क्या भारत, अमेरिका के इशारे पर चलता है?

क्या भारत, अमेरिका के इशारे पर चलता है?
October 08 02:16 2024

गतांक से आगे
क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा

मार्च 2000 में, सम्बन्ध सामान्य करने, क्लिंटन को ही इंडिया आना पड़ा. 1989 में सोवियत संघ औपचारिक रूप से टूट कर बिखर गया और तब तक, रूस महाशक्ति के रूप में उभर भी नहीं पाया था. दुनिया एकध्रुवीय थी. इंडिया को ‘समाजवादी’ खेमे से रियायतें, समरमाएदारों को डॉलर की बजाए रुपये में ही भुगतान करने का अवसर भी नहीं बचा था. लेकिन इन परिस्थितियों में भी भारत सरकार को, अपने सरमाएदार कॉर्पोरेट के हितों की क़ीमत पर कोई समझौता मंज़ूर नहीं हुआ. एकध्रुवीय दुनिया के दौर में भी, भारत ने अमेरिकी दरबार में नतमस्तक होने से इंकार कर दिया. 2001 में जॉर्ज बुश को एकतरफीय घोषणा करते हुए,अमेरिका द्वारा इंडिया पर लगाई गई सभी पाबंदियों को हटा लिया.

2005 में, अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस भारत आईं, और बहुचर्चित परमाणु ऊर्जा समझौते पर हस्ताक्षर हुए. विपक्षी भाजपा और अंधराष्ट्रवादी मीडिया ने हल्ला मचा दिया कि इंडिया ने अमेरिका के सामने आत्म-समर्पण कर दिया है. समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले हुई वार्ता से ही स्पष्ट हो गया, कि सच्चाई वह नहीं जो भाजपा कह रही है. अमेरिका की ओर से, जैसे ही यह शर्त रखी गई कि इंडिया को ईरान से तेल आयात और अन्य व्यापार संबंधों को तोडऩा पड़ेगा, तपाक से जवाब आया; हमारे बीच होने जा रहे समझौते का असर, अन्य देशों के साथ हमारे किसी भी समझौते पर बिलकुल नहीं पड़ेगा. नटवर सिंह इतना बोलकर ही नहीं रुका. क्या आप पाकिस्तान को एफ़-16 लड़ाकू जहाज ना बेचने की शर्त मान सकते हैं? फिर आप, हमसे ईरान से संबंध तोडऩे की उम्मीद क्यों करते हैं. परमाणु उर्जा समझौते पर हस्ताक्षर करते वक़्त, इंडिया ने इतना ज़रूर कहा, जो सिफऱ् कहने के लिए ही कहा जाता है, ‘हम परमाणु बम नहीं बनाएँगे’. लेकिन जैसे ही अमेरिका ने, अमरीकी दादागिरी वाली संधि, ‘सीटीबीटी’ पर हस्ताक्षर करने की शर्त लगाई, इंडिया ने साफ़ इंकार करने में एक मिनट नहीं लगाया, क्योंकि उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय इंस्पेक्टर्स को, जो अमेरिका के भाड़े के टट्टू होते हैं, यहाँ आकर परमाणु रिअक्टर्स पर जाकर रायता फ़ैलाने की छूट मिल जाती.

इतना ही नहीं, दुनिया के बड़े साम्राज्यवादी मुल्क़ों के समूह, ‘नयूक्लेअर सप्लायर्स ग्रुप’ ने इंडिया को परमाणु तकनीक दिए जाने पर आपत्ति की, तो उसे मनाने का काम अमेरिका ने ही किया. अमेरिका को, इंडिया के विशाल बाज़ार में, ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की भूख का ही यह परिणाम है. रईसजादों की अमेरिकी मोटर साइकिल, हार्ले डेविडसन के आयात की बात तब ही मानी गई, जब अमेरिका ने इंडियन आम पर लगी आयात की पाबंदियां हटाई.

