फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ईएसआई कॉर्पोरेशन द्वारा संचालित अस्पतालों में से बेहतरीन कार्य-कुशलता वाले एनएच तीन स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर एक अगस्त की शाम को मंत्री जी का छापा पड़ा। केन्द्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया पूरे ताम-झाम के साथ शाम करीब चार बजे संस्थान में आ धमके। मंत्री जी तो कुछ समय अस्पताल में घूम-फिर कर वापस लौट गए लेकिन उनकी छोड़ी हुई तीन सदस्यीय टीम खबर लिखे जाने तक संस्थान में ही डटी हुई है। पूछताछ करने पर संस्थान का कोई भी अधिकारी कुछ भी जानकारी देने को तैयार नहीं। डीन डॉ. एके पांडे का कहना है कि यह कोई छापेमारी नहीं है। कॉर्पोरेशन के अधिकारी जब चाहें संस्थान के काम-काज एवं स्टोर आदि का निरीक्षण कर सकते हैं, सो वही काम किया जा रहा है। डीन ने तो इतना कह कर पल्ला झाड़ लिया परन्तु इससे कोई असली बात सामने नहीं आ रही।
सूत्रों से पूछताछ करने पर पता चला कि मंत्री के साथ आई तीन सदस्यीय टीम में एक इंश्योरेंश कमिश्नर, एक मेडिकल सुपरिंटेंडेंट व एक ज्वाइंट डायरेक्टर हैं। यह एक प्रकार से कॉर्पोरेशन की विजीलेंस टीम कहलाती है। किसी भी संस्थान का वार्षिक ऑडिट होना कोई नई बात नहीं होती परन्तु यह टीम बीते कई वर्षों के बही-खाते खंगाल रही है, जो सामान्य बात नहीं है। इसमें सर्वाधिक फोकस स्टोर में हुई खरीदारी, विशेष कर उपकरणों की खरीदारी सम्बन्धी फाइलों को खंगालने पर है। फाइलों के साथ-साथ उपकरणों की खरीद से उस वक्त जुड़े फार्मासिस्ट रवि को भी तलब कर लिया गया है, जो इस वक्त गुडग़ाव में तैनात हैं।
देश भर में कॉर्पोरेशन के 45 अस्पताल व 10 मंडिकल कॉलेजों के अलावा अनेकों छोटे-बड़े कार्यालयों में इन सब के नियमित ऑडिट होना सामान्य बात होती है, परन्तु स्वयं मंत्री द्वारा इस तरह से अचानक कोई छापेमारी करना सामान्य परिघटना नहीं है। अधिकारियों द्वारा इस बाबत कोई अधिकृत बयान न दिए जाने के चलते तरह-तरह के कयास व चर्चाओं का बाजार गर्म है। इनके अनुसार पूर्व डीन डॉ. असीम दास को किसी तरह लपेटे में लेने के लिए यह सब तमाशा किया जा रहा है। विदित है कि मुख्यालय में बैठे धूर्त एवं हरामखोर कमिश्नरों के न चाहते हुए भी डॉ. असीम दास ने सन 2015 में कॉलेज चालू कराने में सफलता प्राप्त कर ली थी। वे यहीं नहीं रुके, संस्थान की प्रगति में कदम दर कदम आगे बढ़ते ही चले गए। कभी किसी डीजी तो कभी किसी मेहरबान श्रम सचिव तो कभी कदरदान मंत्री के सहयोग से अस्पताल को नई-नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते रहे।
