ही उठाया गया है।
दरअसल यह सारा मामला अस्पताल के बढ़ते बजट को घटाने से सम्बन्धित है। दवाओं के दिन दूने बढ़ते दामों तथा स्टाफ के बढ़ते वेतन बिल से, कॉर्पोरेशन में बैठे कुछ जनविरोध लोगों के माथे में बल पड़ते जा रहे हैं। इसके चलते वे तमाम तरह की कटौतियां करके बजट को घटाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए जहां महंगे विशेषज्ञ डॉक्टरों को भगा दिया गया है वहीं स्टोर में न तो आरसी (रेट कॉन्ट्रेक्ट) की दवाएं पर्याप्त मात्राएं में आ रही हैं और न ही लोकल परचेज की जा रही है। लोकल परचेज के लिए स्टोर में फार्मासिस्टों द्वारा फाइल बनाई जाती है फिर उसे स्टोर इंचार्ज डॉक्टर के माध्यम से चौथी मंजिल पर बैठे छोटे व बड़े बाबू के पास भेजे जाने के बाद वित्तीय शाखा में भेजा जाता है। यहां का बाबू उस पर तब तक उंगली मारे बैठा रहता है जब तक कि मामला डीन तक न पहुंचे। डीन द्वारा अंतिम आदेश मिलने के बाद भी परचेज ऑर्डर तैयार किया जाता है। यह सारी कार्रवाई, डीन चाहे तो एक सप्ताह में भी हो सकती है और न चाहे तो कभी भी पूरी नहीं हो सकती। फिलहाल तीन-तीन महीने की फाइलें अटकी पड़ी हैं। इसके चलते सर्जीकल दस्ताने इन्जेक्शन की सीरिंज तथा डाइपर जैसे छोटे-बड़े अनेकों प्रकार की आवश्यक वस्तुओं का नितांत अभाव अस्पताल में चल रहा है। समझा जा रहा है कि डॉ. कालीदास मुख्यालय को यह बताना चाहते हैं कि वे उनसे भी कहीं ज्यादा कॉर्पोरेशन के वफादार हैं। अंग्रेजी में कहावत है ‘मोर लॉयल देन द किंग’।