मज़दूर मोर्चा ब्यूरो संघ की शाखाओं में बार-बार झूठ बोलकर उसे सच बताने की कला में निपुणता हासिल करने वाले भाजपाई गृहमंत्री अमित शाह ने बीते सोमवार को अग्रोहा (हिसार) मेडिकल कॉलेज में खूब झूठ के पकौड़े तले। दावा किया कि उनकी सरकार ने बीते दस साल में एमबीबीएस की सीटें 51 हजार से बढ़ाकर 1 लाख 15 हजार कर दी हैं। उनका झूठ फौरन ही पकड़ में आ गया क्योंकि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल बजट पेश करते हुए दावा किया था कि भाजपा सरकार ने बीते 11 सालों में मेडिकल स्नातक और स्नातकोत्तर की 1 लाख 10 हजार सीटें जोड़ी हैं।
सरकारी संस्थाओं में संघी हिंदुत्ववादी एजेंडा लादने की मुहिम की अगुवाई कर रहे गृहमंत्री अमित शाह वहां महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा का अनावरण करने आए थे, मानो प्रतिमा का अनावरण होते ही मेडिकल कॉलेज की सारी कमियां खत्म हो गईं और छात्रों को विश्व स्तरीय शैक्षणिक माहौल मिलने लगा, मरीजों को लाजवाब स्वास्थ्य सेवाएं मिलने लगीं। ऐसा तो कुछ हुआ नहीं, हां उन्होंने इस मौके पर मेडिकल कॉलेज में 32 बेड के विस्तारित आईसीयू का भी लोकार्पण किया। लोकार्पण तो कर दिया लेकिन यह नहीं बताया कि इसके लिए जरूरी अतिरिक्त शैक्षणिक और मेडिकल-पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती की गई है या नहीं। पीजी हॉस्टल का भी शिलान्यास किया, लेकिन खराब खाने के लिए धरना प्रदर्शन करने वाले मेडिकल छात्रों की दी जाने वाली सुविधाओं में सुधार करने के कोई उपाय उन्होंने नहीं बताए।
अमित शाह ने 2030 तक देश के सभी जिलों में मेडिकल कॉलेज खोलने का जुमला भी उछाला। सिर्फ इमारत खड़ी कर देने से मेडिकल कॉलेज चलने नहीं लगते और न ही उनमें मरीजों का इलाज या अन्य स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होने लगती हैं। प्रदेश में चल रहे 12 मेडिकल कॉलेजों का हाल किसी से छिपा नहीं है। इनमें से रोहतक, खानपूर, करनाल, नूंह तो पहले की सरकारों के समय के हैं। बाकी आठ मेडिकल कॉलेज निजी हैं और उनमें दी जा रही चिकित्सा और शैक्षिणक सेवाओं का हाल बेहाल ही है। जहां वित्तमंत्री ने हर साल दस हजार सीटें बढ़ाने का दावा किया था, अमित शाह ने अगले पांच साल में 85 हजार सीटें बढ़ाने का दावा कर डाला। दावा क्या है जिन मेडिकल कॉलेजों में सौ सीटें थीं उनमें एकदम से पचास सीटें बढ़ा दी गईं, इसी तरह हर साल सीटें बढ़ाई जाती रहेंगी ताकि मोदी-शाह-निर्मला सीतारमण और नायब सैनी अपना ढिंढोरा पीट सकें।
सीटें तो बढ़ा दी गईं लेकिन छात्रों को पढ़ाने के लिए जिस अनुपात में फैकल्टी एवं अन्य सुविधाएं होनी चाहिए वह सरकार ने किसी भी मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध नहीं कराए हैं। प्रदेश में ठीक ठाक चलने वाले मेडिकल कॉलेज तो भाजपा से पहले वाली सरकारों के समय के हैं, बीते 11 साल में जितने भी मेडिकल कॉलेजों की घोषणा की गई उनमें से कोई शायद ही चल रहा है। केवल पंचायतों की जमीन पर सरकार ने कब्जा कर लिया है। बिना इमारत, स्टाफ वाले इन मेडिकल कॉलेजों में फिलहाल पांच छह साल तो पढ़ाई और चिकित्सा सेवाएं शुरू होते नजर नहीं आ रहीं। हां, मेडिकल कॉलेजों के नाम पर डबल इंजन सरकारों ने मेडिकल शिक्षा कई गुणा महंगी कर दी। पढ़ाई हो या न हो लेकिन आठ लाख रुपये प्रतिवर्ष की दर से फीस वसूली जा रही है। छांयसा का बना बनाया मेडिकल कॉलेज भी सरकार नहीं चला सकी। यहां न शैक्षणिक स्टाफ है, न ही चिकित्सा सेवाओं से संबंधित आधारभूत ढांचा।
