डॉ. रामवीर
आधी तो लेने में बिताई औ फिर आधी देने में, हम ने सारी उमर लगा दी शिक्षा लेने देने में।
जितनी ली थी उसे बढ़ा कर दुगनी कर के लौटाई, शिक्षा की ऊसर भू पर भी फसल विद्या की उपजाई।
बदले में क्या मिला पूछने वाले भी मिलते हैं लोग, उन्हें बता दें हमे मिला है पारिश्रमिक आत्मसन्तोष।
और और की चूहा दौड़ में लगे हुए हैं जो दिन-रात, हो सकता है उन्हें न भाए आत्मतोष वाली यह बात।
जिन मित्रों ने राजनीति में घुस के बनाए आठ के साठ, उनकी और बात है उनकी भिन्न तराजू भिन्न हैं बाट।
शिक्षक ज्यादा नहीं चाहता उसकी तो इतनी सी चाह, जो जीवन में पिछड़ गए हैं उनको दिखला पाए राह।
शासन और प्रशासन करने वाले न हों लापरवाह, उचित समय पर उचित काम हो इस पर होवे उनकी निगाह।