मज़दूर मोर्चा ब्यूरो ईएसआई कॉर्पोरेशन में बैठे उच्चाधिकारियों की हरामखोरी एवं जन विरोधी करतूतों के कारण मज़दूरों को पर्याप्त उपचार न मिलने के चलते कई बार जान तक से हाथ धोने पड़ते हैं। इसके बावजूद तमाम भुक्तभोगी एवं मज़दूर संगठन मूकदर्शक बने रह जाते हैं। परन्तु हैदराबाद की एक ईएसआई कवर्ड नर्स चुपचाप तमाशबीन बनी नहीं रह सकी। उन्होंने कॉर्पोरेशन के इन हरामखोर अफसरों को हाईकोर्ट व राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग तक घसीट कर कॉर्पोरेशन पर 50 लाख 75 हजार का जुर्माना लगवाया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस बहादुर नर्स की बेटी का बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन (बीएमटी) होना था। कॉर्पोरेशन ने आरम्भिक जांचों व चिकित्सा आदि का छोटा-मोटा खर्चा तो वहन कर लिया; परन्तु जब मामला बम्बई स्थित टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट पहुंचा तो उन्होंने इलाज शुरू करने से पहले 50 लाख रुपये जमा कराने को कहा। पूरी तसल्ली करने के बाद, राज्य के सीनियर स्टेट मेडिकल कमिश्नर ने मंजूरी देते हुए इसके लिये लेटर ऑफ क्रेडिट भी जारी कर दिया था। मरीज़ों को इलाज से वंचित रखने के लिये यानी कि अपना खर्चा बचाने के लिये कॉर्पोरेशन ने आवश्यक धनराशि जारी करने के जो नियम बना रखे हैं, उनके अनुसार यह मामला मुख्यालय में आकर फाइलों के नीचे दब गया। महीनों बाद जब मामला फाइलों से निकला तो मरीज़ की मौत हो चुकी थी।
कॉर्पोरेशन की इस हरामखोरी के चलते एक गरीब मरीज बच्ची की जान भले ही चली गई परन्तु कॉर्पोरेशन के 50 लाख तो बच गए। इसी तरह की बचतों के लिए ये जनविरोधी अधिकारी गम्भीर से गम्भीर मामलों को लटकाए रहते हैं। कोई मरता है तो मरे इनकी बला से, कॉर्पोरेशन के पैसे तो बच गए। परन्तु मृतका की मां चुप रहने वाली नहीं थी। उन्होंने कॉर्पोरेशन के लापरवाह रवैये को देखते हुए हैदराबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कॉर्पोरेशन की हेकड़ी तो देखिए, नोटिस जारी होने के बावजूद कॉर्पोरेशन का कोई नुमाइंदा हाईकोर्ट में पेश तक होने नहीं गया। इसी बीच मरीज़ की मृत्यु हो गई।
बच्ची की मृत्यु के बाद उसकी मां राज्य उपभोक्ता आयोग पहुंची। आयोग ने कॉर्पोरेशन के विरुद्ध फैसला देते हुए बच्ची की मां को पांच लाख का मुआवजा तथा दस हजार रुपये बतौर खर्चा देने को कहा। लेकिन पीडि़त मां इससे संतुष्ट नहीं हुई तो वे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग पहुंची। इस आयोग ने पूरी सुनवाई करने के बाद कॉर्पोरेशन पर वही 50 लाख का दण्ड लगाया जो कि बच्ची के इलाज के लिये स्वीकृत हो चुकने के बाद जारी नहीं किया गया था। इसके अतिरिक्त 75 हजार बतौर खर्चा देने को भी कहा है। आयोग ने अपने आदेश में इस रकम से एक ट्रस्ट बनाने को भी कहा है। लेकिन यह स्पष्ट नही हो पाया कि ट्रस्ट कौन और कैसे चलायेगा?
कॉर्पोरेशन इतनी आसानी से यह दण्ड भुगतने वाली तो नहीं है। इससे बचने के लिये अभी लाखों रुपये सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लडऩे के लिये भी खर्च किये जाएंगे। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह पैदा होता है कि दण्ड की रकम व वकीलों का खर्चा कॉर्पोरेशन के उस फंड से कैसे किया जा सकता है जो मज़दूरों से उनकी चिकित्सा एवं सामाजिक सुरक्षा के नाम पर वसूला जाता है? यह सारा खर्चा उन निकम्मे एवं जनविरोधी अधिकारियों से वसूला जाना चाहिये जो मामले को दबा कर बच्ची के मरने की प्रतीक्षा करते रहे। यदि वे सेवानिवृत्त हो गए हों तो उनकी जायदादों से यह वसूली की जानी चाहिए। खबर का स्रोत : एडवोकेट सुलेमान भिमानी लीगल कंसल्टेंट