मोदी के फ़ासीवादी काल में भारत-अमेरिकी संबंध
बुर्जुआ डेमोक्रेसी में जो काम छुपकर परदे के पीछे होता है,फ़ासीवादी निज़ाम में वह, खुलेआम, डंके की चोट पर होता है. ख़ूनी फ़ासीवादी शासन व्यवस्था का यह एक अनचाहा/ अप्रत्यक्ष फ़ायदा होता है. आज देश में किसी को भी, यहाँ तक की भक्त समुदाय को भी यह समझाने की ज़रूरत नहीं रही, कि मोदी सरकार शासक पूंजीपति वर्ग, उसके सबसे प्रभुत्वकारी और वर्चस्वकारी हिस्से, जिसे एक हाथ की उँगलियों पर ही गिना जा सकता है, की ताबेदार है. वह अडानी-अंबानी बिरादरी की मुंशीगिरी करती है. फासिस्ट मोदी सरकार की एक और घृणित ख़ासियत यह है कि इसे मान-मर्यादा, गरिमा वगैरह की टेंशन नहीं होती. अपने चेले-चपाटे को ज़हमत ना देकर, ख़ुद प्रधानमंत्री, दूसरे देश के प्रधानमंत्री/ राष्ट्रपति को फ़ोन कर बोल सकते हैं; ‘अगर हमसे संबंध रखना चाहते हैं, तो अमुक परियोजना का ठेका अडानी को दे दो,. एक देश के मीडिया ने तो यह राज़ उजागर कर दिया, और भी ना जाने ऐसी कितनी वारदातें हुई होंगी.

इतना ही नहीं, अडानी के जहाज में घूमना, उसे हर विदेश यात्रा पर ले जाना, इस शातिर अपराधी व्यवसायिक समूह को हर अपराध से बचाना, अदालतों में झूठे अफिड़ेविट देना, उस पर आरोप लगाने वालों को ही उठवा लेना, उनका जीना हराम कर देना, खुलेआम हो रहा है. यह जानपूछकर हो रहा है, जिससे सारी दुनिया जान ले कि अडानी किसका बंदा है!! मोदी की शुरुआती ऑस्ट्रेलिया यात्रा में स्टेट बैंक की चेयरमैन और अडानी साथ गए थे. अडानी की ऑस्ट्रेलिया की कोयला परियोजना का 6,000/ करोड़ का कज़ऱ् वहीं मंज़ूर हुआ था. उसके बाद देश के सारे बैंक समझ गए, उन्हें क्या करना है!!

‘रूस के बाद युक्रेन की यात्रा, मोदी ने अमेरिका के दबाव में की, यह बहुत ही अगंभीर टिप्पणी है. डोवाल की उसके बाद की मास्को यात्रा से ही साबित हो गया कि ये टिप्पणी सही नहीं है. युक्रेन की तबाही मुकम्मल होने वाली है. वहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने वाले हैं, जैसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुए थे. भारत के रियल एस्टेट के बड़े लुटेरों को उस निर्माण कार्य में हिस्सेदारी मिले, इसलिए मोदी 10 घंटे की रेल यात्रा के बाद वहां पहुंचे थे. अडानी भी एक निर्माण कंपनी खोलने जा रहा है, और अडानी अब टुच्ची परियोजनाओं को हाथ नहीं लगाता. हिन्देंबेर्ग कंपनी ख़ुद को बहुत बड़ा तोपची समझती थी. जितने ठोस, दस्तावेज़ी अकाट्य सबूत उसने अडानी के विरुद्ध प्रस्तुत किए, उतने किसी भी दूसरे देश की किसी भी कंपनी के बारे में किए होते, तो उस कंपनी का भट्टा बैठ गया होता, और वहां का ‘अडानी’ जेल में सड़ रहा होता. यहाँ अडानी से पूछताछ भी नहीं हुई. हिन्देंबर्ग का मालिक अगर इंडियन होता, तो ईडी की कस्टडी में होता और ज़मानत को तरस गया होता.

