सेक्टर सात की मार्केट में दिन दहाड़े डकैती

सेक्टर सात की मार्केट में दिन दहाड़े डकैती
January 11 15:30 2025

बढ़ती डकैतियां, हत्याएं व अपहरण, जन सुरक्षा पुलिस की प्राथमिकता नहीं रही

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जनता की जान-माल की सुरक्षा के लिए करदाता के खर्च पर भारी-भरकम पुलिस बल कायम किया गया है। परन्तु जिस बेखौफ ढंग से अपराधी जनता को लूटने-काटने में जुटे हुए हैं उसे देख लगता नहीं कि जनता की सुरक्षा अब पुलिस की प्राथमिकता रह गई है।

दिनांक सात जनवरी को प्रात: साढ़े दस बजे सेक्टर सात की ‘हूडा’ मार्केट की जिस तरुण ज्वैलर्स दुकान से 6 डकैत 2 लाख नकद व 18 लाख के जेवरात लूट कर ले गए, वह पुलिस चौकी से मात्र 100 मीटर तथा थाने से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। पुलिस की काहिली एवं ढुलमुल रवैये के चलते यह दूरी यदि 10-20 मीटर भी होती तो भी कोई आश्चर्य नहीं होता। दरअसल पुलिस महकमे का पूरा ढांचा इस कदर बिगाड़ दिया गया है कि आपराधिक वारदातों की रोकथाम उनकी प्राथमिकता ही नहीं रही। केवल एक ही प्राथमिकता रह गई है, अधिकाधिक लूट कमाई करना। जो पुलिस पहले अपने-अपने क्षेत्र के अपराधियों की गतिविधियों पर नज़र रखती थी, अब उसकी नज़र शराब के धंधे, अवैध कब्जे कराने, जुए सट्टे के अड्डे चलवाने, नशे के सौदागरों से सांठ-गांठ करने पर रहती है। इसके लिए वह असामाजिक तत्वों से बाकायदा घाल-मेल रखती है। वसूली के लिए दिन भर ओयो होटलों व कबाडिय़ों के चक्कर लगाती है।

डकैती की इस वारदात के लिए 6 डकैत दो मोटरसाइकिलों पर आए और बड़ी आसानी से अपना काम करके दिल्ली कलिंदीकुंज की तरफ निकल गए। सवाल यह उठता है कि एक मोटरसाइकिल पर तीन सवार होकर चलने की हिम्मत कैसे कर पाए? इसलिए कर पाए कि ऐसे छोटे-मोटे कानूनी उल्लंघनों को पुलिस गम्भीरता से नहीं लेती। यदि पुलिस छोटे अपराधों के प्रति गम्भीर होने लगे तो बड़े अपराध करने से अपराधी घबराने लगते हैं। दिल्ली तक के करीब 20-25 किलोमीटर के इस रास्ते में पडऩे वाले किसी भी पुलिस नाके आदि पर इन्हें रोकने-टोकने की जरूरत किसी पुलिसकर्मी ने नहीं समझी।

सर्वविदित है कि थाने-चौकियों में तैनातियां आसानी से नहीं मिलतीं। लगभग सभी पुलिसकर्मी जुगाड़बाज़ी करके, नेताओं की चापलूसी करके अथवा अधिकारियों से लेन-देन करके यहां तैनातियां पाते हैं। जाहिर है कि जब तैनातियां इस तरह से होंगी तो ऐसे कर्मियों का एजेंडा भी इसी के अनुसार होगा। नेताओं के कहने पर उलटे-पुलटे काम करना, उसको पकड़ लो, उसको छोड़ दो, झूठे मुकदमे दर्ज करना तथा निहित स्वार्थों के पूर्ति के लिए लोगों को धमकाना ही इनका उद्देश्य रह जाता है।

इस वारदात की सूचना मिलने पर थाना सेक्टर सात पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 310,311 व 25 आम्र्स एक्ट के अंतर्गत मुकदमा नम्बर 10 दर्ज कर लिया है। पीडि़त दुकान मालिक विनय जैन ने शिकायत में बताया है कि हेंल्मेट लगाए दो बदमाश बाइकों पर बाहर खड़े रहे जबकि चार नकाबपोश डकैत जिनके हाथ में पिस्तौत थे, ने दुकान को लूटना शुरू कर दिया। जब विनय ने विरोध करते हुए उन्हें रोकना चाहा तो डकैतों ने उसे धक्का मारा जिससे गिरने पर उसे चोट भी लगी।