फैकल्टी नहीं होने के कारण छात्रा मेडिकल के सभी विषयों की पढ़ाई ही नहीं कर पा रहे। इससे भी बड़ी बात इस मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा सेवाओं के अभाव में अस्पताल बेकार पड़ा है। सरकार द्वारा नेशनल मेडिकल कमीशन एनएमसी से लाख झूठ बोलने के बावजूद अस्पताल की ओपीडी में बमुश्किल बीस पच्चीस मरीज ही आते हैं, उनमें से भी अधिकतर को बीके रेफर कर दिया जाता है। आईपीडी तो है ही नहीं। एनएमसी की सख्ती के कारण बहुत प्रयासों के बाद इक्का दुक्का मरीज भर्ती दिखाए जाते हैं लेकिन फैकल्टी नहीं होने के कारण उन्हें भी रेफर ही किया जाता है। समझा जा सकता है कि जिस मेडिकल कॉलेज के अस्पताल की ओपीडी-आईपीडी ही नहीं चल रही हो तो वहां के छात्र कैसे डॉक्टर बनेंगे।
अगर इसी तरह पढ़ाई करानी है तो हर साल दस हजार क्या, पचास हजार सीटें बढ़ा दो क्या फर्क पड़ता है। जिस तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर घटता जा रहा है और सरकारी अस्पताल यहां तक कि छांयसा के अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज जैसी संस्थाएं मरीजों को रेफर करने के केंद्र बन कर रह गए हैं, उससे तो लगता है कि आने वाले सालों में डिग्री असली होगी लेकिन डॉक्टर नकली होंगे। नकली डॉक्टर पैदा करने का यह कोई एक अकेला मेडिकल कॉलेज नहीं है, देश भर में अनेकों सरकारी व गैर मेडिकल कॉलेज यही धंधा करने में जुटे हैं। लाखों करोड़ों रुपये प्रतिमाओं पर खर्च करने से बेहतर होता कि मोदी-शाह-सैनी की डबल इंजन सरकारें चिकित्सा सेवाओं के सुधार पर धन खर्च करतीं।
अमित शाह से पहले झूठ के पकोड़े बीते दस साल तक खट्टर मियां भी तलते रहे हैं, हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का ढोल खूबर जमकर पीटा, इस एवज में उन्होंने अनेकों जिलों में पंचायती जमीनों को मेडिकल कॉलेज के नाम पर कब्जा लिया। करनाल के कुटेल गांव में तो करीब —– एकड़ मेडिकल यूनिवर्सिटी के नाम पर भी लेकर कब्जा रखी है। इस पूरी कवायद के बावजूद इस वित्तीय वर्ष में हरियाणा सरकार ने भिवानी, नारनौल और जींद मेडिकल कॉलेज के नाम पर दस दस करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, लेकिन इसके साथ शर्त यह भी रख दी है कि इतनी बड़ी रकम एक साथ खर्च नहीं करनी चार तिमाहियों में करनी है। समझा जा सकता है कि हर तीन महीने बाद ढाई ढाई करोड़ रुपये खर्च करने से कोई मेडिकल कॉलेज कैसे चल पाएगा। