फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) अनोखी योजनाएं बना, जनता की आखों में धूल झोंक कर करोड़ों रुपयों की बंदरबांट करने वाले एफएमडीए के अधिकारी अब यमुना किनारे पचास तलाब बनाने जा रहे हैं। बे सिर पैर की इस योजना के फायदे गिना रहे हैं कि इससे जल संरक्षण होगा और शहर की जनता को पानी मिलेगा। छोटे से छोटे काम के लिए कई लाख के प्रोजेक्ट बनाने में माहिर एफएमडीए के अधिकारियों ने हालांकि अभी इस योजना का खर्च नहीं बताया है लेकिन अनुमान पैंतीस से चालीस करोड़ रुपयों का लगाया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट को स्वीकृति के लिए सरकार के पास भेजा गया है, फिलहाल सर्वे शुरू करा दिया गया है।
शहर में गिरते भूजल को सुधारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2024 में अमृत सरोवर का जुमला उछाला था। इसके तहत जिले में मृत प्राय 75 तालाबों को पुनर्जीवित करना था। सवा साल से अधिक बीत चुका है करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद एक भी तालाब में पानी नहीं भर सका है। सेक्टर 55 में कुम्हारों का तालाब, अजरौंदा गांव का तालाब, बराही तालाब की तरह 76 तालाबों का अस्तित्व ही लुप्तप्राय हो गया है। ऐसे में जुमलेबाज प्रधानमंत्री के अमृत सरोवर के पाखंड को साकार करने का ठेका एफएमडीए के हरामखोरी में माहिर अधिकारियों ने लिया है।
प्राकृतिक तालाबों को पुनर्जीवित करने में बहुत पैसा, मेहनत और कौशल खर्च करना पड़ता है, इसलिए अधिकारियों को ये किसी भी तरह फायदे का सौदा नहीं लगा। कम मेहनत और बिना कौशल के ही तालाब तैयार करने के लिए यमुना नदी का किनारा खोजा गया। यह सर्वविदित है कि नदी के डूब क्षेत्र में आने वाले इलाके में भूजल कुछ फीट या मीटर पर ही प्रकट हो जाता है, नदी का तल घटने बढऩे के साथ भूजल का स्तर भी घटता बढ़ता है। पर्यावरणविदों की मानें तो नदी किनारे खोदे जाने वाले कुंओं या तालाब में भूजल नहीं होता बल्कि जमीन के नीचे बह रही नदी का ही पानी होता है। इन कुओं या तालाबों के पानी को जल संभरण या संरक्षण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए ये तो प्राकृतिक बहाव वाले क्षेत्र में आते हैं।
एफएमडीए के आंकड़ों के अनुसार यमुना नदी पर 22 रैनीवेल लगाए गए हैं, एक रैनीवेल की क्षमता एक करोड़ लीटर यानी (दस एमएलडी) प्रतिदिन है। इसके अलावा 1700 ट्यूबवेल हैं जो प्रति मिनट 45 लीटर जलदोहन करते हैं। अधिकारी खुद ही बताते हैं कि गर्मियों में यमुना नदी का जलस्तर घट जाता है और नदी में बनाए गए रैनीवेल की क्षमता भी कम हो जाती है। ऐसे में नदी से दूर बनाए गए तालाबों में पानी बना रहेगा यह कहना मुश्किल है, क्योंकि इन तालाबों का पानी भी नदी के जलस्तर पर निर्भर होगा तो नदी के सूखने से ये भी सूख जाएंगे, बाढ़ आने पर डूब क्षेत्र में होने के कारण जलमग्न हो जाएंगे या बहकर खत्म हो जाएंगे।
अधिकारियों का यह तर्क इन तालाबों में बाढ़ का पानी संरक्षित किया जाएगा पर्यावरणविद हास्यास्पद बता रहे हैं, उनका कहना है कि यदि ये डूब क्षेत्र में बनाए गए तो बाढ़ आने के साथ ही खत्म हो जाएंगे। यानी यमुना के किनारे तालाब बनाने की योजना जनता की गाढ़ी कमाई पानी में बहाने की योजना ही है। अधिकारी यह भी दावा करते हैं कि इन तालाबों का इस्तेमाल पेयजल आपूिर्त के लिए किया जाएगा। लेकिन यह आकलन नहीं किया गया है कि एक तालाब की जल धारण क्षमता कितनी होगी, यदि उससे आपूर्ति की गई तो उसके पुनर्भरण में कितना समय लगेगा। गर्मी में पानी कम होने पर उन्हें कैसे भरा जाएगा और बाढ़ की हालत में उनका कैसे प्रबंध किया जाएगा। नदी के किनारे तो वैसे भी भूजल स्तर ऊंचा रहता है, इसके आसपास तालाब बनाने से जल संरक्षण के नाम पर बेईमानी ही होगी। वर्षा जल का संरक्षण करने वाले जलायश को ही सही मायने में तालाब कहा जा सकता है। ये प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकते हैं। एफएमडीए को यदि पचास तालाब बनाने ही हैं तो जिले में सूख चुके, अवैध कब्जा किए गए, भरान कर आबादी के नीचे दबा दिए गए प्राकृतिक तालाबों की पहचान कर उनको पुनर्जीवित करे, इससे गिरते भूजल स्तर में सुधार होगा, पर्यावरण संरक्षण भी होगा और ईको सिस्टम भी मजबूत होगा।