यह डॉक्टर असीम दास का ही करिश्मा था कि यहां कैथलैब लगी और कॉर्डियोलॉजी विभाग ने सैंकड़ों मरीजों के हृदय रोगों का सफल इलाज किया। जो बोनमैरो ट्रांस्पलांटेशन (बीएमटी) उस वक्त दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भी नहंी होता था, यहां सफलता पूर्वक होने लगा। जिस नेफ्रोलॉजी विभाग के डायलिसिस कार्य-क्रम को मुख्यालय ने ठेके पर दे दिया था, उसे डॉक्टर दास ने सीधे संस्थान के नियत्रण में ले लिया। मुख्यालय द्वारा बनाई गई स्टा$फ की भयंकर कमी के बावजूद किडनी प्रत्यारोपण जैसा करिश्मा यहां करके दिखाया। अपर्याप्त स्टाफ के बावजूद 70-80 मरीजों का डायलिसिस प्रति दिन किया। ब्लड बैंक व आई बैंक स्थापित करके अनेकों मरीजों का कॉर्निया प्रत्यारोपण कराया।
उनके उत्कृष्ट कामों में से ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। उनके पुरजोर प्रयासों के चलते यहां 18 विषयों में पीजी (स्नातकोत्तर) कोर्स शुरू किए गए। इतना ही नहीं सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट की पढ़ाई के लिए पोस्ट पीजी यानी कि स्नातकोत्तर से भी ऊपर के कोर्स डीएम व एमसीएच शुरू कराए। गौरतलब है कि ये सारे काम उन्होंने मुख्यालय में बैठे उन धूर्त एवं हरामखोर अफसरों की मौजूदगी में किए जो इस मेडिकल कॉलेज को चलने ही लोग बिरयानी खा रहे थे वहां पर कम से कम आधा दर्जन होमगार्ड और पुलिसकर्मी ट्रैफिक के नाम पर तैनात रहते हैं। बेशक वे ट्रैफिक के है लेकिन हैं तो पुलिस, गुंडों ने इस पुलिस का भी खौफ नहीं समझा, और समझें भी क्यों जब पुलिस वाले ही ऐसे में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते हों। ट्रैफिक पुलिस को और तो क्या करना था संबंधित सेक्टर 11 पुलिस चौकी को भी सूचित करने की जरूरत न समझी।
लोगों से सूचना मिलने पर हृतिक के परिजन मौके पर पहुंच गए। आनन फानन उसको उठा कर बीके अस्पताल ले गए। उसकी जान लेने पर आमादा दिनेश कउवा और उसके साथी पहले ही बीके अस्पताल में डेरा जमाए थे, उन्हें इस बात का भी खौफ नहीं था कि वहां बाकायदा पुलिस चौकी कायम है, लेकिन फिर वही बात, खौफ क्यों हो जब पुलिस वाले तमाशबीन की भूमिका ही निभाते रहें। समय की मांग थी कि वहां तैनात पुलिसकर्मी हरकत में आते और उन हथियारबंद गुंडों के खिलाफ उचित कार्रवाई करते, जो उन्होंने नहीं की।
इन लोगों ने पिता चंदरपाल को धमकाया कि यहां हृतिक का इलाज नहीं होने देंगे न एमएलआर बनने देंगे। इस अराजक स्थिति में बीके अस्पताल के डॉक्टरों ने भी पीडि़त के प्रति कोई स्टैंड लेने की जरूरत नहीं समझी। मजबूर होकर चंदरपाल ने 112 पर कॉल की। थोड़ी देर बाद राइडर पर दो पुलिसकर्मी आए और दबंगों पर सख्त होने के बजाय उल्टा चंदरपाल को समझाया कि यहां खतरा है इसलिए बेटे को किसी नर्सिंग होम ले जाओ। पुलिस केस होने के कारण बीके अस्पताल में इंट्री होना और एमएलआर कटना जरूरी था, इसलिए चंदरपाल ने इमरजेंसी में बेटे को भर्ती कराना चाहा लेकिन डॉक्टरों ने जान छुड़ाने के लिए उसे भगा दिया। लहूलुहान हृतिक को चिमनीबाई चौक के पास स्थित दून अस्पताल में भर्ती कराया। 112 राइडर वाले सलाह देकर ऐसे चलते बने, मानो उनके लिए दबंगों द्वारा हथियार लेकर घूमना आम बात हो। पुलिस की इसी कार्यशैली से आम जनता में उसकी छवि निकम्मे और खाऊ विभाग की होने नहीं देना चाहते थे।
