एडीजीपी आत्महत्या : शेरनी बन गई भीगी बिल्ली

एडीजीपी आत्महत्या : शेरनी बन गई भीगी बिल्ली
October 25 05:16 2025

एएसआई संदीप लाठर के सुसाईड नोट से आरोपियों पर अपराध नहीं बनता लेकिन इस एफआईआर से समकीरण बदल गये
मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
रोहतक रेंज के एडीजीपी रह चुके वाई पूरन कुमार ने दिनांक सात अक्टूबर को चंडीगढ़ स्थित अपने घर में गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। लैपटॉप पर लिखे आठ पेज के सुसाइड नोट में उन्होंने 15 से अधिक आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को इसके लिए दोषी ठहराते हुए तत्कालिक दोषी एसपी रोहतक व डीजीपी को बनाया। उनका कहना था कि उन्हें जाति के आधार पर प्रताडि़त व अपमानित किया जाता रहा और जब सह पाने की क्षमता समाप्त हो गई तो वे आत्महत्या कर रहे हैं। मृत्यु उपरांत तुरंत जापान से लौटी उनकी वरिष्ठ आईएएस पत्नी परनीत कुमार व उनके विधायक भाई अमित रतन ने इस कांड को लेकर एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया। विदित है कि इन दोनों बहन-भाइयों के पिता, कांग्रेस राज में गृहमंत्री रह चुके बूटा सिंह थे। बहन-भाई की मांग थी कि रोहतक के एसपी तथा राज्य के डीजीपी को तुरन्त बरखास्त करके गिरफ्तार करने के साथ-साथ उन सब अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए जिनके द्वारा अपमानित व प्रताडि़त किए जाने से दुखी होकर पूरन कुमार ने आत्महत्या की थी। इन मांगों के पूरा होने से पहले उन्होंने शव का पोस्टर्माटम कराने से मना कर दिया। ऐसे मौके पर, हमेशा की तरह विपक्षी नेता राजनीतिक नौटंकी करने पहुंच जाते हैं। उन्हें केवल एक जातीय वोट बैंक नजर आता है जो वास्तव में इस तरह की नौटंकियों से प्रभावित नहीं होता। मीडिया का एक बड़ा भाग भी गहराई से सच्चाई खोजने की बजाय सतही प्रोपेगेंडे के आधार पर खबरे परोसने लगता है।

इन परिस्थितियों से विचलित होकर रोहतक पुलिस के साइबर सेल में तैनात एएसआई संदीप लाठर ने तीन पेज का एक सुसाइड नोट लिखने के साथ-साथ एक वीडियो भी बनाकर 13 अक्टूबर को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। अपने आप को शहीद भगत सिंह का अनुयायी बताते हुए लाठर ने एडीजीपी व उनकी पत्नी पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह निहायत ही रिश्वतखोर तथा जाति प्रस्त होने के साथ-साथ महिला मातहतों का शोषण भी करता था। लाठर के अनुसार पूरन कुमार ने रोहतक रेंज कार्यालय में बैठते ही जाति विशेष के कर्मचारियों को दफ्तर से बाहर तथा अपनी जाति के लोगों को दफ्तर में तैनात किया। इनकी मदद से उसने चुन-चुन कर मातहतों की फाइलों में कमियां निकाल कर उन्हें दंडित करना अथवा उसके बदले रिश्वतें लेना शुरू कर दिया।

इस आत्महत्या से दिवंगत पूरन की पत्नी इतने दबाव में आ गई कि अपनी सारी मांगे छोड़ पोस्टमार्टम व शव का क्रियाक्रम करने को राजी हो गई। अपने सुसाइड नोट में लाठर जिस प्रकार अपने सजातीय एसपी की प्रशंसा कर रहे हैं उससे प्रतीत होता है कि पुलिस बल में जातीय ज़हर का$फी गहराई तक उतर चुका है। पूरन द्वारा लगाए गए आरोपों से लाठर ने अपने जातीय मान-सम्मान को इस हद तक गिरता पाया कि उसको बचाने के लिए उसने अपना बलिदान देना ही बेहतर समझा। इसके लिए कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि लाठर को एसपी ने ही प्रेरित किया होगा। वैसे भी एक एएसआई द्वारा अपने एसपी और डीजीपी को किसी प्रकार के प्रशंसनीय प्रमाणपत्र देने वाली बात गले उतरती नहीं। अपने एसपी के साथ-साथ जिस डीजीपी कपूर को वे ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे रहे हैं उनकी पोल-पट्टी खोलने वाला वीडियो भी वायरल हो चुका है। जिसमें उनकी जायदादों का अच्छा-खासा वर्णन है।

लाठर द्वारा जारी वीडियो को गौर से देखने पर पता चलता है कि उस समय वह अकेले नहीं थे, कोई न कोई इनके साथ वीडियो बनाने में सहायता कर रहा था, फिर उसका यकायक गायब हो जाना सारी कहानी को संदेहास्पद बनाता है। वीडियो में कहे गए तथा नोट मेें लिखे गए शब्द किसी भी तरह से पूरन कुमार, उनकी पत्नी, उनके गनमैन सुशील व एक अन्य को आरोपी नहीं बनाते। बेशक न बनाते हो, यह अब एक प्रथा बन चुकी है कि एक बार मुकदमा तो दर्ज कर ही दो बाकी बाद में देखा जाएगा। कोर्ट से बरी होने तक की प्रक्रिया में जो वह भुगत लेगा वही क्या कम सजा होती है? इस सारे खेल में असली मुद्दा जिस दलित उत्पीडऩ को बनाया जा रहा है वह तो है ही नहीं। असल मुद्दा तो लूट कमाई के अधिकार का है समझने वाली बात यह है कि जब किसी दलित को पुलिस का सिपाही बना कर उसके हाथ में बंदूक व कानून की ताकत दे दी जाती है तो वह काहे का दलित, वह तो राजसत्ता का एक अंग बन जाता है। यहां तो पुलिस का एडीजीपी अपने आप को दलित के रूप में पेश कर रहा है। ऐसे पदासीन व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह न केवल अपने सजातीय बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी उत्पीडऩ से बचाए।