ईरान के नाम से ही, अमेरिका की आँखों से खून टपकता है. सबसे भयानक पाबंदियां अमेरिका ने ईरान पर ही लगाई हुई हैं. दुनिया के चंद देश ही ईरान से व्यापार कर पा रहे हैं, इंडिया उनमें से एक है. पेरिस में हुए जलवायु सम्मलेन में अमेरिकी हुकूमत, भारत पर कोयले के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाने पर ज़ोर दे रही थी. विदेश मंत्री ने झल्लाकर वहीं कह दिया, हमें ज्ञान मत बांटो. आसियान देशों के समझौते पर हस्ताक्षर करा कर अमेरिका, भारत को हमेशा के लिए चीन के विरोधी ख़ेमे में लेना चाहता था, भारत ने फिर कह दिया, हमें मालूम है, कहाँ साइन करने हैं, कहाँ नहीं. चीन से कॉर्पोरेट हित गुंथे हुए हैं, इसीलिए चीन, सीमा में कितनी भी दूर तक घुस आता है, फिर भी महाबली को नजऱ नहीं आता.

अमेरिका की हालत तो वैसे भी आज दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है. खाड़ी के देश भी उसे आंख दिखाने लगे हैं. कोई सोच सकता था कि नाटो का देश,तुर्की, नाटो छोड़ ब्रिक्स में शामिल होने की बात करेगा? सऊदी अरब जैसा अमेरिका का बेशर्म पिट्ठू, उस ब्रिक्स में शामिल होने का आवेदन करेगा,जिसमें ईरान भी मौजूद है. गाजा में हो रहे भयानक नरसंहार का अपराधी नंबर 1 अमेरिका है. उसकी चौधराहट के दिन लद गए, इस क्रूर हक़ीक़त को वह हज़म नहीं कर पा रहा. ब्रिक्स को शुरू करने वाले देशों में भारत प्रमुख था. ब्रिक्स आज आर्थिक रूप से नाटो और जी-7 से भी बड़ा हो गया है.

कनिष्ठ साझेदार होना, गुलाम होना नहीं होता
पूंजीवाद में बराबरी पर, कुछ नहीं होता. पूंजीवादी विचार, मूल रूप से बराबरी की धारणा का विरोधी विचार है. मालिक और मज़दूर ही नहीं, मालिक-मालिक में भी, कोई भी समझौता बराबरी पर नहीं होता. बड़ी पूंजी, छोटी पूंजी को निगलकर बड़ी होती है. निगली गई छोटी पूंजी भी, अनेकों छोटी पूंजियों को निगल चुकी होती है, और निगलने वाली बड़ी पूंजी भी और बड़ी पूंजी के सामने छोटी हो जाती है, और निगले जाने को अभिशप्त है. ‘मुनाफा’ पूंजीवाद को आदमखोर बनाता है. यह निज़ाम चलता ही वर्चस्व पर है. अडानी और अंबानी दोनों का मालिक एक है. इसके बावजूद भी, इनमें बैर कम हो गया,यह सोचना अतिभोलापन होगा. कल अगर अडानी की बरबादी की ख़बर आ जाए, तो सबसे ज्यादा ख़ुशी अंबानी को होगी. मार्किट में उसके शेयरों के दाम बढ़ जाएँगे. कार्ल माक्र्स ने कितना सही कहा था, ‘पूंजी मृत श्रम है, जो चुड़ैल की तरह मज़दूरों का खून चूसकर जिंदा रहती है, जितना ज्यादा चूसती है उतनी ही ज्यादा फूलती है’. आज पूंजी, अपनी चरम अवस्था साम्राज्यवाद के भी चरम छोर पर है.

