क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा भारत-अमेरिका संबंधों का इतिहास नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा अक्टूबर 1949 में हुई. हेरी ट्रूमेन, नेहरू को अपने साथ बग्गी में बिठाकर एअरपोर्ट से वाइट हाउस तक लेकर आया. सड़क के दोनों ओर लोग तालियां बजा रहे थे. ऐसी ख़ातिरदारी, इसके पहले किसी तुर्रम खां को नसीब नहीं हुई थी. नेहरू ने अमेरिकी ख़ातिरदारी की दिल खोलकर तारीफ़ की, लेकिन भावविभोर होकर भी यह नहीं बोला कि हम सोवियत संघ से दूर और आपके नज़दीक आने को मचल रहे हैं!! नेहरू ने स्पष्ट कह दिया कि इंडिया, अमेरिकी ख़ेमे और रुसी ख़ेमे, दोनों से दूर रहेगा और गुटनिरपेक्ष समूह बनाएगा. मुगालते को उन्होंने कोई जगह नहीं छोड़ी.
1950 के दशक में भारत, तीसरे ख़ेमे के रूप में, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को खड़ा करने वाला प्रमुख राष्ट्र बना. दूसरी अमेरिकी यात्रा के रूप में,अमेरिकी राष्ट्रपति, आइजऩहावर, 09.12.1959 को दिल्ली पहुंचे. भारत ने भी ख़ातिरदारी में कोई कमी नहीं, लेकिन विदेश नीति में रत्तीभर बदल नहीं किया. इस बार, लेकिन, काइयां आइजऩहावर, भारत का एक नुकसान करने में क़ामयाब रहे. दुनिया भर में नेहरू की ‘स्टेट्समेन’ की छवि बनने और इसके फलस्वरूप नेहरू की बढ़ती महत्वाकांक्षा की कमज़ोरी को भांपते हुए, अमेरिकी डेलीगेशन उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाने में क़ामयाब रहा. चीन के साथ पंगा लेने की नेहरू की वाह्यात मूर्खता की नींव, आइजऩहावर की इसी यात्रा से पड़ी, जिसका अंजाम 1962 के भारत-चीन युद्ध के रूप में हुआ, जिसमें भारत को शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी.
इससे लेकिन, यह हक़ीक़त और गहरी स्याही में रेखांकित हुई कि 1960 के सबसे दर्दनाक दशक में भी, जब 1962 के चीन युद्ध के 3 साल बाद, 1965 में पाकिस्तान के साथ भी भयानक जंग हुई. उसके बाद, देश में, खाने के दानों के लाले भी पड़े. रूस ने भी मदद से हाथ खींच लिया, क्योंकि रूस के नकली कम्युनिस्ट भी, ख़ुद माओ को नाराज़ नहीं करना चाहते थे. इंडिया को अमेरिका से गेहूं की मदद मांगनी पड़ी. राष्ट्रपति केनेडी ने मदद की भी. इसके बावजूद भी, भारत ने, अमेरिकी खेमे में, उसका पिछलग्गू बन, देश के पूंजीपति वर्ग के हितों को चोट पहुँचाने की क़ीमत मंज़ूर नहीं की. 1960 के दशक में भारत सबसे कमज़ोर हालात में था. भयंकर कमज़ोरी की उस घड़ी में भी, अमेरिकी गुलामी मंज़ूर नहीं की. अमेरिका ने अनाज भेजा क्योंकि यहाँ रोटी के लाले पड़े हुए थे. इंडिया ने तहेदिल से धन्यवाद दिया, लेकिन उसका बगलबच्चा बनने से साफ़ इंकार कर दिया. नीतियों में दख़ल नहीं चलेगा, बड़े भाई साब!!
इंडिया की इलाकाई नंबरदार बनने की शुरुआत 1971 में हुई 1971 के ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम’ में इंडिया; कोई क्या कहेगा, इसकी परवाह ना करते हुए, पूरे साज़-ओ-सामान के साथ युद्ध में कूद गया, और अमेरिका को सीधी चुनौती पेश की. उस घटना से, इंडिया इलाकाई चौधरी बन गया, और उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा छलांगें मारने लगी. साम्राज्यवादी चौधरियों की चौधराहट का जो स्वाभाविक परिणाम होता है, ठीक वही हुआ. हर पड़ौसी देश में, भारत के कॉर्पोरेट की मुनाफ़े की भूख के चलते, उसके खि़लाफ़ तीव्र आक्रोश मौजूद है. उसी भारतीय साम्राज्यवादी शोषण की नीयत का दुष्परिणाम है कि जिस बांग्लादेश की मुक्ति की लड़ाई लड़ी,लाखों शरणार्थियों का जीवन बचाया, उसी बांग्लादेश के लोग आज भारत से नफऱत करते हैं.
