डॉ. रामवीर कुछ रिश्ते तो टूट गए हैं कुछ हैं टूटने वाले ज्यादातर मित्रों ने मुंह पर लगा लिए हैं ताले।
जब टीवी पर पच्चीस एंकर फैलाएं अफवाहें दुष्ट और मूर्ख लोगों को देशभक्त बतलाएं।
सुबह शाम हर रोज नियम से फेक न्यूज फैलाएं फैक्ट चैक करने वालों से नाराजी जतलाएं।
ऐसे ‘पोस्ट ट्रुथ’ के युग में हम किसको व्यथा सुनाएं लोगों को ज्यादा भाती हैं बाबाओं की कथाएं।
मुसलमान के लिए है काबा हिन्दू वास्ते बाबा लोकगायिका भोजपुरी में गाए ‘देश में काबा’।
मुझे पता है मेरी कविता लगे न सबको ठीक क्योंकि मैं झूठों के झूठ की करता हूं तस्दीक।
निन्दा प्रशंसा चलती रहती यह तो जग की रीत किन्तु झूठ औ सच का अन्तर भी तो होवे प्रतीत।
बुद्धिजीवियों को कम से कम होवे इतना बोध झूठ सर्वसुलभ है सच का करना पड़ता शोध।
और शोध के पथ पे विरोधी खड़े करें अवरोध सच सुन कर आता देखा है उन्हें भयंकर क्रोध।
जब समाज के नभ में सच की ज्योति जाती कौंध अन्धभक्त झेल नहीं पाते हो जाते चकाचौंध।