डॉ. रामवीर
जैसी पोस्ट्स पढ़ते हैं आप और बनाते जैसे दोस्त धीरे धीरे हो जाते हैं जैसे खाने लगे हों पोस्त।
अवचेतन में गहरे बैठे जगा दिए जाते हैं गोस्ट इतना बदल सकते हैं जैसे वैष्णव खाने लगा हो गोश्त।
ऐसा ब्रेनवाश कर देते नष्ट ही हो जाता है ब्रेन व्हाट्सैप पर दौड़ती रहती नफरत वाली इनकी ट्रेन।
शहरी मध्यवर्ग का रोग अब तो आ पहुंचा है ग्राम फैला रहे हैं झूठी खबरें व्हाट्सैप और इंस्टाग्राम।
हर वैज्ञानिक आविष्कार के होते हैं दोनों ही पहलू मोबाइल से सीखते भी हैं और उसी से बनते उल्लू।