समानता, बराबरी, सद्भावना, संवेदना, न्याय, इंसानियत, मानवता आदि शब्द पूंजीवाद की डिक्शनरी में नहीं होते. मुनाफ़े की भट्टी में स्वाह हो जाते हैं. मासूम बच्चों की लाशों के ढूह से भी अगर, वर्चस्वता सुरक्षित रहती हो, तो ज़ायज़ है! हर समझौते में वर्चस्वता और ज़बर होता ही है, भले उसे मखमली आवरण से छुपाया क्यों ना गया हो. बहुराष्ट्रीय कंपनियां, कमज़ोर पूंजी की बांह मरोडऩे और ज़ोर-ज़बर से अपना बाज़ार बढ़ाने और एकछत्र राज़ क़ायम करने की क्षमता लगातार बढ़ाती रहती हैं. ऐसा वे अमेरिका में भी करती हैं. आए दिन हम पढ़ते हैं, कि 6 दैत्याकार कंपनियों, गूगल, एप्पल (अल्फाबेट), अमेजऩ, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और टेस्ला पर अमेरिकी अदालतों ने जुर्माना लगाया क्योंकि उन्होंने अमेरिका के मोनोपोली विरोधी क़ानून का उल्लंघन किया. ये महज़ एक दिखावा और पाखंड होता है, क्योंकि इनकी पूंजी लगातार बढ़ती जा रही है.

गुलामी, दरअसल, अमेरिका और जी-7 की नहीं है, पूंजी की है. पूंजी आज साम्राज्यवादी रूप अख्तियार कर खूंख्वार हो चुकी है. हर देश के सबसे बड़े पूंजी मालिकों को अपने साथ जोड़कर ही ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना शिकार करती हैं. हर देश की सरकारें चूँकि वहां के सबसे बड़े, वर्चस्वकारी पूंजी मालिकों की प्रबंध कमेटी नहीं बल्कि मुंशीगिरी करती हैं, ये दैत्याकार कंपनियां इन्हें अपना कनिष्ठ साझीदार बनाकर ही अपने लूट-तंत्र का विस्तार करती हैं.

जैसे मज़दूर का कोई देश नहीं होता, वैसे ही पूंजी का भी कोई देश नहीं होता. बहुराष्ट्रीय कंपनी का हेड ऑफिस अगर वाशिंगटन में है, तो उसे अमेरिकी कंपनी कहना, और ये मुगालता पालना कि वह अमेरिकी मेहनतक़श अवाम के भले की सोचेगी, ठीक नहीं. ये कंपनियां अब किसी भी देश की नहीं हैं, बल्कि बहुत सारे देशों के धन-पशुओं की साझेदारी की कंपनियां हैं, जो हर देश की छोटी पूंजी को निगलती जा रही हैं. सप्लाई चेन पर नियंत्रण कर और छोटी पूंजी को बरबाद कर, इज़ारेदारी क़ायम कर बेतहाशा मुनाफ़ा कूट रही हैं.

आज हो रही लूट नव-उपनिवेशवाद नहीं, साम्राज्यवादी पूंजी की कार्टेल की लूट है
Indian roots in American Soil, 2000Ó रिपोर्ट के अनुसार, 155 इंडियन कंपनियों ने अमेरिका में $22 बिलियन का निवेश किया हुआ है, जिनमें 1,25,000 अमेरिकियों को रोजग़ार मिला हुआ है. सभी 50 अमेरिकी राज्यों में इंडियन कंपनियां मौजूद हैं.