जनता में भरोसा कायम रखने के लिए, शुरूआती जोशो-खरोश दिखाते हुए पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी मौका ए वारदात पर पहुंचे। डकैतों को पकडऩे के लिए अनेकों टीमें बना कर इधर-उधर दौड़ा दी गईं। इसके बावजूद भी क्षेत्र के दुकानदारों में भय व्याप्त है। उनका पुलिस व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है। विदित है कि इस बड़ी वारदात पर तो पुलिस ने कुछ सरगर्मी दिखाई है, लेकिन आए दिन होने वाली छोटी-मोटी चोरियों, जेब तराशी आदि के मामलों का तो पुलिस संज्ञान ही नहीं लेती। इससे सम्बन्धित कई मामले ‘मज़दूर मोर्चा’ प्रकाशित कर चुका है।

इस तरह की वारदातों में शिकायतकर्ता का पिंड भी पुलिस आसानी से छोड़ती नहीं है। ऐसे अनेकों मामले देखने में आए हैं जब अपराधियों की तलाश में जाने के लिए पुलिस शिकायतकर्ता से ही वाहन एवं अन्य खर्चों की मांग करती है। शिकायतकर्ता के मना करने पर कहा जाता है कि उसकी शिकायत ही झूठी है। इससे भी बड़ी बात तो यह देखने में आती है कि अपराधियों के पकड़े जाने के बावजूद माल की बरामदगी नहीं होती, अगर होती भी है तो उसे पुलिस पी जाती है। रही बात मुकदमे की तो मौजूदा न्याय व्यवस्था में ऐसे अपराधियों को सजा होने के आसार बहुत ही कम होते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि शिकायतकर्ता भय के मारे अपराधियों को पहचानने से ही इनकार कर दे। ऐसे कई मामले देखे गए हैं जब पहचानने वाले गवाहों को ही अपराधी मार देते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ पाता है।

दरअसल आज पुलिस सुरक्षा केवल चंद विशिष्ट लोगों के लिए रह गई है। राज्य के 90 विधायक तथा 10 सांसदों के लिए 400 पुलिसकर्मी तो सीधे-सीधे लग गए। मंत्रियों व मुख्यमंत्री के लिए और भी अधिक संख्या में लगते हैं। इतना ही नहीं मंत्रियों के आगे-पीछे चलने के लिए सायरन बजाती पुलिस जिप्सियां भी लगती हैं। जो व्यक्ति कल तक शहर में यूं ही घूमता फिरता था, आज मंत्री बनने के बाद सुरक्षा के नाम पर वह यह पुलिसिया आडंबर चाहने लगा है। मुख्यमंत्री के लाव लश्कर की तो बात ही न कीजिए उनका लश्कर तो काफी लंबा चौड़ा रहता है।

इसके बाद तमाम बड़े अफसरशाहों, जजों, चेयरमैनों, विभिन्न आयोगों के सदस्यों तथा सत्तारूढ़ दल के अनेकों लगुओं-भगुओं को भी गनमैन दिए जाते हैं। अनुमानत: इस तरह की सुरक्षा में 2500 से अधिक पुलिसकर्मी लगे हुए हैं। कुल मिलाकर शासन-प्रशासन चलाने वालों ने अपनी सुरक्षा तो पुख्ता कर ली लेकिन आम जनता को अपराधियों के रहमो करम पर छोड़ दिया। उस पर सितम यह कि यदि कोई नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस लेना चाहे तो पुलिस लेने नहीं देती।  यदि लेने भी देती है तो भारी कीमत वसूल करती है। मौजूदा रेट दो से चार लाख तक बताया जाता है। इतना ही नहीं जब भी कोई चुनाव घोषित होते हैं तो इन लाइसेंसी हथियारों को पुलिस जमा करा लेती है जबकि अपराधियों के हथियार पुलिस जमा नहीं करा पाती।

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Mazdoor Morcha
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