मनीष आजाद कृपालु , प्रजापालक, एंटायर फ़ारसी, कुरान, एस्ट्रोनमी, गणित, विज्ञान, इकॉनमिक्स का ज्ञाता था। 19-19 घण्टे सोचता कि प्रजा का भला कैसे हो। तो बारी बारी “शबका भला-शबका विकास” करना डिसाइड किया। तय किया कि किसानों की आय डबल करेगा। सरकारी जमीन, जिस पर काश्त न होती हो, रियाया में बांटकर उन्नत खेती कराने का हुक्म किया। योजना शुरू हुई। पर उसकी पार्टी के अफसरों ने बढिय़ा जमीने खुद रख ली। बेकार जमीनें जनता में बांटी। जंगल ,पहाड़ की तलहटी, बंजर बियाबान में जाकर कौन खेती करे। योजना फेल हुई। मगर अफसर, सफलता के आंकड़े देते, और तकाबी, ट्रेनिंग, सिंचाई के नाम पर खजाने से पैसे लेते रहे। जब पता चला कि किसान की इनकम अब डबल हो गयी, तो राजा ने टैक्स डबल कर दिया। मितरों, इत्ता कमा रहे हो, तो राष्ट्र की सेवा में कुछ अर्पण करो.. दुर्भिक्ष था, उल्टे त्राहि त्राहि मच गई। राजा की एजेंसियां घरों में घुसकर मारपीट करती, कोड़े के बल पर टैक्स वसूलती। ज्यादा खुद खाती, थोड़ा खजाने में देती। राजा ने सुना, कि जनता ने काला धन, चांदी के टंके के रूप मे दबा रखा है। तो काले धन पर चोट की। एक शाम अचानक कहा- चांदी का रुपया बन्द, आज से तांबा ही चांदी है। फिर .. ?? फिर क्या- “घर मे शादी है, पैसे नही हैं” लेकिन ये हिंदुस्तान था। राजा डाल डाल, प्रजा पात पात। लोगो ने घर मे चांदी छापनी शुरू कर दी। मने अब तो तांबा ही चांदी था न…? इकोनमी की वाट लगी। राजा डेस्परेट होकर नए तरीके निकालता। कभी डिजिटल करेंसी, कभी क्रिप्टो करेंसी, कभी कुछ कभी कुछ। होना हवाना कुछ नही था। अर्थव्यवस्था ढह गई, महंगाई बढ़ गयी। राजा ने कुछ राशन का इंतजाम किया। लेकिन प्रजा त्राहि त्राहि करने लगी। लोगो ने ट्वीट किए- पागल राजा, मूर्ख राजा, अहमक है तू बादशाह.. राजा को बड़ा बुरा लगा। सोचा, कि जरूर उसके महल में वास्तु दोष है। करे अच्छा, मगर बुरा हो जाता है। उसने एक विस्टा खोजा, साम्राज्य के सेंटर में एक विस्टा। देवगिरी नाम था, राजा ने कहा- आज से देवगिरी का नाम दौलताबाद। अपुन वहां बसेरा करेगा। दिल्ली वाला, सब मेरे साथ दौलताबाद चलेगा। तो 1200 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू हुई। पूरी राजधानी, उसके नागरिक घसीटते हुए सेंट्रल विस्टा गए। 50त्न रास्ते मे मारे गए। जो जिंदा पहुचे, उनके लायक न काम था, न मौसम, न मिजाज। सारे उदास थे। राजा भी उदास था। क्योकि, कि उत्तरी सीमा पर छोटी आंख के मंगोल उत्पात मचाये थे। पहले वाले राजवंश मंगोलों से लड़े थे। कुछ जीते, कुछ हारे थे। लेकिन छोटी आंख वालो की इकॉनमी 5 गुना बड़ी थी, राजा लडऩा नही चाहता था। तो दुश्मन को ताकत से नही, युक्ति से हराने का तय किया। छोटी आंख वालों के प्रोडक्ट, दौलताबाद में बैन कर दिए। झालरें, दिए, जूते, चप्पल, मशीनरी। दुश्मन की इकॉनमी भसकाने का प्लान तो ब्रिलिएंट था। मगर उन चीजों की दौलताबाद में ही किल्लत हो गयी। चाल उल्टी पड़ गयी। तो फैसला रोल बैक किया। पैंतरा बदला, छोटी आंख वालो की रिश्वत दी। “पैसे ले लो, जूते दे दो”… याने छोटी आंख वालो ने पैसे लिए, जूते भी लगाये। राजा की बड़ी बेइज्जती हुई। पर उसने जनता और दरबारियों से यही कहा- न कोई घुसा है, न कोई आया है। दौलताबाद से उत्तरी सीमा को बचाना कठिन था। तय हुआ कि वापस दिल्ली जाएंगे। कारवां दिल्ली लौटा। शहर की 75 प्रतिशत आबादी, इस चोंचोंबोरो मे मारी गयी। अंतत: इस ब्रिलिएंट आईडीए से दिल्ली की पॉपुलेशन प्रॉब्लम सॉल्व करने में मुहम्मद बिन तुगलक सफल रहा। अरे, बताना भूल गया। मैं तुगलक वंश के मशहूर सुल्तान, जौना खां उर्फ उलुग खां उर्फ “मोहम्मद बिन तुगलक” की कथा सुना रहा हूँ। किसी जीवित या मृत कैरेक्टर से कोई सम्बन्ध मात्र संयोग है, न कि कोई प्रयोग है। डिस्क्लेमर मुझे पहले देना था.. आई एम सॉरी, बाबू !!! तो.. तुगलक के सारे आइडिया ब्रिलिएंट थे। वह सदा जनता की भलाई का सोचता। उसकी नीयत में कोई खोट निकल जाए, उसका कोई गलत इरादा निकल जाए, तो हमेशा चौराहे पर आने को तैयार रहता था। उसे बस पचास साल के वक्त चाहिए था। जो किस्मत ने उसे नहीं दिया। 24 बरस तक, राज करने के बाद वह चल बसा। तुगलक की सोच साइंटिफिक थी। फार्मर वेलफेयर, लैंड रिफार्म, करेंसी चेंज, राजधानी बदलना, सब प्लान अच्छे थे। इतिहासकारो का मत है वह अपने वक्त से बहुत पहले पैदा हो गया था। वो आधुनिक युग मे पैदा होता, तो उसे पागल बादशाह नही, ब्रिलिएंट टेक्टीशियन माना जाता। हुआ ये, कि इतिहासकारों की बात मोहम्मद बिन तुगलक की आत्मा ने सुन ली, और सिरियस ले लिया। उसने तय किया वह 700 साल बाद आधुनिक भारत मे पैदा होकर, अपने आइडियाज फिर से इम्पलीमेंट करेगा।