दुनिया की साम्राज्यवादी लूट में भारत के कॉर्पोरेट लुटेरे, कनिष्ठ साझेदार ज़रूर हैं, लेकिन अनेकों कनिष्ठ साझेदारों में वरिष्ठ साझेदार हैं. यह कनिष्ठता और वरिष्ठता सापेक्ष है, लेकिन गुणात्मक रूप से लूट ही है, जो स्वेच्छा से, अपने मुनाफे की कभी ना शांत होने वाली भूख मिटाने के लिए ही हो रही है. उदहारण के लिए, अडानी ने बांग्लादेश से बिजली आपूर्ति का समझौता, वहां की सरकार की कनपटी पर बंदूक रखकर नहीं किया, बल्कि वहां के लुटेरे कॉर्पोरेट के एक समूह को, लूट में हिस्सा-पत्ती देते हुए, ख़ुशी से जाम टकराते हुए किया. दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष दोनों देशों के लुटेरों के साथ खड़े थे. इसे, पहले वाली औपनिवेशिक या नव-औपनिवेशिक गुलामी कहना, क्रांतिकारी रास्ते से भटक जाना होगा.

औपनिवेशिक गुलामी में, सफ़ेद चमड़ी और नीली आँखों वाला एक लठैत बंदूक लेकर हमारे सर पर बैठा होता था, और कहता था कि तुम ये वस्तु या अनाज पैदा करो और ये मत करो. इस देश में, हमारा ये उत्पाद ही बिकेगा. औपनिवेशिक शासक के विरुद्ध लडऩे वालों में, यहाँ का सरमाएदार भी शामिल होता था, क्योंकि उसे भी अपने मुनाफ़े का एक हिस्सा, औपनिवेशिक शासक को सौंपना पड़ता था, या कम मुनाफ़े वाले उत्पादन में ही खपना होता था. बात एक ही है. औपनिवेशिक लुटेरे अंग्रेज़ों को सबने मिलकर ही भगाया था. आज जो साम्राज्यवादी लूट है, उसमें हर देश में मौजूद सबसे बड़े लुटेरे, अर्थात अडानी-अंबानी-टाटा बिरादरी, अपनी कनिष्ठता को वरिष्ठता में बदलने के लिए, केक के बड़े हिस्से पर हाथ साफ़ करने के लिए, ‘अपनी-अपनी सरकारों’ की मदद से हो रही है. सरकारें, ना सिफऱ्, इस लूट में उनके साथ खड़ी हैं, बल्कि उन्हें देश के सारे संसाधन भी सौंप रही हैं जिससे वे जल्दी से जल्दी कनिष्ठ से वरिष्ठ बन जाएँ.

पूंजीवादी- साम्राज्यवादी शोषण-लूट में शामिल, अपने-अपने देशों के ‘कनिष्ठ’ साझेदारों को दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पीडि़त समझकर, उन्हें छूट देने, उन्हें मज़बूत करने की बात करना, वैश्विक लूट-तंत्र को मुख्य शत्रु समझकर, उसके ही पीछे पड़ जाना, मेहनतक़श वर्ग को सही रास्ते से भटकाना ही कहलाएगा. हर देश का शोषक पूंजीपति वर्ग, जो कुल जनसंख्या का 5-7 प्रतिशत है, वह 95 प्रतिशत जन-मानस की कंगाली का जि़म्मेदार है. मेहनतक़शों के दुश्मन, इस पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व, आज, वर्चस्वकारी वित्तीय पूंजी के मगरमच्छ जो 1 प्रतिशत से भी कम हैं,कर रहे हैं. इसलिए ये गुनाहगार नंबर 1 हैं. दुश्मन नंबर 1 हैं. किसी भी बहाने जन-आक्रोश की धधकती ज्वाला की लपटों से इसे दूर नहीं होने देना है. सरकारें इनकी मुंशीगिरी कर रही हैं. इनके साथ, ‘दो जिस्म-एक जान’ हो चुकी हैं. इस परजीवी वर्ग को मिटाकर ही हम, ना सिफऱ् अपने देश के 99 प्रतिशत लोगों के गले में पड़े और लगातार कसते जा रहे फांसी के फंदे को काट पाएँगे,बल्कि दुनिया के स्तर पर जो बड़ा रस्सा लोगों का गला घोंट रहा है, उसे भी कमज़ोर कर पाएंगे.

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Mazdoor Morcha
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