मज़दूर पक्ष ने दिया जोरदार झटका
फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीमाकृत मज़दूरों की चिकित्सा सम्बन्धी शिकायतें सुनने एवं समझने के लिए डीन की अध्यक्षता में हर माह सुविधा समागम आयोजित करने की परम्परा है। बीते कुछ दिनों से मची उथल-पुथल एवं मरीजों के अधिकारों में होने वाली कटौती से मुंह छिपाने के लिए संस्थान ने इस परम्परा को ही त्यागना चाहा था। इसके विरोध में रीजनल बोर्ड के सदस्य कॉमरेड बेचू गिरी ने जब डीन को पत्र लिखा तो 23 अक्टूबर को समागम बुलाया गया।
डीन की अनुपस्थिति में अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक (एमएस)डॉ. संदीप की अध्यक्षता में इसकी कार्रवाई सम्पन्न हुई। इस बैठक में अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी तथा सम्बन्धित डॉक्टर उपस्थित रहते हैं। दूसरी ओर मज़दूरों के प्रतिनिधियों के अलावा फैक्टरी मालिकान की ओर से भी इक्का-दुक्का प्रतिनिधि आ जाता है। इस बार का समागम विशेष रूप से धमाकेदार रहा क्योंकि बीते दो-तीन माह से कॉर्पोरेशन के इशारों पर डीन ने यहां का$फी गदर मचा रखा है। उसी की शिकायत से मुंह छिपाने के लिए इस समागम को टाला जा रहा था।
समागम में कॉमरेड बेचू गिरी के अलावा एस्कॉर्ट यूनियन के पूर्व प्रधान एवं नवनियुक्त रीजनल बोर्ड के सदस्य वजीर डागर ने जम कर बल्लेबाजी करी। इन्होंने प्रशासन से पूछा कि डायलिसिस वाले मरीजों को लगने वाला आवश्यक इंजेक्शन अस्पताल खुद न लगा कर उनको बाजार से खरीदकर लाने के लिए कैसे कह सकता है? डे-केयर में भर्ती होने वाले मरीजों का भोजन क्यों बंद कर दिया गया? बिस्तरों पर बिछाने वाली चादर व ओढऩे वाला कम्बल मरीज़ों को घर से लाने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? इसके जवाब में बेशर्मी के साथ नवनियुक्त एक सहायक निदेशक (एडी)ने कहा कि उन्हें तो इन सब बातों का पता ही नहीं। बगल में बैंठे एमएस यह जवाब सुनकर चुप बैठे रहे। लानत है ऐसे प्रशासन को जो आदेश जारी करने के बाद उनके प्रति अनभिज्ञता जताए।
कैंसर मरीजों को यहां से दवाई देने की बजाय उन्हें डिस्पेंसरियों की ओर क्यों धकेला जा रहा है? इसके जवाब में अपनी अधूरी कानूनी योग्यता का प्रदर्शन करते हुए एडी ने कहा कि दवाई देना डिस्पेंसरियों का काम है। इसके जवाब में बेचू गिरी ने तुरन्त कहा कि सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट का दायित्व पूर्णतया कॉर्पोरेशन पर है। यदि उन्हें इसका ज्ञान नहीं है तो वे 2008 में कॉर्पोरेशन द्वारा जारी सर्कुलर को देख लें। इस बाबत सात जुलाई 2008 को हुई कारपोरेशन की बैठक में यह एतिहासिक फैसला लिया गया था। विदित है कि बीते तीन-चार माह से कैंसर का इलाज लगभग पूरी तरह से इसलिए ठप कर दिया गया है ताकि कॉर्पोरेशन महंगी दवाइयों पर होने वाला खर्च बचा सके।
मज़दूर पक्ष द्वारा विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के प्रश्न पर एडी ने बताया कि वे शीघ्र ही नए डॉक्टर भर्ती करने जा रहे हैं। गौरतलब है कि बीते कुछ माह पहले तक यहां लगभग सभी तरह के विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध थे जिन्हें नए डीन ने भगा दिया क्योंकि उन्हें वेतन देना कॉर्पोरेशन को भारी पड़ रहा था। अब बदले में जो और जैसे डॉक्टर आएंगे समय ही बताएगा। अगर ऐसे ही विशेषज्ञ डॉक्टर लाने वाले थे तो पहले वाले समर्पित डॉक्टर ही क्या बुरे थे? एडी की तरफ से जब यह बताया गया कि कंसल्टेंट डॉक्टरों को प्रति मरीज देखने के हिसाब से लाने की योजना है। इस पर बेचू गिरि ने पूछा कि कंसल्टेंसी लेने के बाद मरीज कहां जाएगा? इलाज के लिए उसे कहां भर्ती कराया जाएगा? इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था। जाहिर है वे रेफरल बढ़ाने की बात कहने से बच रहे थे।
संक्षिप्त में प्रशासन की ओर से, जान छुड़ाने के अंदाज में कहा गया कि आने वाले तीन महीनों में सब कुछ ठीक हो जाएगा। इस पर सवाल यह उठा कि तीन महीने तक मरीज क्या करेंगे? अभी मरीज़ को देखने वाला डॉक्टर कोई विशेष टेस्ट अथवा दवाई लिख देता है तो उसकी विशेष स्वीकृति के लिए उसे एचओडी को तलाशने के लिए धक्के खाने पड़ते हैं। यदि एचओडी ने ही स्वीकृति देनी है तो मरीजों को देखने का काम भी उन्हें ही करना चाहिए। दवाओं की खरीद में अनावश्यक रूप से लगने वाले लम्बे समय पर विशेष आक्रोश प्रकट किया गया। ध्यान भटकाने के लिए एडी ने पैंतरा बदलते हुए कहा कि यहां शीघ्र ही 300 नई नर्सें ज्वाइन करने वाली हैं। विदित है कि जून 2025 में करीब 2500 नर्स एवं पैरा मेडिकल स्टाफ का सिलेक्शन यूपीएससी तथा एम्स के पैनल द्वारा करके कॉर्पोरेशन को सौंप दिया गया था। तब से मुख्यालय उस पर कुंडली मारे बैठा है। किसी को कोई नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है। ताकि वेतन का खर्च बचाया जा सके।