1974 की 18 मई को इंडिया ने, इलाकाई नम्बरदारी का दावा पक्का करते हुए, दूसरा क़दम उठाया, जिससे अमेरिका का हलक ही सूख गया. अमेरिका नाम का स्वयंघोषित लठैत चाहता है, कि उसके पास तो सभी विनाशकारी हथियार हों, लेकिन बाक़ी किसी के पास उतने विनाशकारी हथियार, ख़ासतौर पर परमाणु हथियार ना हों. नम्बरदारी हथियारों के बगैर नहीं चलती!! इंडिया के सरमाएदारों की दुनिया के बाज़ार में हिस्सेदारी बढे, उसे दक्षिण एसिया का सिरमौर माना जाए, भारत की बात का वजऩ बढे, धाक जमे, मतलब भारतीय पूंजी की धाक बने, इसलिए, इंदिरा गाँधी ने, इस बात की चिंता ना करते हुए, कि अमेरिका क्या सोचेगा, पोखरण में परमाणु परिक्षण कर डाला. दुनिया में हल्ला मच गया, लेकिन धीरे-धीरे सब शांत हो गया. दुनिया के गिनती के देशों में भारत की उठा-बैठ, हुक्का-पानी शुरू हो गया. टाटा-अंबानी और बाद में अडानी ने विश्व बाज़ार में बड़ी छलांगें लगानी शुरू कर दीं. टाटा, प्रेमजी, नारायण मूर्ति का कारोबार तथाकथित तीसरी दुनिया में ही नहीं, बल्कि ‘पहली’ दुनिया, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में भी फैलता चला गया.
1 जनवरी 1978 को, अमेरिकी राष्ट्रपति कार्टर इंडिया आया. उस समय मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे. ऐसा नहीं कि कड़ी बात सिर्फ इंदिरा गाँधी ही बोल सकती थीं, स्वमूत्र सेवन करने वाले, मोरारजी भाई ने भी, अपनी टोपी सीधी करते हुए, साफ़ कह दिया; जितनी मंजूरी पाबंदियां लगाइए, हमारा परमाणु कार्यक्रम अब नहीं रुकने वाला. तब जाकर, 10 मार्च 1978 को इंडिया को, ‘परमाणु अप्रसार संधि’ पर हस्ताक्षर करने को मनाया गया. यह बिलकुल बराबरी की हैसियत से हुआ. ‘ठीक है, परमाणु बम तकनीक, जैसे आप लोग दूसरों को नहीं देते, हम भी नहीं देंगे’. लेकिन, परमाणु हथियार नहीं बनाएँगे, इस बात पर राज़ी नहीं हुए. ना इस बात पर राज़ी हुए कि अमेरिकी इंस्पेक्टर, हमारी परमाणु प्रयोगशालाओं का मुआयना करेंगे. साफ़ कह दिया गया; हमारे परमाणु अनुसंधान प्रतिष्ठानों का मुआयना करने की बदनीयत से अगर कोई अमेरिकी लफंडर, इंडिया आएगा, तो जहाज से नीचे हमारी धरती पर क़दम रखते ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा. ‘तुम तुम्हारा देखो, हमें ज्ञान मत बांटो!!
1982 की 28 जुलाई को इंदिरा गाँधी अमेरिका गईं. रोनाल्ड रीगन को उन्होंने बिलकुल साफ़ बोल दिया, ‘हमारे और आपके विचारों में मतभेद हैं. उन्हें आप सुलझाना चाहते हैं, तो हम राज़ी हैं. आप, अगर हमें लेक्चर झाडऩे की तमन्ना पाले हुए हैं, तो हम राज़ी नहीं हैं’. बराबरी के स्तर पर बात हुई. ऐसी वार्ताओं में प्रमुख अजेंडा वही रहता है; हमारा इतना बड़ा बाज़ार है, आपको अगर हिस्सेदारी चाहिए तो हमारे आक़ाओं को अपने देश के बाज़ार में हिस्सेदारी देनी पड़ेगी. वहां के मीडिया ने भी लिखा था कि रीगन ने जितनी आव-भगत, इंदिरा गाँधी की की, उतनी किसी देश के मुखिया की नहीं की.
20 मई 1990 को, अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार, रोबट्र्स गेट्स के नेतृत्व में, एक उच्च स्तरीय डेलीगेशन, इंडिया और पाकिस्तान के दौरे पर आया. कश्मीर में आतंकी गतिविधियाँ बढऩे से, इंडिया और पाकिस्तान के बीच युद्ध के हालात बने हुए थे. अमेरिकियों की ख्वाहिश, दोनों देशों के बीच पंचायत कराने की थी. भारत को 1962 चीन युद्ध कराने में अमेरिकियों की दखलंदाज़ी का कड़वा तजुर्बा था ही. अब तो सारी दुनिया ही जान चुकी है कि जहाँ भी अमेरिकियों के क़दम पड़ते हैं, वहां बंटाधार ही होता है. इजराइल और युक्रेन की तबाही निश्चित है. भारत की हुकूमत ने, रोबट्र्स गेट्स को कश्मीर में घुसने की भी इज़ाज़त नहीं दी. स्वयंघोषित सरपंच हाथ हिलाता वापस लौट गया. अमेरिका ने, कई बार, कश्मीर में शांति बहाली का बहाना बनाकर, इंडिया को रूस से दूर करने की कोशिशें कीं, लेकिन इंडिया ने ऐसी बदनीयत कोशिशों को कौड़ी का भाव नहीं दिया.
