जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दिया नहीं, उन्हें दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया

जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दिया नहीं, उन्हें दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया
August 03 14:48 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
ताऊ देवी लाल की टिकट पर पहली बार राजस्थान के झुंझुनू से सांसद, बाद में कांग्रेस की टिकट पर 1993 में किशनगढ़ से विधायक बनने वाले जगदीप धनखड़ सन 2003 के आस-पास भाजपा की गोद में आ बैठे थे। वकील होने के नाते भाजपा ने इन्हें अपने वकील प्रकोष्ठ का नेता बना दिया था। कई वर्षों तक भाजपाई नेताओं की चरण वंदना एवं चापलूसी करने के बाद मोदी ने इनकी स्वामिभक्ति को भांपते हुए सन 2019 में इन्हें बंगाल का गवर्नर बना दिया। उस वक्त वहां भाजपा की कोई हैसियत नहीं थी। धनकड़ ने गवर्नर जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को मिट्टी में मिलाकर राजभवन को भाजपा कार्यालय बना दिया था। वे खुद एक भाजपा कार्यकर्ता की भांति सड़कों पर पुलिस वालों के साथ बहसबाजी करते नज़र आया करते थे। इतना ही नहीं जब-तब वे मीडिया में भी खुल कर बंगाल सरकार के विरुद्ध बकवासबाजी करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। बंगाल सरकार के हर काम में अड़ंगे लगाना ये अपना परम कर्तव्य समझते थे।

धनखड़ की इस अद्भुत प्रतिभा एवं पार्टी के प्रति निष्ठा को देख कर मोदी इतने प्रभावित हो गए कि उन्हें पारितोषिक के रूप में उपराष्ट्रपति बना दिया। कायदे से देखा जाए तो यह पद प्रोटोकॉ में खुद प्रधानमंत्री मोदी से भी ऊपर का है। इस पद के नाते धनखड़ राज्यसभा के सभापति भी हो गए। मोदी एवं अमित शाह की आंख के इशारों को समझते हुए इन्होंने न केवल न्यायपालिका व संविधान को जमकर गरियाया बल्कि राज्यसभा के विपक्षी सदस्यों को भी हड़काने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। एक साथ दर्जनों सांसदों को सस्पेंड करने का एतिहासिक रेकॉर्ड भी इन्हीं के नाम रहा है।
जब एक टीएमसी सांसद ने सदन के बाहर इनकी मिमिक्री की और वहां राहुल गांधी सहित खड़े दर्जनों सांसद ठहाके लगा कर हंसे तो ये साहब अपनी बौखलाहट को न रोक पाए और सदन में अपने आसन से इसका प्रतिकार करते हुए अपने इस अपमान को जाट व किसान समाज का अपमान बता दिया। इस समाज से इनका कितना जुड़ाव रहा है वह किसान आंदोलन व जंतर-मंतर पर महिला पहलवानों की हुई दुर्दशा के वक्त इनकी भूमिका से समझा जा सकता है। इनकी उसी भूमिका का परिणाम है कि आज उस जाट एवं किसान समाज से कोई आवाज़ इनके हक में नहीं उठी।

जानकार बताते हैं कि धनकड़ ने अपनी इस स्वामी-भक्ति के बदले राष्ट्रपति के रूप में एक और पदोन्नति की कामना की थी। लेकिन इन्हें समझा दिया गया था कि इनकी औकात केवल उपराष्ट्रपति पद तक की ही है। समझा जाता है कि इसके बाद इनका दिमाग घूमने लगा। इन्होंने न केवल विपक्षी दलों के साथ पींगें बढ़ाने शुरू कर दीं बल्कि मोदी के कृषि मंत्री शिवराज चौहान को भी किसानों के मसले पर सार्वजनिक रूप से हड़का दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट जज यशवंत वर्मा के मामले को लेकर तो ये जनाब खुल्लम-खुल्ला श्सरकार को घेरने लगे। कम से कम तीन बार इन्होंने इस मामले में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करने को सार्वजनिक रूप से उठाया। यह किसी से छिपा नहीं है कि दिल्ली पुलिस वही कुछ करती है जो गृहमंत्री अमितशाह चाहते हैं।

सत्ता की मलाई खाने के लिए इनके द्वारा किए गए काले कारनामों की पूरी $फाइल मोदी सरकार ने तैयार रखी हुई है। इसी के चलते ये साहब अपने त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने से मना नहीं कर सके। इतना ही नहीं इसी डर के मारे ये किसी भी विपक्षी नेता एवं पत्रकार से मिलने में भी घबराते हैं। कुल मिला कर अब इनकी स्थिति हाउस अरेस्ट जैसी बनी हुई है। ये अगर पूर्व गवर्नर सतपाल मलिक बनना भी चाहें तो बन नहीं सकते। सतपाल मलिक तो गवर्नर रहते हुए भी किसान आंदोलन के समर्थन में बोलने लग गए थे। यद्यपि उनके पास कोई काली कमाई नहीं थी तो फिर भी मोदी ने उनके गांव वाले पुश्तैनी घर पर छापेमारी व अन्य तंग करने वाली कार्रवाइयां करा डालीं। धनखड़ किसी भी हालत में मोदी की ऐसी कार्रवाईयों की ताब लाने की हैसियत में नहीं हैं। भाजपा नेतृत्व की क्रूरता का आलम तो यह है कि जिस बीमारी के बहाने से त्यागपत्र दिया गया है, उसे लेकर किसी भी नेता ने अपने पुराने सेवादार एवं वफादार, चापलूस का हाल-चाल पूछने की भी जूरत नहीं समझी। त्यागपत्र के 15 घंटे बाद मोदी ने जो ट्वीट किया है वह बहुत ही रूखा एवं अपमानजनक लगता है। कांग्रेसी सांसद गुलाम नबी आजाद की संसद से विदाई के समय जिस प्रकार मोदी ने गले मिलकर अश्रुपूर्ण विदाई दी थी, उसकी बात तो छोडि़ए मामूली विदाई रस्म अदायगी भी धनखड़ के लिए करने की जरूरत नहीं समझी गई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में धनखड़ एक मात्र ऐसे उपराष्ट्रपति हुए हैं जिनकी विदाई इस कदर अपमानजनक हुई है।

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