बल्लबगढ़ (मज़दूर मोर्चा) 36 वर्षीय भरत गोस्वामी पेशे से इंजीनियर व दो बेटियों के पिता थे। पलवल के निकट गांव फिरोजपुर के मूल निवासी थे। काम के लिये वे प्रति दिन दिल्ली आना-जाना करते थे। बल्लबगढ़ तक वे मेट्रो रेल से तथा इससे आगे गांव तक का सफर वे सड़क मार्ग से तय करते थे। लेकिन बीते करीब दो साल से भारत सरकार के राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा बघोला गांव के लिये एक अंडरपास का निर्माण चल रहा है। इसके चलते राजमार्ग पर एक से दो घंटे तक का जाम लगा रहता है। इस जाम से बचने के लिये भरत गोस्वामी ने बल्लबगढ़ से शटल द्वारा पलवल पहुंच कर वापस अपने गांव तक आना शुरू किया था। छह सितंबर की शाम को भी जब भरत मेट्रो से उतर कर पलवल के लिये सात बजे वाली ट्रेन पकडऩे पहुंचे तो अपने प्राणों से हाथ धो बैठे।
हुआ यूं कि पांच बजे वाली ट्रेन उस दिन सरकार ने चलाई ही नहीं थी, ज़ाहिर है कि उसकी सवारियां भी सात बजे वाली ट्रेन में भूसे की तरह लद गईं। इस तरह लदी-फंदी ट्रेन जब बल्लबगढ़ पहुंची तो अन्य सवारियों की तरह भरत ने भी इस ट्रेन में घुसने का विफल प्रयास किया। उनके हाथ में दरवाजे का हैंडल आ गया और पैर पायदान पर टिक गये।
ज्योंही ट्रेन प्लेटफार्म पर आगे बढ़ी तो प्लेटफार्म पर ही बनी पुरानी इमारत की दीवार आ गई और भरत व एक अन्य यात्री उससे टकरा कर गिर गये। भरत का सिर व दूसरे यात्री का हाथ रेल के पहिये के नीचे आ गया और भरत की मौत हो गई। इसके बावजूद मोदी की रेल ज्यों की त्यों चल रही है और बघोला का अंडरपास भी ज्यों का त्यों आवागमन में बाधा बना हुआ है। जन सरोकारों से विमुख भक्तगण बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि जब रेल में जगह ही नहीं थी तो भरत को उसमें लटकने की क्या जरूरत थी? लेकिन गोबर खाने वाले ये भक्त यह क्यों नहीं बताते कि कोरोना के नाम पर बंद की गई ट्रेन सेवाएं आज तक चालू क्यों नहीं की गई? बातें तो करते हैं पलवल तक मैट्रो ट्रेन चलाने की और चलाते नहीं साधारण ट्रेनें भी। उस दिन पांच बजे वाली ट्रेन न चला कर दोनों ट्रेनों की सवारियां सात बजे वाली ट्रेन में क्यों लादी गईं, क्यों नहीं उनके लिये वैकल्पिक व्यवस्था की गई? चलो इस ‘रेल सेवा’ को भी लोग जैसे-तैसे भुगत ही रहे थे कि इससे भी मानो मोदी सरकार को संतुष्टि नहीं हो रही थी जो उसने बघोला के स्थान पर जाम की व्यवस्था पक्के तौर पर कर दी। यही तो है मोदी सरकार का विकास जिसने लोगों का जीना तक मुहाल कर दिया है।
बल्लबगढ़ स्टेशन पर मौजूद राजकीय रेलवे पुलिस जीआरपी वालों ने इस संवाददाता को बताया कि इस तरह की घटना कोई यदा कदा होने वाली नहीं बल्कि, अक्सर होती रहती हैं। हर महीने दस-बीस लोग रेल से गिर कर अपने हाथ पैर तो कटवाते ही हैं और कभी कभार सिर भी कटवा बैठते हैं। उसके बावजूद भी न तो सरकार स्थिति में कोई सुधार करने की कोशिश कर रही है और न ही दैनिक यात्री संघों के तथाकथित नेताओं को आवाज़ उठाने की फुर्सत मिल रही है।