डॉक्टर दास ने उनकी मर्जी के विरुद्ध न केवल इस कॉलेज को चला दिया बल्कि उन ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया जिसकी वे कभी कल्पना तक नहीं कर सकते थे। और बेशर्म इतने कि इलाज के लिए यहां जब तब आ पड़ते हैं। अनेकों मंत्री व उनके परिजनों तथा बीजी आदि भी यहां इलाज के लिए आते रहे हैं। डॉक्टर दास द्वारा शुरू कराई गई सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट सेवाओं के लिए जिस ट्रेंड स्टाफ की आवश्यकता होती है वह शायद आज तक भी इस संस्थान को उपलब्ध नहीं कराया गया है। जाहिर है कि मुख्यालय डॉक्टर दास को हतोत्साहित करना चाहता था। अतिरिक्त सेवाएं शुरू होने के चलते यहां पर न केवल दिल्ली, नोएडा, हरियाणा व अन्य राज्योंं से भी बड़ी संख्या में मरीज आने लगे। इसके चलते 500 बेड के इस अस्पताल में दाखिल मरीजों की संख्या 900 से 1000 तक पहुंचने लगी। इसका दुष्प्रभाव मरीजों पर भीड़ बढऩे के रूप में पडऩे लगा। मुख्यालय इसका समाधान करने की अपेक्षा तमाशबीन बना रहा।
सुपरस्पेशलिटी सेवाओं के लिए जिन सुपरस्पेशलिस्ट डॉक्टरों की आवश्यकता होती है उनकी तैनाती में मुख्यालय की अड़ंगेबाजी को देखते हुए डॉक्टर दास ने सीधे तौर पर श्रम सचिव से स्वीकृति लेकर पार्ट टाइम डॉक्टरों का जुगाड़ बनाया। इन अति विशिष्ट डॉक्टरों को मुख्यालय द्वारा प्रस्तावित प्रति केस के हिसाब से पेमेंट करने का रास्ता अपनाया गया। इससे ये डॉक्टर ईएसआई में काम करने के साथ-साथ अन्य अस्पतालों में भी काम कर सकते थे। इन्हीं विशिष्ट डॉक्टरों के बूते यहां पर डीएम व एमसीएच के कोर्स भी चालू कर दिए गए थे। इससे कॉर्पोरेशन का वह करोड़ों रुपया बच सका जो रेफरल बिलों के भुगतान पर देना पड़ता। कुल मिला कर मुख्यालय के न चाहते हुए डॉक्टर दास द्वारा की गई यह एक अच्छी जुगाड़बाजी थी जो ईएसआई मेें पहली बार हुई थी। इन सब बातों से चिढ़े बैठे मुख्यालय वाले डॉक्टर दास से बदला लेने के लिए यह सब ड्रामेबाजी कर रहे हैं।
इस संस्थान की कार्यकुशलता एवं शोहरत को देखते हुए अनेकों कम्पनियों ने इसे करोड़ों रुपए के उपकरण सीएसआर योजना के तहत दान में दिए हैं। ये सभी उपकरण डॉक्टर दास ने मुख्यालय के संज्ञान में लाकर विधिवत ढंग से स्वीकार किए हुए हैं। इसके बावजूद भी धूर्त अधिकारी इन उपकरणों के लिए जाने में भ्रष्टाचार ढूंढ रहे हैं। संदर्भवश समझने वाली बात यह भी है कि कॉर्पोरेशन के अन्य किसी भी अस्पताल को, किसी कम्पनी ने सीएसआर फंड से कोई उपकरण उपलब्ध नहीं कराया। हाल फिलहाल में दिल्ली के कुछ अस्पतालों में दान लेने के लिए फरीदाबाद द्वारा स्थापित कार्यशैली का सहारा लेना पड़ रहा है। मुख्यालय की नाक के नीचे चलने वाले बसई दारापुर पीजी मेडिकल कॉलेज को आज तक किसी ने कोई सुई भी दान दी है क्या? मंत्री जी झोला उठा कर जिस बढिय़ा काम करने वाले मेडिकल कॉलेज में आ धमके क्या उन्हें बसई दारापुर का वह मेडिकल कॉलेज अस्पताल नहीं दिखता, जिसका बेड़ा गर्क मुख्यालय में बैठे इन कमिश्नरों ने कर दिया?