क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा “सीमा क्षेत्रों में जनसंख्या संतुलन बिगड़ गया है. इससे राष्ट्रीय सुरक्षा का ख़तरा पैदा हो गया है. देश की एकता, अखंडता और विकास के सामने चुनौती पेश हो गई है…इसीलिए मैं, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से एक ‘उच्च-शक्ति प्राप्त, जनसांख्यिकीय मिशन (High Powered Demography Mission )’ के गठन का ऐलान करता हूँ. यह मिशन तय समय में, सुविचारित निश्चित रूप से, अपने कार्य को करेगा. उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं…”
हर राज्य ने, हर शहर में, बंगलादेशी घुसपैठिये ढूंढने के नाम पर, गऱीब मुस्लिम समाज पर जो हमला बोल रखा है, वह एक निश्चित योजना के तहत हो रहा है. गुडग़ांव के लाखों मुस्लिम मज़दूर, महीनों तक बेंतेहा ज़ुल्म झेलने के बाद, पश्चिम बंगाल भाग गए हैं. फऱीदाबाद से भी कुछ बंगाली मुस्लिम परिवार चुपचाप चले गए, बाद में पता चला. बिना ऐलान हुए ही, जब यह, ‘उच्च-शक्ति प्राप्त, जनसांख्यिकीय मिशन’ क़हर ढा रहा है, तब, कल विधिवत औपचारिक घोषणा के बाद क्या होगा, अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं. सरकार जानती है कि बेरोजग़ारी, मंहगाई का जो आलम है, और आने वाले वक़्त में, जिस तरह के ‘सुधार’ लाने के जो सरकारी मंसूबे हैं, मतलब आखऱी क़तरे तक, मज़दूरों का खून चूसने की जो आज़ादी लुटेरे पूंजीपतियों को दी जाने वाली है, उसके परिणामस्वरूप, समाज में आक्रोश का तूफ़ान कभी भी उठ सकता है. इन ‘राष्ट्रवादियों’ का असली चरित्र हर रोज़ नंगा होता जा रहा है. इनकी असलियत पहचानकर, लोग इतने तपे हुए हैं कि एक बार उठ खड़े हुए, तो, कॉर्पोरेट की निर्लज्ज ताबेदार, मोदी सरकार के किसी झांसे में नहीं आने वाले.
‘हिंदू ख़तरे में हैं’, समाज को हिंदू-मुस्लिम में दो-फाड़ करने के, कट्टरवादी, उन्मादी हिन्दुत्ववादी टोले के इस नारे को लोगों ने भले दो कौड़ी की कीमत नहीं दी. मस्जिदों के नीचे मंदिर के अवशेष ढूंढने के षडयंत्र के भी खऱीदार मौजूद नहीं हैं. जिन लोगों को, ये लोग, मूर्ख बनाकर सवारी गांठना चाहते थे , वे, हिंदू-मुस्लिम में बंटने को बिलकुल तैयार नहीं, लेकिन संघी टोला हार मानने वालों में से नहीं है. मेहनतक़श मज़दूरों को इकठ्ठा ना होने देने के लिए, सीमावर्ती क्षेत्रों, मंशा साफ़ है जम्मू-कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में, जनसंख्या अनुपात बदल गया है, अब यह एक नया ज़हरीला फ़तवा ज़ारी हुआ है. हाउसिंग सोसाइटी के एक ग्रुप में देखा जा सकता है कि इसके प्रचारक काम पर लगा दिए गए हैं.
‘वे’ तो अपना काम मुस्तैदी से कर रहे हैं, लेकिन हम, कब करना शुरू करेंगे? बातों को घुमा फिराकर नहीं, सीधे, दो-टूक कहने का वक़्त आ गया है. मुस्लिम समाज सीधा निशाने पर है. इसलिए गैर-मुस्लिम समाज की जि़म्मेदारी बहुत बढ़ गई है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का असली घिनौना इतिहास लोगों के सामने लाना, मनु स्मृति की महिला विरोधी, दलित विरोधी ज़हरीली बातों को लोगों को बताना, कॉर्पोरेट की मुंशीगिरी करने की, इन ‘राष्ट्रवादियों’ के असली फि़तरत का भंडाफोड़ करना, वैज्ञानिक तकऱ्पूर्ण विचारों का प्रचार-प्रसार, मनगढ़ंत पाखंडों, जैसे सुदर्शन चक्र से सूर्य की किरणों को सुदर्शन चक्र से रोक कर दिन को रात बना देना एक वाह्यात गपोड़ा है, बहुत ज़रूरी है. इस मिशन को, हम, ग़ैर-मुस्लिम समाज ने, ‘उच्च-शक्ति प्राप्त एकता मिशन’ बनाना होगा.
अभी भी हम लोग, समाज में अमन-चैन चाहने वाले, अन्याय-अत्याचार,शोषण-ज़ुल्म के खि़लाफ़, समाज को एकजुट करने वाले, मेजोरिटी में हैं और उन्मादी हिंदू फिरकापरस्त तादाद में बहुत कम हैं, लेकिन हम लोग परिस्थितियों के अनुरूप अपने को नहीं उठा पा रहे, यही वज़ह है कि संघी टोला समाज को अपनी मन-मंजूरी से हांकने की जुर्रत कर रहा है, वर्चस्व क़ायम कर रहा है. साथियो, मार्टिन निमोलर की यह कविता, जितनी हिटलर के वक़्त में सही थी, उतनी ही मौजूं आज भी है: पहले वे समाजवादियों के लिए आए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था. फिर वे ट्रेड यूनियनों के लिए आए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनवादी नहीं था. फिर वे यहूदियों के लिए आए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था. फिर वे मेरे लिए आए और तब तक मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं बचा था.