फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीके अस्पताल की ओपीडी के कमरा नंबर पांच में बैठने वाली त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. सरोज लोहचब कमीशनखोरी की लालच में गरीब मरीजों को बाहर की महंगी ब्रांडेड दवाएं लिख कर उनकी खाल उतारने का काम कर रही हैं। पीडि़त मरीजों की शिकायत पर मज़दूर मोर्चा सच्चाई उजागर करने पहुंचा तो डॉ. सरोज ने रिपोर्टर से न केवल अभद्रता की, उसका कैमरा भी छीन कर तोडऩे का प्रयास किया और उल्टे रिपोर्टर पर ही छेडख़ानी और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए पुलिस बुला ली।
बीके अस्पताल में कमीशनखोर डॉक्टरों द्वारा बाहर से महंगी दवाएं लिखी जा रही थीं। मज़दूर मोर्चा ने जांच पड़ताल के बाद सितंबर 2024 के अंक में ‘बीके अस्पताल में डॉक्टर द्वारा कमीशनखोरी का अनोखा मामला’ शीर्षक से विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी। चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ. धारा सिंह राठी मरीजों को बाहर से 1000 से 1300 रुपये की दवाएं लिख रहे थे। खबर प्रकाशित होने के बावजूद पीएमओ-सीएमओ ने अपने कमीशनखोर डॉक्टरों की नकेल नहीं कसी। प्रशासनिक ढिलाई से प्रेरित होकर कमीशनखोरी का यह खेल खुल कर खेला जा रहा है। त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. सरोज लोहचब मरीजों को बाहर की महंगी ब्रांडेड दवाएं लिख रही हैं। मज़दूर मोर्चा ने गतांक में ‘बीके में कमीशनखोर डॉक्टरों का आतंक जारी’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था, तब भी पीएमओ डॉ. विकास गोयल ने डॉ. सरोज को नोटिस जारी करने की बात कही थी। या तो पीएमओ ने झूठ बोला था या उनके नोटिस को डॉ. सरोज ने ठेंगे पर लिया और अपनी कमीशनखोरी जारी रखी।
मंगलवार को भी डॉ. सरोज ने शहर की सुचिता देवी, निशा कुमारी, पान मती, साबिया आदि मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिखीं जिनका बिल 1000 से 1400 रुपये तक बना। स्वास्थ्य सेवाओं के जानकारों के अनुसार बाहर से लिखी दवाओं में पचास से सत्तर फीसदी तक कमीशन होता है, इसमें से काफी बड़ा हिस्सा डॉक्टर के खाते में जाता है। डॉ. सरोज भी इसी कमीशनबाजी का हिस्सा बन मरीजों को लूट और लुटवा रही हैं। नियमानुसार उन्हें केवल अस्पताल की ही दवाएं लिखनी चाहिए, यदि अस्पताल में दवा न हो तो दवा का जेनरिक नाम ही लिखा जाना चाहिए ताकि मरीज अपनी सहूलियत के हिसाब से सस्ते दाम वाली दवा खरीद सके। इसके विपरीत दवा कंपनियों से मिलीभगत कर महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखी जा रही हैं।
सुधी पाठकों को बताते चलें कि शिकायतें आने पर पीएमओ डॉ. विकास गोयल डॉ. सरोज को बाहर की दवाएं लिखने से सख्ती से मना कर चुके हैं, बावजूद इसके वह मरीजों को लूटने से बाज नहीं आ रही। मंगलवार को भी उन्होंने उन्हें दिखाने आए लगभग सभी मरीजों को बाहर से महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखीं। मज़दूर मोर्चा के रिपोर्टर शेखर दास मंगलवार को इस गोरखधंधे की कवरेज कर रहे थे। रिपोर्टर ने उनकी कारगुजारियों को उजागर करने के लिए पीडि़त मरीजों के बयान कैमरे में रिकॉर्ड करना शुरू किए। मरीजों ने यह भी बताया कि डॉक्टर साहब एक खास मेडिकल स्टोर से मिलने वाली दवा ही लिखती हैं।