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि इन्हें ये रकम पूरी मिलेगी भी या नहीं। सदंर्भवश सुधी पाठक जान लें कि हरियाणा सरकार द्वारा पहले से चलाए जा रहे रोहतक, खानपुर, करनाल और मेवात जैसे मेडिकल कॉलेजों में जरूरत का आधा स्टाफ भी मौजूद नहीं है, उपकरणों व दवाओं आदि की तो बात ही क्या है। स्नातकोत्तर (पीजी) पढ़ाई के मामले में रोहतक मेडिकल कॉलेज का काम कुछ हद तक संतोषजनक समझा जा सकता है बाकियों में यह भी न के बराबर है। और नायब सैनी अपना ढिंढोरा पीट सकें। सीटें तो बढ़ा दी गईं लेकिन छात्रों को पढ़ाने के लिए जिस अनुपात में फैकल्टी एवं अन्य सुविधाएं होनी चाहिए वह सरकार ने किसी भी मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध नहीं कराए हैं। प्रदेश में ठीक ठाक चलने वाले मेडिकल कॉलेज तो भाजपा से पहले वाली सरकारों के समय के हैं, बीते 11 साल में जितने भी मेडिकल कॉलेजों की घोषणा की गई उनमें से कोई शायद ही चल रहा है। केवल पंचायतों की जमीन पर सरकार ने कब्जा कर लिया है। बिना इमारत, स्टाफ वाले इन मेडिकल कॉलेजों में फिलहाल पांच छह साल तो पढ़ाई और चिकित्सा सेवाएं शुरू होते नजर नहीं आ रहीं।
हां, मेडिकल कॉलेजों के नाम पर डबल इंजन सरकारों ने मेडिकल शिक्षा कई गुणा महंगी कर दी। पढ़ाई हो या न हो लेकिन आठ लाख रुपये प्रतिवर्ष की दर से फीस वसूली जा रही है। छांयसा का बना बनाया मेडिकल कॉलेज भी सरकार नहीं चला सकी। यहां न शैक्षणिक स्टाफ है, न ही चिकित्सा सेवाओं से संबंधित आधारभूत ढांचा। फैकल्टी नहीं होने के कारण छात्रा मेडिकल के सभी विषयों की पढ़ाई ही नहीं कर पा रहे। इससे भी बड़ी बात इस मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा सेवाओं के अभाव में अस्पताल बेकार पड़ा है। सरकार द्वारा नेशनल मेडिकल कमीशन एनएमसी से लाख झूठ बोलने के बावजूद अस्पताल की ओपीडी में बमुश्किल बीस पच्चीस मरीज ही आते हैं, उनमें से भी अधिकतर को बीके रेफर कर दिया जाता है। आईपीडी तो है ही नहीं। एनएमसी की सख्ती के कारण बहुत प्रयासों के बाद इक्का दुक्का मरीज भर्ती दिखाए जाते हैं लेकिन फैकल्टी नहीं होने के कारण उन्हें भी रेफर ही किया जाता है। समझा जा सकता है कि जिस मेडिकल कॉलेज के अस्पताल की ओपीडी-आईपीडी ही नहीं चल रही हो तो वहां के छात्र कैसे डॉक्टर बनेंगे।
अमित शाह से पहले झूठ के पकोड़े बीते दस साल तक खट्टर मियां भी तलते रहे हैं, हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का ढोल खूबर जमकर पीटा, इस एवज में उन्होंने अनेकों जिलों में पंचायती जमीनों को मेडिकल कॉलेज के नाम पर कब्जा लिया। करनाल के कुटेल गांव में तो करीब 140 एकड़ मेडिकल यूनिवर्सिटी के नाम पर भी लेकर कब्जा रखी है। इस पूरी कवायद के बावजूद इस वित्तीय वर्ष में हरियाणा सरकार ने भिवानी, नारनौल और जींद मेडिकल कॉलेज के नाम पर दस दस करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, लेकिन इसके साथ शर्त यह भी रख दी है कि इतनी बड़ी रकम एक साथ खर्च नहीं करनी चार तिमाहियों में करनी है। समझा जा सकता है कि हर तीन महीने बाद ढाई ढाई करोड़ रुपये खर्च करने से कोई मेडिकल कॉलेज कैसे चल पाएगा। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि इन्हें ये रकम पूरी मिलेगी भी या नहीं। सदंर्भवश सुधी पाठक जान लें कि हरियाणा सरकार द्वारा पहले से चलाए जा रहे रोहतक, खानपुर, करनाल और मेवात जैसे मेडिकल कॉलेजों में जरूरत का आधा स्टाफ भी मौजूद नहीं है, उपकरणों व दवाओं आदि की तो बात ही क्या है। स्नातकोत्तर (पीजी) पढ़ाई के मामले में रोहतक मेडिकल कॉलेज का काम कुछ हद तक संतोषजनक समझा जा सकता है बाकियों में यह भी न के बराबर है।