सरकार पहले भ्रष्टाचार कराती है फिर पकडऩे का नाटक करती है

सरकार पहले भ्रष्टाचार कराती है फिर पकडऩे का नाटक करती है
October 26 07:29 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
सरकार के किसी भी महकमे में बिना उसकी मर्जी के भ्रष्टाचार का होना सम्भव नहीं है। लेकिन जब उसका हल्ला मचता है तो मजबूरी में जांच का नाटक भी सरकार को करना पड़ता है। हाल ही में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर, स्कूलों में हुए एक घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। यह जांच ठीक वैसे ही साबित होने वाली है जैसे कि पानी में मथानी चलाने से कुछ नहीं निकलता।

मामला सिरसा जि़ले के कुछ प्राथमिक स्कूलों का है, वर्ष 2014-15 मेेंं बच्चों को खिलाए गए मिड-डे-मील, उन्हें दी गई पोशाकें व कॉपी-किताब आदि के नाम पर हुए घोटाले से सम्बन्धित है। यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या दिखाने के लिए फर्जी नाम लिख लिए जाते हैं। इसका बड़ा कारण इन स्कूलों की घटती गुणवत्ता के चलते, थोड़े से भी सम्पन्न परिवार अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिल कराने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप सरकारी शिक्षकों की नौकरी पर बन आती है, जाहिर है कि जिस स्कूल में बच्चे ही नहीं होंगे तो वहां मास्टर जी क्या करेंगे? ऐसे में उनका तबादला कर दिया जाएगा, पोस्टें घटा दी जाएंगी। इससे बचने के लिए यह सारा फर्जीवाड़ा किया जाता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2014-15 में राज्य भर में दिखाए गए 22 लाख स्कूली छात्रों में से चार लाख $फर्जी पाए गए थे। स्कूलों में दिखाए गए हाजिरी के अनुसार ही मिड-डे-मील व पोशाकों आदि का खर्चा भी दिखाया जाता है। जब हाजिरी ही $फर्जी हो तो दिखाए गए खर्चे में भी तो फर्जीवाड़ा होना जरूरी है। यह सम्भव नहीं है कि किसी जिले के स्कूलों में यह फजीवाड़ा हो रहा हो और वहां बैठे सरकारी अधिकारियों को पता भी न चले। उन्हें सब कुछ पता चलता है, लेकिन घूसखोरी एवं राजनीतिक दबावों के चलते सम्बन्धित अधिकारी देखते हुए भी अंधे बने रहते हैं।

सिरसा जि़ले के कुछ जागरूक लोगों ने अंधे बने रहने की बजाय इन मामले को पहले सरकार के सामने उठाया, बात नहीं बनने पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में इस बाबत याचिका दायर की। इसकी सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी। इस सारी कार्रवाई में 10 वर्ष से अधिक का समय बीत गया अब सीबीआई वाले पहले तो उस समय के सम्बन्धित शिक्षकों को ढूंढते हैं और फिर उनके पढ़ाए हुए उन छात्रों को तलाशते हैं कि जिन पर उक्त तमाम खर्चे किए गए थे।

अब समझने वाली बात यह है कि जो बच्चे उस वक्त 10-12 साल के रहे होंगे वे अब 20-22 की आयु पार कर चुके होंगे। लड़कियां ब्याही जा कर अपनी ससुरालों में पहुंच गईं होंगी, लड़के कहीं न कहीं अपने काम-धंधों पर जा लगे होंगे और जो उपलब्ध भी होंगे वे भी अब दाढ़ी-मूंछ वाले होने के साथ-साथ इक्का-दुक्का बच्चे के बाप भी बन चुके होंगे। जाहिर है कि ऐसे में इस जांच का कोई भी परिणाम निकलना सम्भव नहीं।

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