विदित है कि अन्य विभागों की भांति पुलिस में भी 20-22 प्रतिशत अधिकारी दलित वर्ग से आते हैं। हरियाणा पुलिस के इतिहास में इससे पहले किसी भी अधिकारी को जाति के नाम पर प्रताडि़त करने का कोई मामला सामने नहीं आया। हां, जब भी कोई छोटा या बड़ा अधिकारी रिश्वतखोरी, अनुशासनहीनता अथवा अपने निकम्मेपन के कारण पकड़ में आता है तो वह जरूर अपने बचाव के लिए जाति का सहारा लेता है। इस तरह का सहारा कोई एक जाति नहीं सभी जातियों के अधिकारी लेते हैं। खासतौर पर, जब सजा देने वाला उच्चाधिकारी उसकी जाति का न हो। नि:संदेह अन्य महकमों की भांति पुलिस में भी भ्रष्टाचार की खुली गंगा बह रही है। इसमें लगभग हर अधिकारी अपनी क्षमता, योग्यता एवं कलाकारी के बल पर जी भर कर लूट कमाई करता है। इसके लिए उसे अपने उच्चाधिकारियों के साथ-साथ राजनेताओं तथा समाज के विशिष्ठ वर्गों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं। दूसरी ओर अपने मातहतों के ऊपर अपनी योग्यता एवं कमांडिंग अथॉरिटी का दबाव बना कर रखना होता है।
वाई पूरन कुमार में ये दोनों ही योग्यताएं नहीं थी। वे न तो अपने उच्चाधिकारियों, राजनेताओं तथा समाज के विशिष्ठ लोगों से अपने सम्बन्ध विकसित कर सके और न ही अपने आधीन अधिकारियों पर अपनी योग्यता की कोई धाक जमा सके। उनकी यह कमजोरी इसी मामले से स्पष्ट हो जाती है जब उनका गनमैन शराब के ठेकेदार से ढ़ाई लाख रुपए देने के लिए बार-बार कहता है। यदि पूरन कुमार में काम की समझ एवं योग्यता होती तो उसे किसी से रिश्वत मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। इस पद पर तैनात अ$फसर के पास इतना अधिकार होते हैं कि उसके दिखावे मात्र से रिश्वत देने वाला खुद चलकर आता है। इस बात की समझ शायद दिवंगत पूरन कुमार को नहीं थी। बहरहाल इस महकमे में अब जातीय जहर काफी गहराई तक पहुंचा दिया गया है। जिस जातीय विभाजन का प्रयास भाजपा सरकार 11 वर्षों से कर रही थी वह अब सफलता की और पहुंचता दिख रहा है। यद्यपि अधिकांश सुलझे हुए पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी इस ज़हर को समाप्त करने का प्रयास कर रहें हैं, फिर भी जो आग भड़काई गई है वह इतनी आसानी से तो बुझने वाली है नहीं। अभी एएसआई लाठर ने दिवंगत पूरन कुमार पर जो आरोप लगाए हैं उनके विस्तृृत विवरण, उनसे सम्बन्धित झूठी-सच्ची कहानियां सामने लाई जाएंगी। महिला यौन शोषण का जो आरोप लगाया गया है, उसे लेकर भी कुछ सच्ची तो कुछ झूठी कहानियां प्रसारित करके पूरन कुमार का चरित्र हनन किया जाएगा।

तथाकथित ईमानदार डीजीपी
राजीव वत्स
आप लोगों को याद होगा एचपीएससी वाला अटैची कांड जिसमें एचपीएससी के डिप्टी सेक्रेट्री अनिल नागर डेंटल सर्जन और एचसीएस भर्ती में हेराफेरी करने के लिए नोटों की भरी अटैची के साथ पकड़े गए थे। उस समय डीजीपी शत्रुजीत कपूर विजिलेंस के चीफ थे। मामले की पूरी जांच इनके हाथ में थी। बहुत सी खबरें आई कि जांच की आंच सीएमओ के तत्कालीन अधिकारियों तक पहुंच रही थी। हुड्डा साहब ने बाकायदा एक व्हाट्सएप चैट विधानसभा में जारी की जिसके अनुसार एचपीएससी चेयरमैन आलोक वर्मा और बाकी बड़े लोग भर्तियों के घोटाले में कथित रूप से शामिल थे। मामला ठंडा होने दिया गया। पूरे मामले पर लीपापोती कर दी गई। पेपर कंडक्ट करने वाली एजेंसी का मालिक, सीएमओ के अधिकारी, एचपीएससी चेयरमैन और बाकी मेंबर्स, एचपीएससी का स्टाफ तथा सरकार के लोग? शत्रुजीत कपूर साहब की विजिलेंस ने पूरे मामले को स्रद्बद्यह्वह्लद्ग करके अकेले अनिल नागर और एक दो चट्टे बट्टे टाइप बिचौलियों को बलि का बकरा बनाकर मामला साफ कर दिया। इसके बाद ना हुड्डा साहब ने कभी कोई सवाल किया, ना उस कथित व्हाट्सएप चैट की कोई बात उठाई और ना ही किसी भर्ती एक्टिविस्ट ने कभी कोई सवाल किया। आज जब ये बहस चल रही है कि कौन ईमानदार और कौन बेईमान तब ये पूरा घटनाक्रम मुझे याद आ गया।

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Mazdoor Morcha
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