नवउदारवादी नीतियां, किसी के दबाव में नहीं, पूंजीवाद की ज़रूरत की वज़ह से ही लागू हुईं जुलाई 1991 के बाद से, पूंजीवादी विकास की एक नई फेज शुरू हुई, जिसके तहत, कॉर्पोरेट की गुलामी पहले की तरह छुपकर, ढक कर करने की बजाए, खुलेआम की जाने लगी. ‘लाइसेंस राज़ ख़त्म हुआ’,दरबारी मीडिया का उपभोक्ता, मिडिल क्लास झूम उठा. ‘उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण’ की नीतियाँ, पूंजीवादी विकास के एक निश्चित मुक़ाम तक पहुँच जाने, और पूंजीपति वर्ग के सबसे प्रभुत्वकारी और वर्चस्वकारी तबक़े, की ज़रूरतों के अनुरूप ही शुरू हुईं. ये किसी अमेरिका, रूस या चीन के हुक्म के तहत नहीं हुआ. साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्था की ज़रूरतों और वित्तीय पूंजी की अवस्थिति की वज़ह से हुआ, और पूरी दुनिया में हुआ. इसे नव-औपनिवेशिक दौर कहना, ठोस वस्तुगत परिस्थितियों को नजऱंदाज़ करना और रटी-रटाई, यांत्रिक सोच का दुष्परिणाम है.
मनमोहन सिंह, अमेरिकियों के सबसे प्रिय प्रधानमंत्री थे. उन्होंने अमेरिका के साथ नज़दीकी बढ़ानी शुरू की, लेकिन एक भी समझौता अमेरिकी दबाव में, देश के शासक पूंजीपति वर्ग के सबसे प्रभुत्वकारी और वर्चस्वकारी तबक़े, अडानी-अंबानी-टाटा-प्रेमजी-नारायण मूर्ति बिरादरी के हितों को नुकसान पहुंचाते हुए नहीं किया. वैसे भी, ये परजीवी जमात, तब तक, इतनी बड़ी और आर्थिक रूप से इतनी शक्तिशाली हो चुकी थी, पूंजी का इस सीमा तक संकेंद्रीकरण हो चुका था कि इन्हें, अमेरिकी साम्राज्यवादी, परस्पर हित में समझौते करने को ही राज़ी किया ही नहीं जा सकता. गुलामगिरी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. पूंजी के असमान विकास के सिद्धांत के चलते, अमेरिका का रुतबा दिनोंदिन गिरता जा रहा है. अब उसकी गुलामी, इंग्लैंड और इजराइल जैसे उसके बगल-बच्चे देश भले करें, कोई नहीं कर रहा.
1998 में भाजपा-संघ की पहली सरकार ने ज़रूर एक मूर्खतापूर्ण क़दम उठाया. 25 साल पहले ही इंडिया परमाणु विस्फोट कर अपनी परमाणु ताक़त बता चुका था. भाजपाईयों को, लेकिन, बिना कुछ किए, महान बनने की लत है, बगैर कुछ किए, इतिहास में नाम करने की बीमारी है, बिना मरे ही शहीद कहलाने की भूख है. इसलिए वाजपेयी सरकार ने एक और परमाणु विस्फोट किया. इससे भी लेकिन, पाकिस्तान भले परमाणु विस्फोट करने में क़ामयाब रहा, लेकिन ‘अमेरिकियों से इंडिया नहीं डरता’, ये एक बार फिर साबित हुआ. बिल क्लिंटन बिफऱ पड़ा था. दिल्ली से अमेरिकी राजदूत वापस बुला लिया गया था. व्यापार पर पाबंदियां लगाकर अर्थव्यवस्था बर्बाद करने की घुड़की भी आई, लेकिन नई दिल्ली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. धीरे-धीरे लठैत को ही अपनी मूछें नीची कर, राजदूत को वापस भेजना पड़ा. पहले जैसे हालात वापस लौट आए. 1999 में कारगिल जंग छिड़ी. क्लिंटन को फिर पंचायत करने की चूहल मची. मुशर्रफ वाशिंगटन पहुँच भी गया, लेकिन अमेरिका के बुलाने पर भी, इंडिया वहां नहीं पहुंचा. अमेरिका में भारतीय राजदूत ने स्पष्ट कह दिया, हमारे झगड़े सुलटाने में हम समर्थ हैं, आपकी ‘सेवाओं’ की जब ज़रूरत होगी, तो आपको न्यौता देकर बुला लेंगे!! स्वयं-घोषित सरपंच का चेहरा लाल हो गया, लेकिन कर कुछ नहीं पाया. शेष अगले अंक में