इस बाबत रिपोर्टर ने डॉ. सरोज से उनका पक्ष जानना चाहा और बाहर से ही पूछा कि क्या वह बाहर से दवाएं लिख सकती हैं, इस पर डॉ. सरोज ने कहा कि हां मैं गवर्नमेंट अफसर हूं मुझे अलाउड (अनुमति) है और उन्होंने अपने चेंबर का दरवाजा ही बंद कर लिया। रिपोर्टर मरीजों से उनका पक्ष ले रहा था कि तभी मैडम दरवाजा खोल कर अपने चेंबर से बाहर आईं और रिपोर्टर से बदतमीजी करने लगी, झपट्टा मार कर उसका मोबाइल कैमरा गिराकर तोडऩे का प्रयास किया। दबाव बनाने के लिए पहले पुलिसकर्मी और फिर अपने दलाल समर्थकों को भी बुला लिया। समर्थकों के आते ही डॉ. सरोज रिपोर्टर पर हमलावर हो गईं और उसका मोबाइल कैमरा झपट लिया, बड़ी मुश्किल से रिपोर्टर ने अपना कैमरा बचाया। उन्होंने रिपोर्टर पर उनके काम में बाधा उत्पन्न करने का आरोप लगाया। रिपोर्टर शांतिपूर्वक उनकी बातों का जवाब देता रहा, उसने कहा कि बीके अस्पताल सार्वजनिक सेवा संस्था है और डॉ. सरोज सार्वजनिक सेवा देने के लिए जवाबदेह हैं। जैसे ही उसने डॉ. सरोज से पूछा कि क्या वह बाहर से दवाएं लिखने का अधिकार रखती हैं, वह हत्थे से उखड़ गईं और रिपोर्टर पर छेडख़ानी का आरोप लगाते हुए पुलिस बुला ली। यह तो अच्छा हुआ कि मौके पर मौजूद तीमारदार और मरीजों ने घटना की वीडियो बना ली जिसमें स्पष्ट हो गया कि अभद्रता कौन कर रहा है, और गलती किसकी है। इस दौरान सलाहकार बने चपरासी ने डॉ. सरोज को समझाया कि रिपोर्टर के खिलाफ छेडख़ानी और ब्लैकमेल करने की शिकायत पुलिस में दर्ज करा दो।
मौके पर पहुंचे एनआईटी तीन चौकी इंचार्ज सोमपाल ने रिपोर्टर को चौकी पर बुलाया और सच्चाई जानने के बाद यह कहते हुए जाने दिया कि मैडम ने लिखित शिकायत दी है, मामला महिला थाने को भेजना पड़ रहा है। डॉ. सरोज की कारगुजारियों से अच्छी तरह वाकिफ पीएमओ डॉ. विकास गोयल मीडिया से रूबरू नहीं हो रहे हैं, मानो वह अपनी मातहत के भ्रष्टाचार को छिपाने का प्रयास कर रहे हों।
सरकार सहित सभी अधिकारी जानते हैं कि प्रेस का काम जनता से जुड़ी समस्याओं-सुविधाओं की कवरेज करना है, रिपोर्टर तो अपना फर्ज निभा रहा था, इसके लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं है, न ही किसी कानून का उल्लंघन होता है। यदि डॉ. सरोज या पीएमओ को लगता है कि सार्वजनिक सेवा की कवरेज न की जाए तो वह ‘प्रेस का प्रवेश प्रतिबंधितÓ का बोर्ड लगवा दें, साथ ही कानून की उस धारा का भी उल्लेख कर दें जिसके तहत यह प्रतिबंध लगाएंगी। वह अपना काम करने के बजाय कमीशनखोरी करें और रिपोर्टर जनहित की बात भी न करे?
दरअसल, बीके अस्पताल मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं देने के बजाय उनको डॉक्टरों, फार्मासिस्टों द्वारा लूटे जाने का सरकारी केंद्र बन चुका है। यहां के कमीशनखोर डॉक्टर निजी अस्पतालों के रेफर माफिया से मिलीभगत कर लाखों रुपये बना रहे हैं। 108 एंबुलेंस सेवा वाले सफदरजंग रेफर किए गए मरीज को निजी अस्पताल पहुंचा कर मोटा कमीशन पीट रहे हैं। मिलीभगत का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि 108 एंबुलेंस होने और निजी एंबुलेंस का सरकारी अस्पताल परिसर में प्रवेश निषेध होने के बावजूद दर्जनों निजी एंबुलेंस मेन गेट के बाहर खड़ी रहती हैं और इनके चालक/दलाल बीके की इमरजेंसी से लेकर वार्डों में घूमते देखे जा सकते हैं। खाऊ फार्मासिस्ट लॉबी भी आए दिन एक्सरे-अल्ट्रासाउंड मशीन तो कभी रीएजेंट खत्म होने या अन्य बहाना बना कर मरीज को बाहर से जांच कराने के लिए मजबूर करती है। ओपीडी में केवल त्वचा रोग ही नहीं, जनरल फिजिशियन, दंत रोग, हड्डी रोग, कान-नाक-गला, आंख रोग विशेषज्ञ, लगभग सभी कमीशनखोरी के धंधे में लिप्त हैं। कमीशनखोरी का यह धंधा कोई डॉक्टर अकेले नहीं चला सकता, फौरन निपटा दिया जाएगा, जाहिर है कि इस लूट कमाई की बंदरबांट पीएमओ-सीएमओ तक होती है तभी तो बार बार शिकायत आने के बावजूद ये आला अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते।
सरकार तो पहले से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की नाव डुबोने को तैयार बैठी है, अस्पतालों को न तो पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध करा रही है न ही चिकित्सा उपकरण, दवाएं। प्रधानमंत्री जनौषधि योनजा की शुरूआत भी इसी मंशा से की गई लग रही है कि अभी तक अस्पताल से मुफ्त मिलने वाली दवाओं के भी दाम मरीज से वसूले जा सकें।